मोहब्बत पर शेर
मोहब्बत पर ये शायरी
आपके लिए एक सबक़ की तरह है, आप इस से मोहब्बत में जीने के आदाब भी सीखेंगे और हिज्र-ओ-विसाल को गुज़ारने के तरीक़े भी. ये पहला ऐसा ख़ूबसूरत काव्य-संग्रह है जिसमें मोहब्बत के हर रंग, हर भाव और हर एहसास को अभिव्यक्त करने वाले शेरों को जमा किया गया है.आप इन्हें पढ़िए और मोहब्बत करने वालों के बीच साझा कीजिए.
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
प्रेम में जीना और मरना अलग नहीं लगता, दोनों एक जैसे हो जाते हैं।
हम उसी को देखकर जीते हैं जिसके रूखेपन से हमारी सांस छूट सकती है।
इस शेर में प्रेम की चरम अवस्था दिखाई गई है, जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है। प्रेमी की जिंदगी का सहारा प्रिय का दर्शन है, लेकिन वही प्रिय इतना कठोर/उदासीन है कि उसी के कारण जान भी जा सकती है। एक ही चेहरा जीवन भी देता है और मृत्यु भी—यही तड़प और समर्पण का भाव है।
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
Rekhta
AI Explanation
इस शेर में कहने वाला बेवफ़ाई को सिर्फ़ ग़द्दारी नहीं मानता, बल्कि मानवी मजबूरी से जोड़कर देखता है। उसका ख़याल है कि अगर कोई दूर हुआ या वफ़ा न निभा सका, तो ज़रूर कुछ दबाव, हालात या लाचारी रही होगी — वरना कोई यूँ ही बेवफ़ा नहीं बन जाता। यह बात एक तरह की तसल्ली भी है और इल्ज़ाम को हल्का करने की कोशिश भी।
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए
इन्हीं पत्थरों पे चल कर अगर आ सको तो आओ
मिरे घर के रास्ते में कोई कहकशाँ नहीं है
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं
और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया
ज़िंदगी किस तरह बसर होगी
दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
इश्क़ पर किसी का बस नहीं चलता; उसे ज़बरदस्ती न किया जा सकता है, न रोका जा सकता है।
ग़ालिब कहते हैं यह ऐसी आग है जो चाहो तब भी न लगे, और लग जाए तो बुझती नहीं।
इस शे’र में इश्क़ को ऐसी आग बताया गया है जो इंसान की मरज़ी से नहीं चलती। न आप इसे अपने हिसाब से जगा सकते हैं, न जगे हुए इश्क़ को आसानी से बुझा सकते हैं। भाव यह है कि प्यार भीतर से जलाता है और आदमी को बेबस कर देता है।
हुआ है तुझ से बिछड़ने के बा'द ये मा'लूम
कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तिरी याद थी अब याद आया
आप के बा'द हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता
ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया
हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे
अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ
गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी
वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह
कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं
अगर कोई सही तरह समझ सके, तो मैं एक बात कह दूँ।
इश्क़ पाप नहीं, ईश्वर की दी हुई कृपा है।
कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।
मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखा
उस को छुट्टी न मिले जिस को सबक़ याद रहे
दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को
क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
मैं तुम्हारे प्रेम की आख़िरी सीमा तक पहुँचना चाहता हूँ।
मेरा भोलेपन तो देखो, मैं क्या माँग रहा हूँ।
यहाँ बोलने वाला प्रेम का थोड़ा-सा नहीं, उसका चरम चाहता है। दूसरी पंक्ति में वह अपनी ही चाह की बड़ी माँग को ‘भोलेपन’ कहकर मान लेता है। “अंत” या “सीमा” पूर्णता और पूरी तरह समर्पित होने का संकेत है, और “भोलेपन” में हल्की-सी आत्म-विडंबना भी है। भाव-केन्द्र ललक, भक्ति और विनम्रता है।
ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
क्या कहा इश्क़ जावेदानी है!
आख़िरी बार मिल रही हो क्या
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही
तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ
तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा
मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है
तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा
अब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करो
तुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो
आज देखा है तुझ को देर के बअ'द
आज का दिन गुज़र न जाए कहीं
मुझे अब तुम से डर लगने लगा है
तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या
मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
अंजाम-ए-वफ़ा ये है जिस ने भी मोहब्बत की
मरने की दुआ माँगी जीने की सज़ा पाई
दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया
इश्क़ (प्रेम) की वजह से ही मेरे स्वभाव को जीवन का असली आनंद मिला।
मुझे दर्द की दवा तो मिल गई, लेकिन साथ ही एक ऐसा दर्द मिला जिसका कोई इलाज नहीं है।
शायर कहता है कि इश्क़ ने ही जिंदगी को जीने लायक बनाया और उसे रंगीन कर दिया। प्रेम दुनिया के आम दुखों का इलाज तो है, मगर यह खुद एक ऐसी बीमारी है जो लाइलाज है। यानी इश्क़ जीवन की निरसता की दवा है, पर खुद एक मीठा और अनंत दर्द भी है।
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला
वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की
न पूछो हुस्न की तारीफ़ हम से
मोहब्बत जिस से हो बस वो हसीं है
भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
तुम मुझे छोड़ के जाओगे तो मर जाऊँगा
यूँ करो जाने से पहले मुझे पागल कर दो
हम से क्या हो सका मोहब्बत में
ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की
प्रेम में मैं कुछ खास कर नहीं सका।
चलो, तुमने तो कम से कम बेवफ़ाई कर दी।
वक्ता स्वीकार करता है कि प्रेम निभाने में उससे कमी रह गई और वह असमर्थ रहा। दूसरे पंक्ति में ‘चलो’ का ताना है: वक्ता भले कुछ न कर सका, पर सामने वाले ने एक काम पक्का किया—विश्वास तोड़ना। यही विरोध भावनात्मक चोट, शिकायत और कड़वे व्यंग्य को गहरा करता है।
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