जश्न-ए-आज़ादी पर शेर
देश प्रेम की भावना पर आधारित उर्दू की चुनिंदा शायरी
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
Interpretation:
Rekhta AI
अल्लामा इक़बाल इस शेर में कहते हैं कि धर्म का संदेश आपसी नफरत नहीं है। वे याद दिलाते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पहचान साझा देश है, इसलिए मिलकर सम्मान से रहना चाहिए। भाव-केन्द्र एकता, भाईचारे और सहिष्णुता की पुकार है।
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मिट्टी की मोहब्बत में हम आशुफ़्ता-सरों ने
वो क़र्ज़ उतारे हैं कि वाजिब भी नहीं थे
दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी
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वतन की रेत ज़रा एड़ियाँ रगड़ने दे
मुझे यक़ीं है कि पानी यहीं से निकलेगा
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लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है
उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी
Interpretation:
Rekhta AI
फ़िराक़ गोरखपुरी ने शहीदों के बलिदान को आज़ादी की असली कीमत और पहचान के रूप में दिखाया है। “रंग लाया” का अर्थ है कि त्याग का फल मिला और सच सामने आया। “नाम-ए-आज़ादी” को ऐसी आवाज़ की तरह रखा गया है जो समय में उछलकर फैलती है। भाव में गौरव के साथ उन कुर्बानियों के प्रति श्रद्धा भी है।
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वतन के जाँ-निसार हैं वतन के काम आएँगे
हम इस ज़मीं को एक रोज़ आसमाँ बनाएँगे
दिलों में हुब्ब-ए-वतन है अगर तो एक रहो
निखारना ये चमन है अगर तो एक रहो
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वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है
मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में
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उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता
जिस मुल्क की सरहद की निगहबान हैं आँखें
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वतन की पासबानी जान-ओ-ईमाँ से भी अफ़ज़ल है
मैं अपने मुल्क की ख़ातिर कफ़न भी साथ रखता हूँ
ऐ अहल-ए-वतन शाम-ओ-सहर जागते रहना
अग़्यार हैं आमादा-ए-शर जागते रहना
जन्नत की ज़िंदगी है जिस की फ़ज़ा में जीना
मेरा वतन वही है मेरा वतन वही है
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में वक्ता अपने देश के माहौल को जन्नत के समान बताता है, जैसे वहीं रहना सच्ची शांति और खुशी हो। “मेरा वतन वही है” की दोहराई हुई बात दृढ़ निश्चय और गहरे लगाव को दिखाती है। भाव यह है कि देश केवल जमीन नहीं, बल्कि जीवन और पहचान का पवित्र सहारा है।
है मोहब्बत इस वतन से अपनी मिट्टी से हमें
इस लिए अपना करेंगे जान-ओ-तन क़ुर्बान हम
क्या करिश्मा है मिरे जज़्बा-ए-आज़ादी का
थी जो दीवार कभी अब है वो दर की सूरत
न पूछो हम-सफ़रो मुझ से माजरा-ए-वतन
वतन है मुझ पे फ़िदा और मैं फ़िदा-ए-वतन
कारवाँ जिन का लुटा राह में आज़ादी की
क़ौम का मुल्क का उन दर्द के मारों को सलाम
वो हिन्दी नौजवाँ यानी अलम-बरदार-ए-आज़ादी
वतन की पासबाँ वो तेग़-ए-जौहर-दार-ए-आज़ादी
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तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर
राह-ए-वतन पर अपनी जानें लड़ाए जाओ