श्रद्धांजलि पर शेर
अच्छे लोग कभी नहीं मरते
वो अपनी माद्दी जिस्मानी सूरत से तो आज़ाद हो जाते हैं लेकिन उनकी यादें दिलों में हमेशा घर किए रहती हैं और हम उन्हें वक़्तन फ़वक़्तन याद करते रहते हैं। यहाँ हम कुछ ऐसे ही शेर पेश कर रहे हैं जो गुज़रे हुओं को याद करने और उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करने की मुख़्तलिफ़ सूरतों, जज़्बों और एहसासात की तर्जुमानी करते हैं।
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
नरगिस का फूल हजारों साल अपनी रोशनी न होने, यानी न देख पाने पर रोता रहता है।
बाग़ यानी दुनिया में सचमुच दूरदर्शी इंसान बहुत मुश्किल से पैदा होता है।
यहाँ नरगिस को आँख का रूपक माना गया है और “बे-नूरी” से आशय भीतर की रोशनी/समझ की कमी है। “चमन” समाज या दुनिया है, जहाँ सही दृष्टि रखने वाला व्यक्ति बहुत कम मिलता है। भाव यह है कि अज्ञान और अंधापन लंबे समय तक रहता है, और सच्ची दूरदृष्टि का जन्म दुर्लभ होता है।
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बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई
इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया
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कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए
मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
मुझे साधारण मत समझो; आसमान बरसों तक घूमता रहता है।
तभी मिट्टी के परदे के भीतर से इंसान निकलते हैं।
इस शेर में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को हल्का नहीं आंकना चाहिए। “आसमान का बरसों घूमना” समय और भाग्य की लंबी प्रक्रिया का संकेत है, और “मिट्टी का परदा” हमारी धरती जैसी साधारण उत्पत्ति को दिखाता है। भाव यह है कि सच्ची इंसानियत और क़द्र धीरे-धीरे बनती है, तुरंत नहीं। इसमें आत्मसम्मान भी है और विनम्रता भी।
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मौत उस की है करे जिस का ज़माना अफ़्सोस
यूँ तो दुनिया में सभी आए हैं मरने के लिए
जिन से मिल कर ज़िंदगी से इश्क़ हो जाए वो लोग
आप ने शायद न देखे हों मगर ऐसे भी हैं
लोग अच्छे हैं बहुत दिल में उतर जाते हैं
इक बुराई है तो बस ये है कि मर जाते हैं
जाने वाले कभी नहीं आते
जाने वालों की याद आती है
तेरी महफ़िल से जो निकला तो ये मंज़र देखा
मुझे लोगों ने बुलाया मुझे छू कर देखा
एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा
आँख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा
एक रौशन दिमाग़ था न रहा
शहर में इक चराग़ था न रहा
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सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
सारे सुंदर लोग वापस नहीं आए, उनमें से कुछ ही फूलों के रूप में दिखाई दिए हैं।
न जाने मिट्टी में कितने सुंदर चेहरे दफ़न होंगे जो हमेशा के लिए छिप गए।
ग़ालिब का विचार है कि ज़मीन से उगने वाले सुंदर फूल दरअसल उन हसीन लोगों का रूप हैं जो मरने के बाद मिट्टी में मिल गए। शायर अफ़सोस जताते हैं कि फूलों के रूप में तो बस कुछ ही चेहरे दिखे, जबकि अनगिनत सुंदर सूरतें अभी भी मिट्टी (ख़ाक) के अंदर छिपी हुई हैं।
उठ गई हैं सामने से कैसी कैसी सूरतें
रोइए किस के लिए किस किस का मातम कीजिए
अब नहीं लौट के आने वाला
घर खुला छोड़ के जाने वाला
कल उस की आँख ने क्या ज़िंदा गुफ़्तुगू की थी
गुमान तक न हुआ वो बिछड़ने वाला है
वे सूरतें इलाही किस मुल्क बस्तियाँ हैं
अब देखने को जिन के आँखें तरसतियाँ हैं
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जिन्हें अब गर्दिश-ए-अफ़्लाक पैदा कर नहीं सकती
कुछ ऐसी हस्तियाँ भी दफ़्न हैं गोर-ए-ग़रीबाँ में
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ये हिजरतें हैं ज़मीन ओ ज़माँ से आगे की
जो जा चुका है उसे लौट कर नहीं आना
वो क्या गया कि हर इक शख़्स रह गया तन्हा
उसी के दम से थीं बाहम रिफाक़तें सारी
झोंके नसीम-ए-ख़ुल्द के होने लगे निसार
जन्नत को इस गुलाब का था कब से इंतिज़ार