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इल्तिजा पर शेर

उर्दू शायरी में इल्तिजा

(विनती) का अर्थ अपने महबूब से मिलने या उसकी झलक भर पा लेने की ख़्वाहिश से जुड़ा हुआ है । उर्दू शायरी का प्रेमी हर पल यही इल्तिजा / विनती करता हुआ नज़र आता है कि किसी तरह उसका महबूब उसके सामने आ जाए और उनका मिलन हो जाए । लेकिन प्रेमिका तो बुत-ए-काफ़िर (इंकार करने वाला बुत) है वो भला अपने प्रेमी कि फ़रियाद क्यों सुने । उर्दू शायरी का एक बड़ा हिस्सा प्रेमी के इसी इल्तिजा को नए नए अंदाज़ में पेश करता है ।

इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक

इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

EXPLANATION #1

इस शे’र का मिज़ाज ग़ज़ल के पारंपरिक स्वभाव के समान है। चूँकि फ़ैज़ ने प्रगतिशील विचारों के प्रतिनिधित्व में भी उर्दू छंदशास्त्र की परंपरा का पूरा ध्यान रखा इसलिए उनकी रचनाओं में प्रतीकात्मक स्तर पर प्रगतिवादी सोच दिखाई देती है इसलिए उनकी शे’री दुनिया में और भी संभावनाएं मौजूद हैं। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ये मशहूर शे’र है। बाद-ए-नौ-बहार के मायने नई बहार की हवा है। पहले इस शे’र की व्याख्या प्रगतिशील विचार को ध्यान मे रखते हुए करते हैं। फ़ैज़ की शिकायत ये रही है कि क्रांति होने के बावजूद शोषण की चक्की में पिसने वालों की क़िस्मत नहीं बदलती। इस शे’र में अगर बाद-ए-नौबहार को क्रांति का प्रतीक मान लिया जाये तो शे’र का अर्थ ये बनता है कि गुलशन (देश, समय आदि) का कारोबार तब तक नहीं चल सकता जब तक कि क्रांति अपने सही मायने में नहीं आती। इसीलिए वो क्रांति या परिवर्तन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि जब तुम प्रगट हो जाओगे तब फूलों में नई बहार की हवा ताज़गी लाएगी। और इस तरह से चमन का कारोबार चलेगा। दूसरे शब्दों में वो अपने महबूब से कहते हैं कि तुम अब भी जाओ ताकि गुलों में नई बहार की हवा रंग भरे और चमन खिल उठे।

शफ़क़ सुपुरी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कहीं वो के मिटा दें इंतिज़ार का लुत्फ़

कहीं क़ुबूल हो जाए इल्तिजा मेरी

हसरत जयपुरी

अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर

इतनी दूर गए दुनिया से किनारा करते

उबैदुल्लाह अलीम

आओ मिल जाओ कि ये वक़्त पाओगे कभी

मैं भी हम-राह ज़माने के बदल जाऊँगा

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी इस दोहे में मिलन के लिए तुरंत बुलाते हैं और कहते हैं कि बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता। दूसरी पंक्ति में वक्त का असर खुद वक्ता पर भी दिखाया गया है कि वह भी बदल जाएगा। इसलिए देर करने से संबंध और भावनाएँ दोनों बदल सकती हैं। भाव के केंद्र में वर्तमान को पकड़ने की बेचैनी और बाद के पछतावे का डर है।

दाग़ देहलवी

आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ

अब भी अगर जाओ तो ये रात बड़ी है

साक़िब लखनवी

मानी हैं मैं ने सैकड़ों बातें तमाम उम्र

आज आप एक बात मिरी मान जाइए

अमीर मीनाई

मेरे घर के तमाम दरवाज़े

तुम से करते हैं प्यार जाओ

अनवर शऊर

दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए ताज-ए-शाहाना

मुझे तो होश दे इतना रहूँ मैं तुझ पे दीवाना

Interpretation: Rekhta AI

कवि साधु-सा वैराग्य और राजा-सी शान—दोनों को महत्व नहीं देता। उसे बस इतनी समझ चाहिए कि उसका प्रेम टिके रहे और भटके नहीं। ‘कपड़ा’ और ‘ताज’ प्रतीक हैं—एक त्याग का, दूसरा सत्ता का—पर दोनों से ऊपर प्रेम है। भाव यह है कि दीवानापन हो, मगर संभला हुआ हो।

बहादुर शाह ज़फ़र

सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-उल्फ़त कभी करना

तुम्हें क़सम है हमारे सर की हमारे हक़ में कमी करना

Interpretation: Rekhta AI

कवि व्यंग्य में कहता है कि दुख सह लिया जाएगा, पर अगर एक बार भी प्रेम-भरी नज़र मिली तो उम्मीद जागेगी और पीड़ा बढ़ जाएगी। इसलिए वह चाहता है कि प्रिय अपनी बेरुख़ी में भी स्थिर रहे। “सिर की क़सम” देकर वह अपने दुख को जैसे अपना हक़ बना लेता है—जो हिस्सा मिला है, उसे भी कम किया जाए। भाव में चोट खाया स्वाभिमान और एकतरफ़ा लगाव साथ-साथ हैं।

दाग़ देहलवी

इश्क़ में शिकवा कुफ़्र है और हर इल्तिजा हराम

तोड़ दे कासा-ए-मुराद इश्क़ गदागरी नहीं

असर रामपुरी

बहुत दूर तो कुछ नहीं घर मिरा

चले आओ इक दिन टहलते हुए

हफ़ीज़ जौनपुरी

क़ुबूल इस बारगह में इल्तिजा कोई नहीं होती

इलाही या मुझी को इल्तिजा करना नहीं आता

चराग़ हसन हसरत

इश्क़ को नग़्मा-ए-उम्मीद सुना दे कर

दिल की सोई हुई क़िस्मत को जगा दे कर

अख़्तर शीरानी

ये इल्तिजा दुआ ये तमन्ना फ़ुज़ूल है

सूखी नदी के पास समुंदर जाएगा

हयात लखनवी

अब तो जाओ रस्म-ए-दुनिया की

मैं ने दीवार भी गिरा दी है

जावेद कमाल रामपुरी

मेरे कहने में है दिल जब तक मिरे पहलू में है

आप ले लीजे इसे ये आप का हो जाएगा

बेख़ुद देहलवी

तेरा आशिक़ तेरे क़दमों से लिपट जाएगा

रूठने वाले तुझे आज मनाने के लिए

इशराक़ अज़ीज़ी

उन से मिलने की इल्तिजा की है

दिल-ए-नादाँ ने ये ख़ता की है

अज़ीम हैदराबादी

मुझ से दोस्त फिर ख़फ़ा हो जा

इश्क़ को नींद आई जाती है

ख़ुमार बाराबंकवी

हम इस लम्बे-चौड़े घर में शब को तन्हा होते हैं

देख किसी दिन मिल हम से हम को तुझ से काम है चाँद

इब्न-ए-इंशा

बस इतना सोच कर ही मुझ को अपने पास तुम रख लो

तुम्हारे वास्ते मैं हुक्मरानी छोड़ आया हूँ

नदीम भाभा
बोलिए