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अहद-ए-वफ़ा: प्रॉमिस डे के अवसर पर

11 फ़रवरी “वैलेंटाइन वीक” का पाँचवाँ दिन होता है। यह दिन पूरी दुनिया में “प्रॉमिस डे” के रूप में मनाया जाता है। इस दिन प्रेम करने वाले एक-दूसरे से वादे करते हैं। इस अवसर पर हमारे शेरों का चयन पढ़िए और अपने दोस्तों के साथ साझा कीजिए।

आदतन तुम ने कर दिए वादे

आदतन हम ने ए'तिबार किया

गुलज़ार

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि याद हो

वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि याद हो

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय से पूछता है कि क्या उसे वह पुराना रिश्ता और आपसी समझ अब भी याद है। “क़रार” यहाँ स्थिरता और तय हुए संबंध का संकेत है, और “वादा निभाह” निष्ठा से साथ देने की प्रतिज्ञा है। “याद हो कि याद हो” की बार-बार ध्वनि में शिकायत भी है और टूटन भी—जैसे भूल जाना ही बेवफ़ाई हो। यह शेर प्रेम को याद और वफ़ादारी की कसौटी पर रखता है।

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय से पूछता है कि क्या उसे वह पुराना रिश्ता और आपसी समझ अब भी याद है। “क़रार” यहाँ स्थिरता और तय हुए संबंध का संकेत है, और “वादा निभाह” निष्ठा से साथ देने की प्रतिज्ञा है। “याद हो कि याद हो” की बार-बार ध्वनि में शिकायत भी है और टूटन भी—जैसे भूल जाना ही बेवफ़ाई हो। यह शेर प्रेम को याद और वफ़ादारी की कसौटी पर रखता है।

मोमिन ख़ाँ मोमिन

सुबूत है ये मोहब्बत की सादा-लौही का

जब उस ने वादा किया हम ने ए'तिबार किया

जोश मलीहाबादी

यूँ मोहब्बत से दे मेरी मोहब्बत का जवाब

ये सज़ा सख़्त है थोड़ी सी रिआ'यत कर दे

ज़फ़र इक़बाल

उम्मीद तो बंध जाती तस्कीन तो हो जाती

वा'दा वफ़ा करते वा'दा तो किया होता

चराग़ हसन हसरत

मैं भी हैरान हूँ 'दाग़' कि ये बात है क्या

वादा वो करते हैं आता है तबस्सुम मुझ को

Interpretation: Rekhta AI

कवि अपने ही मन की हालत पर अचरज करता है कि प्रिय के वादे सुनकर अब उम्मीद नहीं जगती, बल्कि हल्की-सी मुस्कान जाती है। यहाँ “वादा” बार-बार किए गए और निभाए गए आश्वासनों का संकेत है। भाव में थकान, संदेह और थोड़ी विडंबना है—जैसे वादा अब गंभीर बात नहीं रहा।

Interpretation: Rekhta AI

कवि अपने ही मन की हालत पर अचरज करता है कि प्रिय के वादे सुनकर अब उम्मीद नहीं जगती, बल्कि हल्की-सी मुस्कान जाती है। यहाँ “वादा” बार-बार किए गए और निभाए गए आश्वासनों का संकेत है। भाव में थकान, संदेह और थोड़ी विडंबना है—जैसे वादा अब गंभीर बात नहीं रहा।

दाग़ देहलवी

जानते थे दोनों हम उस को निभा सकते नहीं

उस ने व'अदा कर लिया मैं ने भी व'अदा कर लिया

मुनीर नियाज़ी

बे-उज़्र वो कर लेते हैं व'अदा ये समझ कर

ये अहल-ए-मुरव्वत हैं तक़ाज़ा करेंगे

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

उस के वादों से इतना तो साबित हुआ उस को थोड़ा सा पास-ए-तअल्लुक़ तो है

ये अलग बात है वो है वादा-शिकन ये भी कुछ कम नहीं उस ने वादे किए

आमिर उस्मानी

फ़रेब-ए-अहद-ए-मोहब्बत की सादगी की क़सम

वो झूट बोल कि सच को भी प्यार जाए

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रेम के वचन में भरोसा करने वाली मासूमियत की बात करता है, जो अक्सर धोखे में पड़ जाती है। उसी मजबूरी में वह चाहता है कि सामने वाला इतना मीठा झूठ कह दे कि कड़वा सच भी सहने लायक लगने लगे। यहाँ झूठ और सच का टकराव दिखाता है कि प्रेम दिल की नज़र बदल देता है। भावनात्मक केंद्र सुकून देने वाले भ्रम की चाह है।

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रेम के वचन में भरोसा करने वाली मासूमियत की बात करता है, जो अक्सर धोखे में पड़ जाती है। उसी मजबूरी में वह चाहता है कि सामने वाला इतना मीठा झूठ कह दे कि कड़वा सच भी सहने लायक लगने लगे। यहाँ झूठ और सच का टकराव दिखाता है कि प्रेम दिल की नज़र बदल देता है। भावनात्मक केंद्र सुकून देने वाले भ्रम की चाह है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

तिरी तस्वीर तो वा'दे के दिन खिंचने के क़ाबिल है

कि शर्माई हुई आँखें हैं घबराया हुआ दिल है

नज़ीर इलाहाबादी

मुझे है ए'तिबार-ए-वादा लेकिन

तुम्हें ख़ुद ए'तिबार आए आए

अख़्तर शीरानी

मैं एक एक तमन्ना से पूछ बैठा हूँ

मुझे यक़ीं नहीं आता कि मेरा सब है तू

अंजुम सलीमी

वो करेंगे वस्ल का वा'दा वफ़ा

रंग गहरे हैं हमारी शाम के

मुज़्तर ख़ैराबादी

अब तो कर डालिए वफ़ा उस को

वो जो वादा उधार रहता है

इब्न-ए-मुफ़्ती

आज देखा है उसे ऐसी मोहब्बत से 'अता'

वो यही भूल गया उस को कहीं जाना था

अहमद अता

कोई वा'दा वो कर जो पूरा हो

कोई सिक्का वो दे कि जारी हो

जमीलुद्दीन आली

इक क़यामत है आप का वा'दा

चलिए ये भी अज़ाब हो जाए

अब्दुल मन्नान तरज़ी

तू निगाहों से पिलाने का जो वादा कर ले

फेंक दूँगा ये सुराही ये भरा जाम अभी

शमीम किरतपुरी

यूँही वादा करो यक़ीं हो जाए

क्यूँ क़सम लूँ क़सम के क्या मअनी

सख़ी लख़नवी
बोलिए