ख़ुमार बाराबंकवी के शेर
भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
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वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
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दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
दोस्तों को आज़माते जाइए
दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
दोस्तों को आज़माते जाइए
ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को
ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं
ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को
ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं
ख़ुदा बचाए तिरी मस्त मस्त आँखों से
फ़रिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है
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फ़रिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है
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मोहब्बत को समझना है तो नासेह ख़ुद मोहब्बत कर
किनारे से कभी अंदाज़ा-ए-तूफ़ाँ नहीं होता
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सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं
तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं
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हैरत है तुम को देख के मस्जिद में ऐ 'ख़ुमार'
क्या बात हो गई जो ख़ुदा याद आ गया
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दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए
सामने आइना रख लिया कीजिए
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अब इन हुदूद में लाया है इंतिज़ार मुझे
वो आ भी जाएँ तो आए न ए'तिबार मुझे
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हद से बढ़े जो इल्म तो है जहल दोस्तो
सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं
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ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं रही
जज़्बात में वो पहली सी शिद्दत नहीं रही
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मिरे राहबर मुझ को गुमराह कर दे
सुना है कि मंज़िल क़रीब आ गई है
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ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास
सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए
ग़म है न अब ख़ुशी है न उम्मीद है न यास
सब से नजात पाए ज़माने गुज़र गए
तुझ को बर्बाद तो होना था बहर-हाल 'ख़ुमार'
नाज़ कर नाज़ कि उस ने तुझे बर्बाद किया
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चराग़ों के बदले मकाँ जल रहे हैं
नया है ज़माना नई रौशनी है
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गुज़रे हैं मय-कदे से जो तौबा के ब'अद हम
कुछ दूर आदतन भी क़दम डगमगाए हैं
गुज़रे हैं मय-कदे से जो तौबा के ब'अद हम
कुछ दूर आदतन भी क़दम डगमगाए हैं
याद करने पे भी दोस्त आए न याद
दोस्तों के करम याद आते रहे
याद करने पे भी दोस्त आए न याद
दोस्तों के करम याद आते रहे
हटाए थे जो राह से दोस्तों की
वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं
हटाए थे जो राह से दोस्तों की
वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं
इलाही मिरे दोस्त हों ख़ैरियत से
ये क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं
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आज नागाह हम किसी से मिले
बा'द मुद्दत के ज़िंदगी से मिले
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टैग : मुलाक़ात
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सहरा को बहुत नाज़ है वीरानी पे अपनी
वाक़िफ़ नहीं शायद मिरे उजड़े हुए घर से
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ओ जाने वाले आ कि तिरे इंतिज़ार में
रस्ते को घर बनाए ज़माने गुज़र गए
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टैग : इंतिज़ार
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अक़्ल ओ दिल अपनी अपनी कहें जब 'ख़ुमार'
अक़्ल की सुनिए दिल का कहा कीजिए
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टैग : दिल
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अक़्ल ओ दिल अपनी अपनी कहें जब 'ख़ुमार'
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ये वफ़ा की सख़्त राहें ये तुम्हारे पाँव नाज़ुक
न लो इंतिक़ाम मुझ से मिरे साथ साथ चल के
ये वफ़ा की सख़्त राहें ये तुम्हारे पाँव नाज़ुक
न लो इंतिक़ाम मुझ से मिरे साथ साथ चल के