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इल्तिजा पर शेर

उर्दू शायरी में इल्तिजा

(विनती) का अर्थ अपने महबूब से मिलने या उसकी झलक भर पा लेने की ख़्वाहिश से जुड़ा हुआ है । उर्दू शायरी का प्रेमी हर पल यही इल्तिजा / विनती करता हुआ नज़र आता है कि किसी तरह उसका महबूब उसके सामने आ जाए और उनका मिलन हो जाए । लेकिन प्रेमिका तो बुत-ए-काफ़िर (इंकार करने वाला बुत) है वो भला अपने प्रेमी कि फ़रियाद क्यों सुने । उर्दू शायरी का एक बड़ा हिस्सा प्रेमी के इसी इल्तिजा को नए नए अंदाज़ में पेश करता है ।

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक

इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कहीं वो के मिटा दें इंतिज़ार का लुत्फ़

कहीं क़ुबूल हो जाए इल्तिजा मेरी

हसरत जयपुरी

अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर

इतनी दूर गए दुनिया से किनारा करते

उबैदुल्लाह अलीम
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आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ

अब भी अगर जाओ तो ये रात बड़ी है

साक़िब लखनवी

आओ मिल जाओ कि ये वक़्त पाओगे कभी

मैं भी हम-राह ज़माने के बदल जाऊँगा

दाग़ देहलवी

मानी हैं मैं ने सैकड़ों बातें तमाम उम्र

आज आप एक बात मेरी मान जाइए

अमीर मीनाई

मेरे घर के तमाम दरवाज़े

तुम से करते हैं प्यार जाओ

अनवर शऊर
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दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए ताज-ए-शाहाना

मुझे तो होश दे इतना रहूँ मैं तुझ पे दीवाना

बहादुर शाह ज़फ़र

सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी करना

तुम्हें क़सम है हमारे सर की हमारे हक़ में कमी करना

दाग़ देहलवी

बहुत दूर तो कुछ नहीं घर मिरा

चले आओ इक दिन टहलते हुए

हफ़ीज़ जौनपुरी

ये इल्तिजा दुआ ये तमन्ना फ़ुज़ूल है

सूखी नदी के पास समुंदर जाएगा

हयात लखनवी
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क़ुबूल इस बारगह में इल्तिजा कोई नहीं होती

इलाही या मुझी को इल्तिजा करना नहीं आता

चराग़ हसन हसरत

इश्क़ को नग़्मा-ए-उम्मीद सुना दे कर

दिल की सोई हुई क़िस्मत को जगा दे कर

अख़्तर शीरानी

इश्क़ में शिकवा कुफ़्र है और हर इल्तिजा हराम

तोड़ दे कासा-ए-मुराद इश्क़ गदागरी नहीं

असर रामपुरी

अब तो जाओ रस्म-ए-दुनिया की

मैं ने दीवार भी गिरा दी है

जावेद कमाल रामपुरी
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