दिल शायरी

दिल शायरी के इस इन्तिख़ाब को पढ़ते हुए आप अपने दिल की हालतों, कैफ़ियतों और सूरतों से गुज़़रेंगे और हैरान होंगे कि किस तरह किसी दूसरे, तीसरे आदमी का ये बयान दर-अस्ल आप के अपने दिल की हालत का बयान है। इस बयान में दिल की आरज़ुएँ हैं, उमंगें हैं, हौसले हैं, दिल की गहराइयों में जम जाने वाली उदासियाँ हैं, महरूमियाँ हैं, दिल की तबाह-हाली है, वस्ल की आस है, हिज्र का दुख है।


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अँधेरी रात को मैं रोज़-ए-इश्क़ समझा था


चराग़ तू ने जलाया तो दिल बुझा मेरा

आईना छोड़ के देखा किए सूरत मेरी


दिल-ए-मुज़्तर ने मिरे उन को सँवरने दिया

आबादी भी देखी है वीराने भी देखे हैं


जो उजड़े और फिर बसे दिल वो निराली बस्ती है

आदमी आदमी से मिलता है


दिल मगर कम किसी से मिलता है

आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है


जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है

आज तक दिल की आरज़ू है वही


फूल मुरझा गया है बू है वही

आने वाली है क्या बला सर पर


आज फिर दिल में दर्द है कम कम

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें


हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं

''आप की याद आती रही रात भर''


चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें


दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की

आरज़ू तेरी बरक़रार रहे


दिल का क्या है रहा रहा रहा

आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या


क्या बताऊँ कि मेरे दिल में है अरमाँ क्या क्या

अब दिलों में कोई गुंजाइश नहीं मिलती 'हयात'


बस किताबों में लिक्खा हर्फ़-ए-वफ़ा रह जाएगा

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा


तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

अच्छी सूरत नज़र आते ही मचल जाता है


किसी आफ़त में डाले दिल-ए-नाशाद मुझे

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का


बस इक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का

अनहोनी कुछ ज़रूर हुई दिल के साथ आज


नादान था मगर ये दिवाना कभी था

अक़्ल कहती है दोबारा आज़माना जहल है


दिल ये कहता है फ़रेब-ए-दोस्त खाते जाइए

अक़्ल दिल अपनी अपनी कहें जब 'ख़ुमार'


अक़्ल की सुनिए दिल का कहा कीजिए

इक बात कहें तुम से ख़फ़ा तो नहीं होगे


पहलू में हमारे दिल-ए-मुज़्तर नहीं मिलता

इक इश्क़ का ग़म आफ़त और उस पे ये दिल आफ़त


या ग़म दिया होता या दिल दिया होता

इन शोख़ हसीनों पे जो माइल नहीं होता


कुछ और बला होती है वो दिल नहीं होता

इतना मैं इंतिज़ार किया उस की राह में


जो रफ़्ता रफ़्ता दिल मिरा बीमार हो गया

इज़हार-ए-हाल का भी ज़रीया नहीं रहा


दिल इतना जल गया है कि आँखों में नम नहीं

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