Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

लोकप्रिय शेर

सरल और मनपसंद शायरी का संग्रह

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

Interpretation: Rekhta AI

वक्ता अपनी अयोग्यता स्वीकार करके विनम्रता दिखाता है, पर अपनी सच्ची चाह और लगातार प्रतीक्षा को अपने पक्ष में रखता है। वह कहता है कि मिलने की पात्रता सही, मेरी लगन तो देखी जाए। यहाँ “दीद” केवल देखना नहीं, बल्कि निकटता और कृपा का संकेत है। भाव का केंद्र तड़प, भक्ति-सा समर्पण और आशा है।

Interpretation: Rekhta AI

वक्ता अपनी अयोग्यता स्वीकार करके विनम्रता दिखाता है, पर अपनी सच्ची चाह और लगातार प्रतीक्षा को अपने पक्ष में रखता है। वह कहता है कि मिलने की पात्रता सही, मेरी लगन तो देखी जाए। यहाँ “दीद” केवल देखना नहीं, बल्कि निकटता और कृपा का संकेत है। भाव का केंद्र तड़प, भक्ति-सा समर्पण और आशा है।

अल्लामा इक़बाल

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर जन्नत के अस्तित्व पर एक चुलबुला कटाक्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी किसी उम्मीद की ज़रूरत होती है। जन्नत का यह 'ख़याल' एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर जन्नत के अस्तित्व पर एक चुलबुला कटाक्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी किसी उम्मीद की ज़रूरत होती है। जन्नत का यह 'ख़याल' एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो

जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

बशीर बद्र

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम

वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

अकबर इलाहाबादी

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर आत्म-शक्ति और आत्म-निर्माण का संदेश देता है। “स्वत्व/ख़ुदी” यहाँ जागरूक, अनुशासित और साहसी व्यक्तित्व का रूपक है जो हालात के आगे हार नहीं मानता। ईश्वर का बंदे से पूछना यह दिखाता है कि सही दिशा में बढ़ा हुआ इंसान केवल भाग्य पर नहीं टिकता, वह चुनता और गढ़ता है। भावनात्मक रूप से यह विश्वास, प्रयास और जिम्मेदारी की पुकार है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर आत्म-शक्ति और आत्म-निर्माण का संदेश देता है। “स्वत्व/ख़ुदी” यहाँ जागरूक, अनुशासित और साहसी व्यक्तित्व का रूपक है जो हालात के आगे हार नहीं मानता। ईश्वर का बंदे से पूछना यह दिखाता है कि सही दिशा में बढ़ा हुआ इंसान केवल भाग्य पर नहीं टिकता, वह चुनता और गढ़ता है। भावनात्मक रूप से यह विश्वास, प्रयास और जिम्मेदारी की पुकार है।

अल्लामा इक़बाल

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया

वर्ना हम भी आदमी थे काम के

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर यह कहना चाहता है कि इश्क़ के चक्कर में पड़कर वह अब किसी काम के नहीं रहे। वह एक दबी हुई आह के साथ याद करते हैं कि प्यार में पड़ने से पहले वो भी एक बहुत हुनरमंद और ज़रूरी इंसान थे, लेकिन अब सिर्फ़ नाम के रह गए हैं।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर यह कहना चाहता है कि इश्क़ के चक्कर में पड़कर वह अब किसी काम के नहीं रहे। वह एक दबी हुई आह के साथ याद करते हैं कि प्यार में पड़ने से पहले वो भी एक बहुत हुनरमंद और ज़रूरी इंसान थे, लेकिन अब सिर्फ़ नाम के रह गए हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

उन के देखे से जो जाती है मुँह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

Interpretation: Rekhta AI

प्रिय की मौजूदगी प्रेमी के चेहरे पर पल भर की रौनक ले आती है, जबकि भीतर की पीड़ा बनी रहती है। देखने वाले इस बाहरी चमक को सेहत का संकेत समझ लेते हैं और असली दुख नहीं देख पाते। शे’र प्रेम की ‘बीमारी’ और दिखने‑वाले हाल असली हाल के अंतर को मार्मिक ढंग से कहता है।

Interpretation: Rekhta AI

प्रिय की मौजूदगी प्रेमी के चेहरे पर पल भर की रौनक ले आती है, जबकि भीतर की पीड़ा बनी रहती है। देखने वाले इस बाहरी चमक को सेहत का संकेत समझ लेते हैं और असली दुख नहीं देख पाते। शे’र प्रेम की ‘बीमारी’ और दिखने‑वाले हाल असली हाल के अंतर को मार्मिक ढंग से कहता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ नरगिस को आँख का रूपक माना गया है और “बे-नूरी” से आशय भीतर की रोशनी/समझ की कमी है। “चमन” समाज या दुनिया है, जहाँ सही दृष्टि रखने वाला व्यक्ति बहुत कम मिलता है। भाव यह है कि अज्ञान और अंधापन लंबे समय तक रहता है, और सच्ची दूरदृष्टि का जन्म दुर्लभ होता है।

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ नरगिस को आँख का रूपक माना गया है और “बे-नूरी” से आशय भीतर की रोशनी/समझ की कमी है। “चमन” समाज या दुनिया है, जहाँ सही दृष्टि रखने वाला व्यक्ति बहुत कम मिलता है। भाव यह है कि अज्ञान और अंधापन लंबे समय तक रहता है, और सच्ची दूरदृष्टि का जन्म दुर्लभ होता है।

अल्लामा इक़बाल

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब

आज तुम याद बे-हिसाब आए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा

अहमद फ़राज़

ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता

एक ही शख़्स था जहान में क्या

जौन एलिया

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में प्रेम की चरम अवस्था दिखाई गई है, जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है। प्रेमी की जिंदगी का सहारा प्रिय का दर्शन है, लेकिन वही प्रिय इतना कठोर/उदासीन है कि उसी के कारण जान भी जा सकती है। एक ही चेहरा जीवन भी देता है और मृत्यु भी—यही तड़प और समर्पण का भाव है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में प्रेम की चरम अवस्था दिखाई गई है, जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है। प्रेमी की जिंदगी का सहारा प्रिय का दर्शन है, लेकिन वही प्रिय इतना कठोर/उदासीन है कि उसी के कारण जान भी जा सकती है। एक ही चेहरा जीवन भी देता है और मृत्यु भी—यही तड़प और समर्पण का भाव है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा हों

बशीर बद्र

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी

यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में कहने वाला बेवफ़ाई को सिर्फ़ ग़द्दारी नहीं मानता, बल्कि मानवी मजबूरी से जोड़कर देखता है। उसका ख़याल है कि अगर कोई दूर हुआ या वफ़ा निभा सका, तो ज़रूर कुछ दबाव, हालात या लाचारी रही होगी वरना कोई यूँ ही बेवफ़ा नहीं बन जाता। यह बात एक तरह की तसल्ली भी है और इल्ज़ाम को हल्का करने की कोशिश भी।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में कहने वाला बेवफ़ाई को सिर्फ़ ग़द्दारी नहीं मानता, बल्कि मानवी मजबूरी से जोड़कर देखता है। उसका ख़याल है कि अगर कोई दूर हुआ या वफ़ा निभा सका, तो ज़रूर कुछ दबाव, हालात या लाचारी रही होगी वरना कोई यूँ ही बेवफ़ा नहीं बन जाता। यह बात एक तरह की तसल्ली भी है और इल्ज़ाम को हल्का करने की कोशिश भी।

बशीर बद्र

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

Interpretation: Rekhta AI

बाज़ यहाँ ऊँचे हौसले और स्वतंत्र स्वभाव का प्रतीक है, जो रुककर नहीं जीता बल्कि ऊपर उठता रहता है। कवि कहता है कि संतोष करके ठहरना नहीं, आगे बढ़ते रहना चाहिए। “और भी आकाश” नए अवसरों और बड़ी मंज़िलों का रूपक है। भाव-केन्द्र में उम्मीद और निरंतर प्रयास की पुकार है।

Interpretation: Rekhta AI

बाज़ यहाँ ऊँचे हौसले और स्वतंत्र स्वभाव का प्रतीक है, जो रुककर नहीं जीता बल्कि ऊपर उठता रहता है। कवि कहता है कि संतोष करके ठहरना नहीं, आगे बढ़ते रहना चाहिए। “और भी आकाश” नए अवसरों और बड़ी मंज़िलों का रूपक है। भाव-केन्द्र में उम्मीद और निरंतर प्रयास की पुकार है।

अल्लामा इक़बाल

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल

जब आँख ही से टपका तो फिर लहू क्या है

Interpretation: Rekhta AI

ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।

Interpretation: Rekhta AI

ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।

मिर्ज़ा ग़ालिब

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'

दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

अहमद फ़राज़

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ

ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ

ख़्वाजा मीर दर्द

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

Interpretation: Rekhta AI

यह शे’र बताता है कि जो सीमा हमें आख़िरी लगती है, उसके आगे भी नई मंज़िलें होती हैं। “सितारे” यहाँ ऊँचाई और पहुँच की सीमा का संकेत हैं, और उनसे आगे बढ़ने की प्रेरणा है। दूसरी पंक्ति में प्रेम को निरंतर परीक्षा माना गया है, जिसमें हर कदम पर नया साहस और धैर्य चाहिए। भाव है—आशा के साथ आगे बढ़ते रहो, मंज़िल अभी बाकी है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शे’र बताता है कि जो सीमा हमें आख़िरी लगती है, उसके आगे भी नई मंज़िलें होती हैं। “सितारे” यहाँ ऊँचाई और पहुँच की सीमा का संकेत हैं, और उनसे आगे बढ़ने की प्रेरणा है। दूसरी पंक्ति में प्रेम को निरंतर परीक्षा माना गया है, जिसमें हर कदम पर नया साहस और धैर्य चाहिए। भाव है—आशा के साथ आगे बढ़ते रहो, मंज़िल अभी बाकी है।

अल्लामा इक़बाल

और क्या देखने को बाक़ी है

आप से दिल लगा के देख लिया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर मनुष्य की खत्म होने वाली चाहत और अतृप्ति को दिखाता है। “दम निकलना” एक रूपक है, जो बताता है कि इच्छा की तीव्रता इंसान को भीतर तक थका देती है। फिर भी, जब कई अरमान पूरे हो जाते हैं, तब भी संतोष नहीं मिलता, क्योंकि दिल की माँगें लगातार बढ़ती रहती हैं।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर मनुष्य की खत्म होने वाली चाहत और अतृप्ति को दिखाता है। “दम निकलना” एक रूपक है, जो बताता है कि इच्छा की तीव्रता इंसान को भीतर तक थका देती है। फिर भी, जब कई अरमान पूरे हो जाते हैं, तब भी संतोष नहीं मिलता, क्योंकि दिल की माँगें लगातार बढ़ती रहती हैं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

कि लगाए लगे और बुझाए बने

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में इश्क़ को ऐसी आग बताया गया है जो इंसान की मरज़ी से नहीं चलती। आप इसे अपने हिसाब से जगा सकते हैं, जगे हुए इश्क़ को आसानी से बुझा सकते हैं। भाव यह है कि प्यार भीतर से जलाता है और आदमी को बेबस कर देता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में इश्क़ को ऐसी आग बताया गया है जो इंसान की मरज़ी से नहीं चलती। आप इसे अपने हिसाब से जगा सकते हैं, जगे हुए इश्क़ को आसानी से बुझा सकते हैं। भाव यह है कि प्यार भीतर से जलाता है और आदमी को बेबस कर देता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी

तू अगर मेरा नहीं बनता बन अपना तो बन

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर कहता है कि जीवन का अर्थ बाहर नहीं, अपने भीतर झाँकने से मिलता है। “डूबना” अपने मन की गहराई में उतरने का रूपक है, जहाँ असली पहचान और दिशा मिलती है। दूसरे मिसरे में संदेश है कि किसी के पीछे चलने से बेहतर है खुद का होना—स्वतंत्र और जागरूक। भाव आत्मजागरण और स्वत्व का है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर कहता है कि जीवन का अर्थ बाहर नहीं, अपने भीतर झाँकने से मिलता है। “डूबना” अपने मन की गहराई में उतरने का रूपक है, जहाँ असली पहचान और दिशा मिलती है। दूसरे मिसरे में संदेश है कि किसी के पीछे चलने से बेहतर है खुद का होना—स्वतंत्र और जागरूक। भाव आत्मजागरण और स्वत्व का है।

अल्लामा इक़बाल

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल करोगे लेकिन

ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक

Interpretation: Rekhta AI

मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ कह रहे हैं कि उपेक्षा भले ही एक दिन खत्म हो जाए, पर वह खत्म होते-होते बहुत देर हो जाती है। “मिट्टी/धूल हो जाना” मृत्यु, समाप्त हो जाना या पूरी तरह टूट जाना का संकेत है। भाव यह है कि प्रेम में पहचान और ध्यान अगर देर से मिले, तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसी देर और बेबसी की टीस इस शेर का केंद्र है।

Interpretation: Rekhta AI

मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ कह रहे हैं कि उपेक्षा भले ही एक दिन खत्म हो जाए, पर वह खत्म होते-होते बहुत देर हो जाती है। “मिट्टी/धूल हो जाना” मृत्यु, समाप्त हो जाना या पूरी तरह टूट जाना का संकेत है। भाव यह है कि प्रेम में पहचान और ध्यान अगर देर से मिले, तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसी देर और बेबसी की टीस इस शेर का केंद्र है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा हो

अज्ञात

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज

मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं

Interpretation: Rekhta AI

मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ दुख को मन की आदत से जोड़ते हैं: बार-बार कष्ट सहने से मन मजबूत हो जाता है। लगातार कठिनाइयाँ मिलने पर उनका डर और तीखापन कम हो जाता है, क्योंकि इंसान उन्हें झेलना सीख लेता है। भाव यह है कि तकलीफ़ भी समय के साथ सहने लायक बन जाती है।

Interpretation: Rekhta AI

मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ दुख को मन की आदत से जोड़ते हैं: बार-बार कष्ट सहने से मन मजबूत हो जाता है। लगातार कठिनाइयाँ मिलने पर उनका डर और तीखापन कम हो जाता है, क्योंकि इंसान उन्हें झेलना सीख लेता है। भाव यह है कि तकलीफ़ भी समय के साथ सहने लायक बन जाती है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे

कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर 'ताल्ली' यानी ख़ुद की तारीफ़ का एक बेहतरीन उदाहरण है। शायर मानता है कि दुनिया में और भी अच्छे कवि हैं, लेकिन साथ ही यह दावा करता है कि उसकी शैली या अंदाज़-ए-बयाँ बाकियों से बिल्कुल हटकर है, जो उसे सबसे ख़ास बनाता है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर 'ताल्ली' यानी ख़ुद की तारीफ़ का एक बेहतरीन उदाहरण है। शायर मानता है कि दुनिया में और भी अच्छे कवि हैं, लेकिन साथ ही यह दावा करता है कि उसकी शैली या अंदाज़-ए-बयाँ बाकियों से बिल्कुल हटकर है, जो उसे सबसे ख़ास बनाता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

सुब्ह होती है शाम होती है

उम्र यूँही तमाम होती है

मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम

जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन

बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर उस इच्छा को दिखाता है जिसमें इंसान दुनिया की भागदौड़ से निकलकर बस समय पाना चाहता है। “दिन-रात” बताता है कि यह चाह लगातार है, थोड़ी देर की नहीं। “प्रियतम का कल्पना-चित्र” मन का सहारा है, जिसमें डूबकर बैठना भी सुकून बन जाता है। भाव का केंद्र एकांत में याद और तड़प के साथ जुड़ी मीठी डूबन है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर उस इच्छा को दिखाता है जिसमें इंसान दुनिया की भागदौड़ से निकलकर बस समय पाना चाहता है। “दिन-रात” बताता है कि यह चाह लगातार है, थोड़ी देर की नहीं। “प्रियतम का कल्पना-चित्र” मन का सहारा है, जिसमें डूबकर बैठना भी सुकून बन जाता है। भाव का केंद्र एकांत में याद और तड़प के साथ जुड़ी मीठी डूबन है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानाँ

दो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं

परवीन शाकिर

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना

निदा फ़ाज़ली

इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद

अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता

अकबर इलाहाबादी

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं

तुझे ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि अनुभव के कारण वह आने वाली बात को पहले ही भांप लेता है। “कदमों की आहट” ज़िंदगी के दुख-सुख, उसकी जिम्मेदारियाँ और बार-बार लौटने वाले हालात का संकेत है। ज़िंदगी से सीधे बात करके वह जताता है कि अब उसे कोई भ्रम नहीं रहता। भाव में थकान, समझ और स्वीकार का मेल है।

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि अनुभव के कारण वह आने वाली बात को पहले ही भांप लेता है। “कदमों की आहट” ज़िंदगी के दुख-सुख, उसकी जिम्मेदारियाँ और बार-बार लौटने वाले हालात का संकेत है। ज़िंदगी से सीधे बात करके वह जताता है कि अब उसे कोई भ्रम नहीं रहता। भाव में थकान, समझ और स्वीकार का मेल है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।

दाग़ देहलवी

ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है

क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम

साहिर लुधियानवी

हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद

जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपनी ही नादानी पर व्यंग्य कर रहे हैं कि हम ऐसे इंसान से वफ़ा की उम्मीद लगाए बैठे हैं जो 'वफ़ा' शब्द के अर्थ से ही अनजान है। यह प्रेमी की लाचारी और प्रेम की विडंबना को दर्शाता है कि उनकी आशा एक ऐसे व्यक्ति से है जो उसे पूरा करने के योग्य ही नहीं।

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपनी ही नादानी पर व्यंग्य कर रहे हैं कि हम ऐसे इंसान से वफ़ा की उम्मीद लगाए बैठे हैं जो 'वफ़ा' शब्द के अर्थ से ही अनजान है। यह प्रेमी की लाचारी और प्रेम की विडंबना को दर्शाता है कि उनकी आशा एक ऐसे व्यक्ति से है जो उसे पूरा करने के योग्य ही नहीं।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह

कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ग़ालिब उन दोस्तों से शिकायत करते हैं जो दर्द में मदद करने के बजाय उपदेश देने लगते हैं। “नासेह” यानी समझाने वाला दोस्त यहाँ अपनापन नहीं, बल्कि जज करने का भाव लाता है। कवि चाहता है कि दोस्त या तो समस्या का हल करें या कम से कम दुख बाँटें। भाव यह है कि बिना संवेदना की नसीहत दोस्ती को बेकार कर देती है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ग़ालिब उन दोस्तों से शिकायत करते हैं जो दर्द में मदद करने के बजाय उपदेश देने लगते हैं। “नासेह” यानी समझाने वाला दोस्त यहाँ अपनापन नहीं, बल्कि जज करने का भाव लाता है। कवि चाहता है कि दोस्त या तो समस्या का हल करें या कम से कम दुख बाँटें। भाव यह है कि बिना संवेदना की नसीहत दोस्ती को बेकार कर देती है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो

तुम को देखें कि तुम से बात करें

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर पास बैठे प्रिय की मौजूदगी में पैदा हुई मीठी झिझक को दिखाता है। देखने का सुख इतना गहरा है कि बोलने की हिम्मत रुक-रुक जाती है। मन में चाह भी है कि बात हो, और डर भी कि बोलते ही वह नाज़ुक सा पल टूट जाए। इसी दुविधा में प्रेम की तीव्रता झलकती है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर पास बैठे प्रिय की मौजूदगी में पैदा हुई मीठी झिझक को दिखाता है। देखने का सुख इतना गहरा है कि बोलने की हिम्मत रुक-रुक जाती है। मन में चाह भी है कि बात हो, और डर भी कि बोलते ही वह नाज़ुक सा पल टूट जाए। इसी दुविधा में प्रेम की तीव्रता झलकती है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'

कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ग़ालिब ने बहुत ही विनम्रता से महान शायर मीर तक़ी 'मीर' की बड़ाई की है। वे खुद को समझाते हुए कहते हैं कि भले ही आज मैं उस्ताद हूँ, लेकिन मुझसे पहले भी एक ऐसा शायर था जिसे ज़माना 'मीर' कहता था। यह शेर अपने से बड़ों का सम्मान करने और अपनी कला पर घमंड करने की सीख देता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ग़ालिब ने बहुत ही विनम्रता से महान शायर मीर तक़ी 'मीर' की बड़ाई की है। वे खुद को समझाते हुए कहते हैं कि भले ही आज मैं उस्ताद हूँ, लेकिन मुझसे पहले भी एक ऐसा शायर था जिसे ज़माना 'मीर' कहता था। यह शेर अपने से बड़ों का सम्मान करने और अपनी कला पर घमंड करने की सीख देता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

अंदाज़ अपना देखते हैं आइने में वो

और ये भी देखते हैं कोई देखता हो

निज़ाम रामपुरी

कोई समझे तो एक बात कहूँ

इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।

फ़िराक़ गोरखपुरी

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मकतब-ए-इश्क़ का दस्तूर निराला देखा

उस को छुट्टी मिले जिस को सबक़ याद रहे

मीर ताहिर अली रिज़वी

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ

मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ बोलने वाला प्रेम का थोड़ा-सा नहीं, उसका चरम चाहता है। दूसरी पंक्ति में वह अपनी ही चाह की बड़ी माँग को ‘भोलेपन’ कहकर मान लेता है। “अंत” या “सीमा” पूर्णता और पूरी तरह समर्पित होने का संकेत है, और “भोलेपन” में हल्की-सी आत्म-विडंबना भी है। भाव-केन्द्र ललक, भक्ति और विनम्रता है।

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ बोलने वाला प्रेम का थोड़ा-सा नहीं, उसका चरम चाहता है। दूसरी पंक्ति में वह अपनी ही चाह की बड़ी माँग को ‘भोलेपन’ कहकर मान लेता है। “अंत” या “सीमा” पूर्णता और पूरी तरह समर्पित होने का संकेत है, और “भोलेपन” में हल्की-सी आत्म-विडंबना भी है। भाव-केन्द्र ललक, भक्ति और विनम्रता है।

अल्लामा इक़बाल

'ज़फ़र' आदमी उस को जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का

जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा रहा

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में इंसान की कसौटी बुद्धि नहीं, बल्कि आचरण और ईश्वर-चेतना है। सुख में ईश्वर की याद कृतज्ञता और विनम्रता दिखाती है, और गुस्से में ईश्वर का डर संयम और न्याय बनाए रखता है। जो दोनों हालात में यह भूल जाए, उसकी समझ व्यर्थ और उसका चरित्र कमज़ोर हो जाता है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में इंसान की कसौटी बुद्धि नहीं, बल्कि आचरण और ईश्वर-चेतना है। सुख में ईश्वर की याद कृतज्ञता और विनम्रता दिखाती है, और गुस्से में ईश्वर का डर संयम और न्याय बनाए रखता है। जो दोनों हालात में यह भूल जाए, उसकी समझ व्यर्थ और उसका चरित्र कमज़ोर हो जाता है।

बहादुर शाह ज़फ़र

दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से

इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से

महताब राय ताबां

यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं

मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

बशीर बद्र

नशा पिला के गिराना तो सब को आता है

मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर आसान नुकसान पहुँचाने और मुश्किल मदद करने का फर्क दिखाता है। ‘नशा’ यहाँ किसी भी ऐसे लालच या असर का रूपक है जो इंसान को कमज़ोर कर दे, और ‘साक़ी’ उस व्यक्ति का प्रतीक है जिसके हाथ में देना या रोकना है। कवि कहता है गिराना तो आम है, असली महानता गिरते को सहारा देकर बचाने में है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर आसान नुकसान पहुँचाने और मुश्किल मदद करने का फर्क दिखाता है। ‘नशा’ यहाँ किसी भी ऐसे लालच या असर का रूपक है जो इंसान को कमज़ोर कर दे, और ‘साक़ी’ उस व्यक्ति का प्रतीक है जिसके हाथ में देना या रोकना है। कवि कहता है गिराना तो आम है, असली महानता गिरते को सहारा देकर बचाने में है।

अल्लामा इक़बाल
बोलिए