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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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सीमाब अकबराबादी

1882 - 1951 | आगरा, भारत

अग्रणी पूर्व-आधुनिक शायरों में विख्यात, सैंकड़ों शागिर्दों के उस्ताद।

अग्रणी पूर्व-आधुनिक शायरों में विख्यात, सैंकड़ों शागिर्दों के उस्ताद।

सीमाब अकबराबादी के शेर

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उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन

दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन

दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में

इक आईना था टूट गया देख-भाल में

दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में

इक आईना था टूट गया देख-भाल में

माज़ी-ए-मरहूम की नाकामियों का ज़िक्र छोड़

ज़िंदगी की फ़ुर्सत-ए-बाक़ी से कोई काम ले

माज़ी-ए-मरहूम की नाकामियों का ज़िक्र छोड़

ज़िंदगी की फ़ुर्सत-ए-बाक़ी से कोई काम ले

तुझे दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ

नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी

तुझे दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ

नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी

रोज़ कहता हूँ कि अब उन को देखूँगा कभी

रोज़ उस कूचे में इक काम निकल आता है

रोज़ कहता हूँ कि अब उन को देखूँगा कभी

रोज़ उस कूचे में इक काम निकल आता है

तेरे जल्वों ने मुझे घेर लिया है दोस्त

अब तो तन्हाई के लम्हे भी हसीं लगते हैं

तेरे जल्वों ने मुझे घेर लिया है दोस्त

अब तो तन्हाई के लम्हे भी हसीं लगते हैं

है हुसूल-ए-आरज़ू का राज़ तर्क-ए-आरज़ू

मैं ने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे

है हुसूल-ए-आरज़ू का राज़ तर्क-ए-आरज़ू

मैं ने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे

परेशाँ होने वालों को सुकूँ कुछ मिल भी जाता है

परेशाँ करने वालों की परेशानी नहीं जाती

परेशाँ होने वालों को सुकूँ कुछ मिल भी जाता है

परेशाँ करने वालों की परेशानी नहीं जाती

मिरी ख़ामोशियों पर दुनिया मुझ को तअन देती है

ये क्या जाने कि चुप रह कर भी की जाती हैं तक़रीरें

मिरी ख़ामोशियों पर दुनिया मुझ को तअन देती है

ये क्या जाने कि चुप रह कर भी की जाती हैं तक़रीरें

दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है

इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में

दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है

इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में

वो दुनिया थी जहाँ तुम बंद करते थे ज़बाँ मेरी

ये महशर है यहाँ सुननी पड़ेगी दास्ताँ मेरी

वो दुनिया थी जहाँ तुम बंद करते थे ज़बाँ मेरी

ये महशर है यहाँ सुननी पड़ेगी दास्ताँ मेरी

मरकज़ पे अपने धूप सिमटती है जिस तरह

यूँ रफ़्ता रफ़्ता तेरे क़रीब रहा हूँ मैं

मरकज़ पे अपने धूप सिमटती है जिस तरह

यूँ रफ़्ता रफ़्ता तेरे क़रीब रहा हूँ मैं

ख़ुलूस-ए-दिल से सज्दा हो तो उस सज्दे का क्या कहना

वहीं काबा सरक आया जबीं हम ने जहाँ रख दी

ख़ुलूस-ए-दिल से सज्दा हो तो उस सज्दे का क्या कहना

वहीं काबा सरक आया जबीं हम ने जहाँ रख दी

मिरी दीवानगी पर होश वाले बहस फ़रमाएँ

मगर पहले उन्हें दीवाना बनने की ज़रूरत है

मिरी दीवानगी पर होश वाले बहस फ़रमाएँ

मगर पहले उन्हें दीवाना बनने की ज़रूरत है

कहानी मेरी रूदाद-ए-जहाँ मालूम होती है

जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है

कहानी मेरी रूदाद-ए-जहाँ मालूम होती है

जो सुनता है उसी की दास्ताँ मालूम होती है

हाए 'सीमाब' उस की मजबूरी

जिस ने की हो शबाब में तौबा

हाए 'सीमाब' उस की मजबूरी

जिस ने की हो शबाब में तौबा

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे

एक दिल दे कर ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे

एक दिल दे कर ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे

मंज़िल मिली मुराद मिली मुद्दआ मिला

सब कुछ मुझे मिला जो तिरा नक़्श-ए-पा मिला

मंज़िल मिली मुराद मिली मुद्दआ मिला

सब कुछ मुझे मिला जो तिरा नक़्श-ए-पा मिला

देखते ही देखते दुनिया से मैं उठ जाऊँगा

देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे

देखते ही देखते दुनिया से मैं उठ जाऊँगा

देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे

क्या ढूँढने जाऊँ मैं किसी को

अपना मुझे ख़ुद पता नहीं है

क्या ढूँढने जाऊँ मैं किसी को

अपना मुझे ख़ुद पता नहीं है

मोहब्बत में इक ऐसा वक़्त भी आता है इंसाँ पर

सितारों की चमक से चोट लगती है रग-ए-जाँ पर

मोहब्बत में इक ऐसा वक़्त भी आता है इंसाँ पर

सितारों की चमक से चोट लगती है रग-ए-जाँ पर

हुस्न में जब नाज़ शामिल हो गया

एक पैदा और क़ातिल हो गया

हुस्न में जब नाज़ शामिल हो गया

एक पैदा और क़ातिल हो गया

कहानी है तो इतनी है फ़रेब-ए-ख़्वाब-ए-हस्ती की

कि आँखें बंद हूँ और आदमी अफ़्साना हो जाए

कहानी है तो इतनी है फ़रेब-ए-ख़्वाब-ए-हस्ती की

कि आँखें बंद हूँ और आदमी अफ़्साना हो जाए

ख़ुदा और नाख़ुदा मिल कर डुबो दें ये तो मुमकिन है

मेरी वज्ह-ए-तबाही सिर्फ़ तूफ़ाँ हो नहीं सकता

ख़ुदा और नाख़ुदा मिल कर डुबो दें ये तो मुमकिन है

मेरी वज्ह-ए-तबाही सिर्फ़ तूफ़ाँ हो नहीं सकता

दिल-ए-आफ़त-ज़दा का मुद्दआ क्या

शिकस्ता साज़ क्या उस की सदा क्या

दिल-ए-आफ़त-ज़दा का मुद्दआ क्या

शिकस्ता साज़ क्या उस की सदा क्या

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