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अमीता परसुराम मीता

1955 | दिल्ली, भारत

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ज़िंदगी अपना सफ़र तय तो करेगी लेकिन

हम-सफ़र आप जो होते तो मज़ा और ही था

कौन था मेरे अलावा उस का

उस ने ढूँडे थे ठिकाने क्या क्या

तुझी से गुफ़्तुगू हर दम तिरी ही जुस्तुजू हर दम

मिरी आसानियाँ तुझ से मिरी मुश्किल है तू ही तू

सुब्ह-ए-रौशन को अंधेरों से भरी शाम दे

दिल के रिश्ते को मिरी जान कोई नाम दे

कुछ तो एहसास-ए-मोहब्बत से हुईं नम आँखें

कुछ तिरी याद के बादल भी भिगो जाते हैं

हों ख़्वाहिशें गिला कोई जफ़ा कोई

सवाल अहद-ए-वफ़ा का हो वही इश्क़ है

हम ने हज़ार फ़ासले जी कर तमाम शब

इक मुख़्तसर सी रात को मुद्दत बना दिया

दो किनारों को मिलाया था फ़क़त लहरों ने

हम अगर उस के थे वो भी हमारा कब था

वही चर्चे वही क़िस्से मिली रुस्वाइयाँ हम को

उन्ही क़िस्सों से वो मशहूर हो जाए तो क्या कीजे

कोई तदबीर तक़दीर से लेना-देना

बस यूँही फ़ैसले जो होने हैं हो जाते हैं

तेरा अंदाज़ निराला सब से

तीर तो एक निशाने क्या क्या