जन्नत पर शेर
जन्नत का तसव्वुर हज़ारों
साल पुराना है इन्सान की कल्पना की उड़ान जो कुछ अच्छा देख सकती है और अपने दामन में समेटना चाहती है वह सब कुछ जन्नत में मौजूद है। शायरों को जन्नत से एक ख़ास लगाव इस लिए भी है कि जन्नत के नज़्ज़ारे कभी-कभी महबूब की गलियों की झलक भी पेश करते हैं। जन्नत शायरी के ये नज़्ज़ारे शायद आपको भी पसंद आएः
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर जन्नत के अस्तित्व पर एक चुलबुला कटाक्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी न किसी उम्मीद की ज़रूरत होती है। जन्नत का यह 'ख़याल' एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।
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ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर जन्नत को इनाम समझकर की जाने वाली भक्ति से दूरी दिखाता है। कवि कहता है कि ऐसे इनाम ज़ाहिदों को मुबारक, क्योंकि उसकी चाहत इनाम नहीं बल्कि ईश्वर की सीधी उपस्थिति है। इसमें प्रेम, साहस और अपने अस्तित्व की दृढ़ता झलकती है—तोहफ़ों से आगे, स्वयं सत्य का सामना।
जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई
Interpretation:
Rekhta AI
दाग़ देहलवी स्वर्ग की आम कल्पना—हूरें और अनंत सुख—को तुच्छ बताते हैं। दूसरा मिसरा सवाल के रूप में इनकार है: जब दिल की असली चाह (महबूब/सच्चा सुकून) न मिले, तो स्वर्ग भी बेकार है। शेर प्रेम की तीव्रता और बाहरी लालच से उदासीनता दिखाता है।
मैं समझता हूँ कि है जन्नत ओ दोज़ख़ क्या चीज़
एक है वस्ल तिरा एक है फ़ुर्क़त तेरी
जन्नत मिली झूटों को अगर झूट के बदले
सच्चों को सज़ा में है जहन्नम भी गवारा
गुनाहगार के दिल से न बच के चल ज़ाहिद
यहीं कहीं तिरी जन्नत भी पाई जाती है
अपनी जन्नत मुझे दिखला न सका तू वाइज़
कूचा-ए-यार में चल देख ले जन्नत मेरी
कहते हैं जिस को जन्नत वो इक झलक है तेरी
सब वाइज़ों की बाक़ी रंगीं-बयानियाँ हैं
गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन
ऐसा लगा बसर हुए जन्नत में चार दिन
मेरी जन्नत तिरी निगाह-ए-करम
मुझ से फिर जाए ये ख़ुदा न करे
वाइज़-ए-ना-समझ पिएँ शर्बत
हम कहाँ ख़ुल्द से बहलते हैं