क़िस्मत पर शेर
क़िस्मत एक मज़हबी तसव्वुर
है जिस के मुताबिक़ इंसान अपने हर अमल में पाबंद है। वो वही करता जो ख़ुदा ने उस की क़िस्मत में लिख दिया है और उस की ज़िंदगी की सारी शक्लें इसी लिखे हुए के मुताबिक़ ज़हूर पज़ीर होती हैं। शयरी में क़िस्मत के मौज़ू पर बहुत सी बारीक और फ़लसफ़ियाना बातें भी की गई हैं और क़िस्मत का मौज़ू ख़ालिस इश्क़ के बाब में भी बर्ता गया है। इस सूरत में आशिक़ अपनी क़िस्मत के बुरे होने पर आँसू बहाता है।
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
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टैग्ज़ : फ़ेमस शायरीऔर 3 अन्य
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
Interpretation:
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शायर का कहना है कि प्रेमी से मिलन उनकी किस्मत में था ही नहीं। उन्हें अपनी मौत का या जीवन के छोटा होने का कोई अफ़सोस नहीं है, क्योंकि अगर ज़िंदगी लंबी होती तो भी मिलन नहीं होता, बस इंतज़ार का दुख और लंबा खिंच जाता। यह शेर नाकामी को स्वीकार करने की बात करता है।
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
Interpretation:
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इस शेर में “दो गज़ ज़मीन” जीवन के बाद मिलने वाली सबसे छोटी जगह, यानी कब्र की जगह, का प्रतीक है। “प्रेमिका का मुहल्ला” अपनापन, पास होने और स्वीकार होने का संकेत बन जाता है। भाव यह है कि वक्ता अंतिम समय में भी अपने प्रिय के पास रहना चाहता है, लेकिन भाग्य उसे उस नज़दीकी से भी वंचित कर देता है।
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टैग : फ़ेमस शायरी
किसी के तुम हो किसी का ख़ुदा है दुनिया में
मिरे नसीब में तुम भी नहीं ख़ुदा भी नहीं
तुम हमारे किसी तरह न हुए
वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता
Interpretation:
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वक्ता का दुख यह है कि बहुत कोशिश के बाद भी प्रेम का साथ नहीं मिला। दूसरी पंक्ति कहती है कि दुनिया में तो सब कुछ हो सकता है, लेकिन यही एक बात नहीं हो पाई। इसमें किस्मत के आगे बेबसी और अधूरे प्रेम की तड़प झलकती है।
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है
बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में
Interpretation:
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बुलबुल यहाँ नाज़ुक दिल/प्रेमी का संकेत है और माली व शिकारी दुख के कारणों के प्रतीक हैं। शायर कहता है कि जब क़ैद पहले से भाग्य में लिखी हो, तो किसी पर दोष लगाने से क्या होगा। बसंत, जो खुशी और आज़ादी का मौसम माना जाता है, उसमें भी क़ैद होना पीड़ा को और तीखा बनाता है। भाव है लाचारगी और कड़वा स्वीकार।
यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला
किसी को हम न मिले और हम को तू न मिला
बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद
कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया
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हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल
ऐ ज़िंदगी वगर्ना ज़माने में क्या न था
रोज़ वो ख़्वाब में आते हैं गले मिलने को
मैं जो सोता हूँ तो जाग उठती है क़िस्मत मेरी
खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है
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यह दोहा-जैसा असर रखने वाला शेर बिछड़ने की चोट और बेचैनी दिखाता है। प्रिय के चले जाने से बोलने वाले को लगता है कि जीवन की पूरी चाल ही उलट गई। इसलिए वह एक ही सवाल दोहराता है, क्योंकि उसे सब कुछ किस्मत के आगे बेबस लगता है। भाव का केंद्र तड़प, निराशा और असहायता है।
टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर
वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए
नैरंगी-ए-सियासत-ए-दौराँ तो देखिए
मंज़िल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र न थे
कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से
तुझ से क़िस्मत में मिरी सूरत-ए-क़ुफ़्ल-ए-अबजद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना
Interpretation:
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ग़ालिब अपनी किस्मत की तुलना 'क़ुफ़्ल-ए-अबजद' (अक्षरों वाले ताले) से करते हैं। इस ताले में जब सही शब्द (बात) बनता है, तभी ताला खुलता है और उसके हिस्से अलग हो जाते हैं। भाव यह है कि जैसे ही रिश्ते में बात बनती है या नज़दीकी होती है, उसी सफलता के कारण तुरंत जुदाई आ जाती है।
जुस्तुजू करनी हर इक अम्र में नादानी है
जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है
कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा
होता रहता है यूँ ही क़र्ज़ बराबर मेरा
ख़ुश-नसीबी में है यही इक ऐब
बद-नसीबों के घर नहीं आती
ज़ोर क़िस्मत पे चल नहीं सकता
ख़ामुशी इख़्तियार करता हूँ
सुना है अब भी मिरे हाथ की लकीरों में
नजूमियों को मुक़द्दर दिखाई देता है
बा'द मरने के मिरी क़ब्र पे आया 'ग़ाफ़िल'
याद आई मिरे ईसा को दवा मेरे बा'द
तदबीर से क़िस्मत की बुराई नहीं जाती
बिगड़ी हुई तक़दीर बनाई नहीं जाती
Interpretation:
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इस शेर में दाग़ देहलवी कहते हैं कि इंसान की कोशिश की एक सीमा होती है और भाग्य का असर बहुत गहरा है। “क़िस्मत की बुराई” को ऐसी कमी माना गया है जो योजना से नहीं मिटती। भाव-भूमि थकी हुई स्वीकृति की है: कुछ मोड़ ऐसे हैं जिन्हें चाहकर भी बदला नहीं जा सकता।
अपनी क़िस्मत में सभी कुछ था मगर फूल न थे
तुम अगर फूल न होते तो हमारे होते
ख़ुदा तौफ़ीक़ देता है जिन्हें वो ये समझते हैं
कि ख़ुद अपने ही हाथों से बना करती हैं तक़दीरें
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन
मेरे हवास इश्क़ में क्या कम हैं मुंतशिर
मजनूँ का नाम हो गया क़िस्मत की बात है
तुम्हें पता है मिरे हाथ की लकीरों में
तुम्हारे नाम के सारे हुरूफ़ बनते हैं
दौलत नहीं काम आती जो तक़दीर बुरी हो
क़ारून को भी अपना ख़ज़ाना नहीं मिलता
मक़्बूल हों न हों ये मुक़द्दर की बात है
सज्दे किसी के दर पे किए जा रहा हूँ मैं
कभी मेरी तलब कच्चे घड़े पर पार उतरती है
कभी महफ़ूज़ कश्ती में सफ़र करने से डरता हूँ
हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका
सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा
'अदम' रोज़-ए-अजल जब क़िस्मतें तक़्सीम होती थीं
मुक़द्दर की जगह मैं साग़र-ओ-मीना उठा लाया
वस्ल की बनती हैं इन बातों से तदबीरें कहीं
आरज़ूओं से फिरा करती हैं तक़दीरें कहीं
देखिए क्या दिखाती है तक़दीर
चुप खड़ा हूँ गुनाहगारों में
लिक्खा है जो तक़दीर में होगा वही ऐ दिल
शर्मिंदा न करना मुझे तू दस्त-ए-दुआ का
ऐसी क़िस्मत कहाँ कि जाम आता
बू-ए-मय भी इधर नहीं आई
शायरी है सरमाया ख़ुश-नसीब लोगों का
बाँस की हर इक टहनी बाँसुरी नहीं होती
अपने माथे की शिकन तुम से मिटाई न गई
अपनी तक़दीर के बल हम से निकाले न गए
यार पर इल्ज़ाम कैसा ऐ दिल-ए-ख़ाना-ख़राब
जो किया तुझ से तिरी क़िस्मत ने उस ने क्या किया
इश्क़ ने मंसब लिखे जिस दिन मिरी तक़दीर में
दाग़ की नक़दी मिली सहरा मिला जागीर में
जो चल पड़े थे अज़्म-ए-सफ़र ले के थक गए
जो लड़खड़ा रहे थे वो मंज़िल पे आए हैं
उसी को दश्त-ए-ख़िज़ाँ ने किया बहुत पामाल
जो फूल सब से हसीं मौसम-ए-बहार में था
मेरी क़िस्मत है ये आवारा-ख़िरामी 'साजिद'
दश्त को राह निकलती है न घर आता है
मैं जाँ-ब-लब हूँ ऐ तक़दीर तेरे हाथों से
कि तेरे आगे मिरी कुछ न चल सकी तदबीर
मैं भी इक मौज हूँ मेरा भी मुक़द्दर है सफ़र
कैसे साहिल पे खड़े रह के समुंदर देखूँ