हिचकी पर शेर
हिन्दुस्तानी असातीरी
रिवायात के हवाले से हिचकी का सबब यही समझा जाता है कि कोई याद कर रहा है। इस क़िस्म के तसव्वुरात सच और झूट से मावरा होते हैं। शायरों ने भी हिचकी को उस के इसी तनाज़ुर में बरता है। कुछ अशआर का इन्तिख़ाब हम आपके लिए पेश कर रहे हैं।
आख़री हिचकी तिरे ज़ानूँ पे आए
मौत भी मैं शाइराना चाहता हूँ
'अमीर' अब हिचकियाँ आने लगी हैं
कहीं मैं याद फ़रमाया गया हूँ
मुझे याद करने से ये मुद्दआ था
निकल जाए दम हिचकियाँ आते आते
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहता है कि प्रिय की याद भी यहाँ राहत नहीं, बल्कि यातना बन गई है। “हिचकियाँ” विरह की बार-बार उठती पीड़ा का रूपक हैं, जो साँस को रोकती हुई लगती हैं। भाव यह है कि याद का सिलसिला इतना तीखा है कि जीवन तक छीन लेने जैसा लगता है। इस में कटाक्ष और दर्द दोनों साथ चलते हैं।
हिचकियाँ रात दर्द तन्हाई
आ भी जाओ तसल्लियाँ दे दो
हिचकियों पर हो रहा है ज़िंदगी का राग ख़त्म
झटके दे कर तार तोड़े जा रहे हैं साज़ के
तुम्हें ये ग़म है कि अब चिट्ठियाँ नहीं आतीं
हमारी सोचो हमें हिचकियाँ नहीं आतीं
हिचकियाँ आती हैं पर लेते नहीं वो मेरा नाम
देखना उन की फ़रामोशी को मेरी याद को
ख़बर देती है याद करता है कोई
जो बाँधा है हिचकी ने तार आते आते