आरज़ू पर शेर

आरज़ूएं, तमन्नाएं, ख़्वाहिशें

ज़िन्दगी में इतने रंग भरती हैं जिनका शुमार भी मुश्किल है। ज़िन्दगी के यही रंग जब शायरी मे ढलते हैं तो कमाल को हुस्न बिखेरते हैं। आरज़ू शायरी के हज़ारों नमूने उर्दू के हर दौर की शायरी में मौजूद हैं। रेख़्ता पर आरज़ू शायरी का यह ख़ूबसूरत गुलदस्ता हाज़िर हैः

जी भर के देखा कुछ बात की

बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

बशीर बद्र

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

मिर्ज़ा ग़ालिब

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आरज़ू है कि तू यहाँ आए

और फिर उम्र भर जाए कहीं

नासिर काज़मी

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

कैफ़ी आज़मी

जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना

वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था

जौन एलिया

मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद

उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई

असरार-उल-हक़ मजाज़

मिरी अपनी और उस की आरज़ू में फ़र्क़ ये था

मुझे बस वो उसे सारा ज़माना चाहिए था

बुशरा एजाज़

तुम्हारी याद में जीने की आरज़ू है अभी

कुछ अपना हाल सँभालूँ अगर इजाज़त हो

जौन एलिया

यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू मिला

किसी को हम मिले और हम को तू मिला

ज़फ़र इक़बाल

ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम

विसाल-ए-यार फ़क़त आरज़ू की बात नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मरते हैं आरज़ू में मरने की

मौत आती है पर नहीं आती

मिर्ज़ा ग़ालिब

आरज़ू तेरी बरक़रार रहे

दिल का क्या है रहा रहा रहा

हसरत मोहानी

हम क्या करें अगर तिरी आरज़ू करें

दुनिया में और भी कोई तेरे सिवा है क्या

हसरत मोहानी

मुझे ये डर है तिरी आरज़ू मिट जाए

बहुत दिनों से तबीअत मिरी उदास नहीं

नासिर काज़मी

बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए

हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते

मजरूह सुल्तानपुरी

ख़्वाब, उम्मीद, तमन्नाएँ, तअल्लुक़, रिश्ते

जान ले लेते हैं आख़िर ये सहारे सारे

इमरान-उल-हक़ चौहान

ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना

ये आरज़ू थी कि बस तेरी आरज़ू करते

अख़्तर शीरानी

सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है

जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते

अहमद फ़राज़

आरज़ू हसरत और उम्मीद शिकायत आँसू

इक तिरा ज़िक्र था और बीच में क्या क्या निकला

सरवर आलम राज़

ना-उमीदी बढ़ गई है इस क़दर

आरज़ू की आरज़ू होने लगी

दाग़ देहलवी

तिरी आरज़ू तिरी जुस्तुजू में भटक रहा था गली गली

मिरी दास्ताँ तिरी ज़ुल्फ़ है जो बिखर बिखर के सँवर गई

बशीर बद्र

कटती है आरज़ू के सहारे पे ज़िंदगी

कैसे कहूँ किसी की तमन्ना चाहिए

शाद आरफ़ी

आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या

क्या बताऊँ कि मेरे दिल में है अरमाँ क्या क्या

अख़्तर शीरानी

होती कहाँ है दिल से जुदा दिल की आरज़ू

जाता कहाँ है शम्अ को परवाना छोड़ कर

जलील मानिकपूरी

ये आरज़ू थी तुझे गुल के रू-ब-रू करते

हम और बुलबुल-ए-बेताब गुफ़्तुगू करते

व्याख्या

यह आतिश के मशहूर अशआर में से एक है। आरज़ू के मानी तमन्ना है , रूबरू के मानी आमने सामने, बेताब के मानी बेक़रार है। बुलबुल-ए-बेताब यानी वो बुलबुल जो बेक़रार हो जिसे चैन हो।

इस शे’र का शाब्दिक अर्थ तो ये है कि हमें ये तमन्ना थी कि महबूब हम तुझे गुल के सामने बिठाते और फिर बुलबुल जो बेचैन है उससे बातचीत करते।

लेकिन इसमें अस्ल में शायर ये कहता है कि हमने एक तमन्ना की थी कि हम अपने महबूब को फूल के सामने बिठाते और फिर बुलबुल जो गुल के इश्क़ में बेताब है उससे गुफ़्तगू करते। मतलब ये कि हमारी इच्छा थी कि हम अपने गुल जैसे चेहरे वाले महबूब को गुल के सामने बिठाते और फिर उस बुलबुल से जो गुल के हुस्न की वज्ह से उसका दीवाना बन गया है उससे गुफ़्तगू करते यानी बहस करते और पूछते कि बुलबुल अब बता कौन ख़ूबसूरत है, तुम्हारा गुल या मेरा महबूब। ज़ाहिर है इस बात पर बहस होती और आख़िर बुलबुल जो गुल के हुस्न में दीवाना हो गया है अगर मेरे महबूब के हुस्न को देखेगा तो गुल की तारीफ़ में चहचहाना भूल जाएगा।

शफ़क़ सुपुरी

हैदर अली आतिश

दिल में वो भीड़ है कि ज़रा भी नहीं जगह

आप आइए मगर कोई अरमाँ निकाल के

जलील मानिकपूरी

तुझ से सौ बार मिल चुके लेकिन

तुझ से मिलने की आरज़ू है वही

जलील मानिकपूरी

अरमान वस्ल का मिरी नज़रों से ताड़ के

पहले ही से वो बैठ गए मुँह बिगाड़ के

लाला माधव राम जौहर

बाद मरने के भी छोड़ी रिफ़ाक़त मेरी

मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी

अमीर मीनाई

बड़ी आरज़ू थी हम को नए ख़्वाब देखने की

सो अब अपनी ज़िंदगी में नए ख़्वाब भर रहे हैं

उबैदुल्लाह अलीम

डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं

सुनसान घर ये क्यूँ हो मेहमान तो गया

दाग़ देहलवी

तिरी वफ़ा में मिली आरज़ू-ए-मौत मुझे

जो मौत मिल गई होती तो कोई बात भी थी

ख़लील-उर-रहमान आज़मी

किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं

तिरे तकिए के नीचे भी हमारे ख़्वाब रक्खे हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

है हुसूल-ए-आरज़ू का राज़ तर्क-ए-आरज़ू

मैं ने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे

सीमाब अकबराबादी

तमन्ना तिरी है अगर है तमन्ना

तिरी आरज़ू है अगर आरज़ू है

ख़्वाजा मीर दर्द

बे-आरज़ू भी ख़ुश हैं ज़माने में बाज़ लोग

याँ आरज़ू के साथ भी जीना हराम है

शुजा ख़ावर

क्या वो ख़्वाहिश कि जिसे दिल भी समझता हो हक़ीर

आरज़ू वो है जो सीने में रहे नाज़ के साथ

अकबर इलाहाबादी

वो जो रात मुझ को बड़े अदब से सलाम कर के चला गया

उसे क्या ख़बर मिरे दिल में भी कभी आरज़ू-ए-गुनाह थी

अहमद मुश्ताक़

तुम्हारी आरज़ू में मैं ने अपनी आरज़ू की थी

ख़ुद अपनी जुस्तुजू का आप हासिल हो गया हूँ मैं

शहज़ाद अहमद

खुल गया उन की आरज़ू में ये राज़

ज़ीस्त अपनी नहीं पराई है

शकील बदायुनी

आज तक दिल की आरज़ू है वही

फूल मुरझा गया है बू है वही

जलाल मानकपुरी

बहुत अज़ीज़ थी ये ज़िंदगी मगर हम लोग

कभी कभी तो किसी आरज़ू में मर भी गए

अब्बास रिज़वी

इस लिए आरज़ू छुपाई है

मुँह से निकली हुई पराई है

क़मर जलालवी

ख़्वाहिशों ने डुबो दिया दिल को

वर्ना ये बहर-ए-बे-कराँ होता

इस्माइल मेरठी

तलातुम आरज़ू में है तूफ़ाँ जुस्तुजू में है

जवानी का गुज़र जाना है दरिया का उतर जाना

तिलोकचंद महरूम

वस्ल की बनती हैं इन बातों से तदबीरें कहीं

आरज़ूओं से फिरा करती हैं तक़दीरें कहीं

हसरत मोहानी

एक भी ख़्वाहिश के हाथों में मेहंदी लग सकी

मेरे जज़्बों में दूल्हा बन सका अब तक कोई

इक़बाल साजिद

कभी मौज-ए-ख़्वाब में खो गया कभी थक के रेत पे सो गया

यूँही उम्र सारी गुज़ार दी फ़क़त आरज़ू-ए-विसाल में

असअ'द बदायुनी

मुद्दत से आरज़ू है ख़ुदा वो घड़ी करे

हम तुम पिएँ जो मिल के कहीं एक जा शराब

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
बोलिए