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फ़ेमस शायरी पर शेर

ये सारे अशआर आप सबने

पढ़े या सुने होंगे। इन अशआर ने एक तरह से ज़र्ब-उल-मसल की हैसियत पा ली है। उनमें से बहुत से अशआर आपको याद भी होंगे, लेकिन अपने इन पसंदीदा अशआर को एक जगह देखना यक़ीनन आपके लिए ख़ुशी का बाइस होगा।

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

मैं मानता हूँ कि मैं तुम्हें देखने के योग्य नहीं हूँ।

लेकिन मेरा लगाव देखो और मेरा इंतज़ार देखो।

वक्ता अपनी अयोग्यता स्वीकार करके विनम्रता दिखाता है, पर अपनी सच्ची चाह और लगातार प्रतीक्षा को अपने पक्ष में रखता है। वह कहता है कि मिलने की पात्रता सही, मेरी लगन तो देखी जाए। यहाँ “दीद” केवल देखना नहीं, बल्कि निकटता और कृपा का संकेत है। भाव का केंद्र तड़प, भक्ति-सा समर्पण और आशा है।

अल्लामा इक़बाल

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है

हमें स्वर्ग (जन्नत) की असलियत के बारे में सब पता है, लेकिन...

हे 'ग़ालिब', दिल को बहलाने और खुश रखने के लिए यह विचार अच्छा है।

इस शेर में शायर जन्नत के अस्तित्व पर एक चुलबुला कटाक्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी किसी उम्मीद की ज़रूरत होती है। जन्नत का यह 'ख़याल' एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना हो मुमकिन

उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा

साहिर लुधियानवी

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया

मजरूह सुल्तानपुरी

बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी था

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्ताँ क्या होगा

शौक़ बहराइची

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

बशीर बद्र

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

अकबर इलाहाबादी

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

अपने भीतर के स्वत्व को इतना ऊँचा बनाओ कि भाग्य से पहले भी तुम कमजोर पड़ो।

ऐसी ऊँचाई हो कि ईश्वर स्वयं पूछें: बताओ, तुम्हारी इच्छा क्या है?

यह शेर आत्म-शक्ति और आत्म-निर्माण का संदेश देता है। “स्वत्व/ख़ुदी” यहाँ जागरूक, अनुशासित और साहसी व्यक्तित्व का रूपक है जो हालात के आगे हार नहीं मानता। ईश्वर का बंदे से पूछना यह दिखाता है कि सही दिशा में बढ़ा हुआ इंसान केवल भाग्य पर नहीं टिकता, वह चुनता और गढ़ता है। भावनात्मक रूप से यह विश्वास, प्रयास और जिम्मेदारी की पुकार है।

अल्लामा इक़बाल

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के

प्रेम ने 'ग़ालिब' को निकम्मा और बेकार बना दिया है।

वरना हम भी बहुत काम के और काबिल इंसान हुआ करते थे।

इस शेर में शायर यह कहना चाहता है कि इश्क़ के चक्कर में पड़कर वह अब किसी काम के नहीं रहे। वह एक दबी हुई आह के साथ याद करते हैं कि प्यार में पड़ने से पहले वो भी एक बहुत हुनरमंद और ज़रूरी इंसान थे, लेकिन अब सिर्फ़ नाम के रह गए हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

जिगर मुरादाबादी

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन

दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

सीमाब अकबराबादी

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए

फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए

अहमद फ़राज़

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

नरगिस का फूल हजारों साल अपनी रोशनी होने, यानी देख पाने पर रोता रहता है।

बाग़ यानी दुनिया में सचमुच दूरदर्शी इंसान बहुत मुश्किल से पैदा होता है।

यहाँ नरगिस को आँख का रूपक माना गया है और “बे-नूरी” से आशय भीतर की रोशनी/समझ की कमी है। “चमन” समाज या दुनिया है, जहाँ सही दृष्टि रखने वाला व्यक्ति बहुत कम मिलता है। भाव यह है कि अज्ञान और अंधापन लंबे समय तक रहता है, और सच्ची दूरदृष्टि का जन्म दुर्लभ होता है।

अल्लामा इक़बाल

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब

आज तुम याद बे-हिसाब आए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तू इधर उधर की बात कर ये बता कि क़ाफ़िले क्यूँ लुटे

तिरी रहबरी का सवाल है हमें राहज़न से ग़रज़ नहीं

शहाब जाफ़री

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा

अहमद फ़राज़

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो

धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

राहत इंदौरी

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

प्रेम में जीना और मरना अलग नहीं लगता, दोनों एक जैसे हो जाते हैं।

हम उसी को देखकर जीते हैं जिसके रूखेपन से हमारी सांस छूट सकती है।

इस शेर में प्रेम की चरम अवस्था दिखाई गई है, जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है। प्रेमी की जिंदगी का सहारा प्रिय का दर्शन है, लेकिन वही प्रिय इतना कठोर/उदासीन है कि उसी के कारण जान भी जा सकती है। एक ही चेहरा जीवन भी देता है और मृत्यु भी—यही तड़प और समर्पण का भाव है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

एक मुद्दत से तिरी याद भी आई हमें

और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं

बहुत समय से तुम्हारी याद भी मुझे नहीं आई।

पर ऐसा नहीं कि मैं तुम्हें भूल गया हूँ।

यह दो पंक्तियाँ मन की उलझन दिखाती हैं: याद आना और भूल जाना एक बात नहीं। बोलने वाला कहता है कि लंबे समय से खयाल नहीं आया, फिर भी मन के अंदर का लगाव खत्म नहीं हुआ। दूरी और चुप्पी के बीच भी प्यार की हल्की मौजूदगी बनी रहती है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ

अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ

अनवर शऊर

बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई

इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया

ख़ालिद शरीफ़

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

Rekhta AI Explanation

इस शेर में कहने वाला बेवफ़ाई को सिर्फ़ ग़द्दारी नहीं मानता, बल्कि मानवी मजबूरी से जोड़कर देखता है। उसका ख़याल है कि अगर कोई दूर हुआ या वफ़ा निभा सका, तो ज़रूर कुछ दबाव, हालात या लाचारी रही होगी वरना कोई यूँ ही बेवफ़ा नहीं बन जाता। यह बात एक तरह की तसल्ली भी है और इल्ज़ाम को हल्का करने की कोशिश भी।

बशीर बद्र

इस सादगी पे कौन मर जाए ख़ुदा

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

हे ईश्वर, महबूब के इस भोलेपन पर भला कौन अपनी जान न्योछावर कर दे?

वे मुझसे लड़ तो रहे हैं, लेकिन उनके हाथ में कोई तलवार भी नहीं है।

शायर अपने महबूब के इस अंदाज़ पर हैरान है कि वह बिना किसी हथियार के ही लड़ने चला आया है। यहाँ 'लड़ना' नज़रों के वार या अदाओं का प्रतीक है, जो तलवार से भी ज़्यादा घातक हैं। ग़ालिब कहते हैं कि इस 'सादगी' पर मर मिटना लाज़मी है, जहाँ कातिल यह नहीं जानता कि उसकी सुंदरता ही सबसे बड़ा हथियार है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है

इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

निदा फ़ाज़ली

की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा

हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना

मेरे कत्ल के बाद महबूब ने ज़ुल्म करने की कसम खाई है।

अफ़सोस, उस 'जल्दी पछताने वाले' का यह पछतावा अब किस काम का?

ग़ालिब इस शेर में महबूब के पछतावे के गलत समय पर तंज (व्यंग्य) कर रहे हैं। आशिक के मर जाने के बाद महबूब का ज़ुल्म छोड़ना और शर्मिंदा होना अब बेमानी है, भले ही वह स्वभाव से कितनी ही जल्दी पछताने वाला क्यों हो।

मिर्ज़ा ग़ालिब

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ

ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ

ख़्वाजा मीर दर्द

कह रहा है शोर-ए-दरिया से समुंदर का सुकूत

जिस का जितना ज़र्फ़ है उतना ही वो ख़ामोश है

नातिक़ लखनवी

इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर सको तो आओ

मिरे घर के रास्ते में कोई कहकशाँ नहीं है

मुस्तफ़ा ज़ैदी

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

सितारों के पार भी और दुनिया और मंज़िलें हैं।

प्रेम की परीक्षाएँ अभी खत्म नहीं हुईं; आगे भी और इम्तिहान हैं।

यह शे’र बताता है कि जो सीमा हमें आख़िरी लगती है, उसके आगे भी नई मंज़िलें होती हैं। “सितारे” यहाँ ऊँचाई और पहुँच की सीमा का संकेत हैं, और उनसे आगे बढ़ने की प्रेरणा है। दूसरी पंक्ति में प्रेम को निरंतर परीक्षा माना गया है, जिसमें हर कदम पर नया साहस और धैर्य चाहिए। भाव है—आशा के साथ आगे बढ़ते रहो, मंज़िल अभी बाकी है।

अल्लामा इक़बाल

जी भर के देखा कुछ बात की

बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

बशीर बद्र

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

अहमद फ़राज़

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

मेरी इच्छाएँ हज़ारों हैं, और हर इच्छा इतनी तीखी है कि जैसे साँस ही रुक जाए।

मेरे बहुत से अरमान पूरे हुए, फिर भी मन को वे कम लगे।

यह शेर मनुष्य की खत्म होने वाली चाहत और अतृप्ति को दिखाता है। “दम निकलना” एक रूपक है, जो बताता है कि इच्छा की तीव्रता इंसान को भीतर तक थका देती है। फिर भी, जब कई अरमान पूरे हो जाते हैं, तब भी संतोष नहीं मिलता, क्योंकि दिल की माँगें लगातार बढ़ती रहती हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल करोगे लेकिन

ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक

मैं मानता हूँ कि तुम हमेशा मुझे अनदेखा नहीं करोगे।

लेकिन जब तक तुम्हें मेरी खबर होगी, तब तक मैं मिट्टी हो चुका होऊँगा।

मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ कह रहे हैं कि उपेक्षा भले ही एक दिन खत्म हो जाए, पर वह खत्म होते-होते बहुत देर हो जाती है। “मिट्टी/धूल हो जाना” मृत्यु, समाप्त हो जाना या पूरी तरह टूट जाना का संकेत है। भाव यह है कि प्रेम में पहचान और ध्यान अगर देर से मिले, तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसी देर और बेबसी की टीस इस शेर का केंद्र है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा हो

अज्ञात

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे

वसीम बरेलवी

तुम मिरे पास होते हो गोया

जब कोई दूसरा नहीं होता

मुझे लगता है जैसे तुम मेरे बिलकुल पास हो।

यह तब होता है जब मेरे साथ कोई और नहीं होता।

यह शेर बताता है कि अकेलेपन में प्रिय की उपस्थिति सबसे अधिक महसूस होती है। “गोया” से संकेत मिलता है कि यह पास होना सच भी हो सकता है और मन की कल्पना या याद भी। जब आसपास कोई नहीं रहता, तो वही याद दिल को सहारा देती है, और उसी से तड़प भी झलकती है।

मोमिन ख़ाँ मोमिन

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

Rekhta AI Explanation

इस शे’र में कई अर्थ ऐसे हैं जिनसे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वसीम बरेलवी शे’र में अर्थ के साथ कैफ़ियत पैदा करने की कला से परिचित हैं। ‘जहाँ’ के सन्दर्भ से ‘वहीं’ और इन दोनों के सन्दर्भ से ‘मकाँ’, ‘चराग़’ के सन्दर्भ से ‘रौशनी’ और इससे बढ़कर ‘किसी’ ये सब ऐसे लक्षण हैं जिनसे शे’र में अर्थोत्पत्ति का तत्व पैदा हुआ है।

शे’र के शाब्दिक अर्थ तो ये हो सकते हैं कि चराग़ अपनी रौशनी से किसी एक मकाँ को रौशन नहीं करता है, बल्कि जहाँ जलता है वहाँ की फ़िज़ा को प्रज्वलित करता है। इस शे’र में एक शब्द 'मकाँ' केंद्र में है। मकाँ से यहाँ तात्पर्य मात्र कोई ख़ास घर नहीं बल्कि स्थान है।

अब आइए शे’र के भावार्थ पर प्रकाश डालते हैं। दरअसल शे’र में ‘चराग़’, ‘रौशनी’ और ‘मकाँ’ की एक लाक्षणिक स्थिति है। चराग़ रूपक है नेक और भले आदमी का, उसके सन्दर्भ से रोशनी रूपक है नेकी और भलाई का। इस तरह शे’र का अर्थ ये बनता है कि नेक आदमी किसी ख़ास जगह नेकी और भलाई फैलाने के लिए पैदा नहीं होते बल्कि उनका कोई विशेष मकान नहीं होता और ये स्थान की अवधारणा से बहुत आगे के लोग होते हैं। बस शर्त ये है कि आदमी भला हो। अगर ऐसा है तो भलाई हर जगह फैल जाती है।

शफ़क़ सुपुरी

वसीम बरेलवी

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने

लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

हसरत मोहानी

याद-ए-माज़ी 'अज़ाब है या-रब

छीन ले मुझ से हाफ़िज़ा मेरा

अख़्तर अंसारी

सुब्ह होती है शाम होती है

उम्र यूँही तमाम होती है

मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम

जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन

बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए

मेरा दिल फिर वही फुर्सत ढूँढता है जो दिन-रात मिल सके।

ताकि मैं बस बैठा रहूँ और प्रियतम की छवि मन में बनाए रखूँ।

यह शेर उस इच्छा को दिखाता है जिसमें इंसान दुनिया की भागदौड़ से निकलकर बस समय पाना चाहता है। “दिन-रात” बताता है कि यह चाह लगातार है, थोड़ी देर की नहीं। “प्रियतम का कल्पना-चित्र” मन का सहारा है, जिसमें डूबकर बैठना भी सुकून बन जाता है। भाव का केंद्र एकांत में याद और तड़प के साथ जुड़ी मीठी डूबन है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना

निदा फ़ाज़ली

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है

कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

वे हमारे घर गए हैं, यह तो ईश्वर का चमत्कार लगता है।

कभी मैं उन्हें देखता हूँ, कभी अपने घर को, जैसे भरोसा ही नहीं होता।

यह शेर प्रिय के घर जाने को इतना अनोखा मानता है कि उसे ईश्वर की कृपा/चमत्कार कहा गया है। बोलने वाला बार-बार नज़र बदलकर कभी प्रिय को, कभी घर को देखता है, ताकि यक़ीन हो सके कि यह सच है। भाव में आश्चर्य, कृतज्ञता और अचानक मिली किस्मत की मिठास है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए

अहमद फ़राज़

बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'

कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है

ग़ालिब, मेरी यह बेहोशी यूँ ही बिना कारण नहीं है।

ज़रूर कुछ बात है जिसे छिपाकर रखा गया है।

कवि कहता है कि उसकी स्व-विस्मृति या बेहोशी किसी असली वजह से है। “पर्दा-दारी” उस छुपे हुए सच, दर्द या प्रेम की ओर इशारा करती है जिसे वह खुलकर कह नहीं सकता। इसलिए बाहरी तौर पर जो उलझन दिखती है, वह भीतर की छिपी बात का असर है। यह शेर रहस्य और अंदरूनी बेचैनी का भाव देता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं

तुझे ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

हम उन कदमों की आहट बहुत पहले ही समझ लेते हैं।

ज़िंदगी, हम तुम्हें दूर से ही पहचान लेते हैं।

कवि कहता है कि अनुभव के कारण वह आने वाली बात को पहले ही भांप लेता है। “कदमों की आहट” ज़िंदगी के दुख-सुख, उसकी जिम्मेदारियाँ और बार-बार लौटने वाले हालात का संकेत है। ज़िंदगी से सीधे बात करके वह जताता है कि अब उसे कोई भ्रम नहीं रहता। भाव में थकान, समझ और स्वीकार का मेल है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

नहीं है ना-उमीद 'इक़बाल' अपनी किश्त-ए-वीराँ से

ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी

इक़बाल अपनी उजड़ी हुई खेती से निराश नहीं हैं।

साक़ी, बस थोड़ी सी नमी मिल जाए तो यह मिट्टी बहुत उपजाऊ हो जाती है।

यह शेर कहता है कि बंजरपन अंतिम सच नहीं, बस हालात का असर है। “उजड़ी खेती” ठहरे हुए जीवन/समाज का संकेत है और “नमी” सही सहारा, मेहनत, मार्गदर्शन या नई प्रेरणा का रूपक। साक़ी से संबोधन उसी जीवन देने वाली शक्ति को बुलाने जैसा है। भाव यह है कि भीतर क्षमता है, थोड़ा संबल मिले तो नई शुरुआत संभव है।

अल्लामा इक़बाल
बोलिए