बेकसी शायरी

ज़िन्दगी की धूप-छाँव हमेशा एक सी नहीं रहती। वक़्त और हालात आ’म इन्सान के हों या आशिक़ और शायर के, इन्हें बदलते देर नहीं लगती ताक़त और इख़्तियार के लम्हे बेकसी और बेबसी के पलों में तब्दील होते हैं तो शायर की तड़प और दुख-दर्द लफ़ज़ों में ढल जाते हैं, ऐसे लफ़्ज़ जो दुखे दिलों की कहानी भी होते हैं और बेहतरीन शायरी भी। बेकसी शायरी का यह इन्तिख़ाब पेश हैः

ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ

हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते

उम्मीद फ़ाज़ली

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो थी

जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो थी

conversing has never been so diffficult for me

your company now is no more as it used to be

बहादुर शाह ज़फ़र

मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का

मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है

बशीर बद्र

आए है बेकसी-ए-इश्क़ पे रोना 'ग़ालिब'

किस के घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बअ'द

मिर्ज़ा ग़ालिब

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली

तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी दुनिया से जा मिली

साक़ी फ़ारुक़ी

कश्तियाँ टूट गई हैं सारी

अब लिए फिरता है दरिया हम को

बाक़ी सिद्दीक़ी

सब ने ग़ुर्बत में मुझ को छोड़ दिया

इक मिरी बेकसी नहीं जाती

बेदम शाह वारसी

इधर से आज वो गुज़रे तो मुँह फेरे हुए गुज़रे

अब उन से भी हमारी बे-कसी देखी नहीं जाती

असर लखनवी

ज़मीं रोई हमारे हाल पर और आसमाँ रोया

हमारी बेकसी को देख कर सारा जहाँ रोया

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

अबस दिल बे-कसी पे अपनी अपनी हर वक़्त रोता है

कर ग़म दिवाने इश्क़ में ऐसा ही होता है

ख़ान आरज़ू सिराजुद्दीन अली

आशिक़ की बे-कसी का तो आलम पूछिए

मजनूँ पे क्या गुज़र गई सहरा गवाह है

हफ़ीज़ जौनपुरी

आँखें भी हाए नज़अ में अपनी बदल गईं

सच है कि बेकसी में कोई आश्ना नहीं

ख़्वाजा मीर दर्द

अरी बेकसी तेरे क़ुर्बान जाऊँ

बुरे वक़्त में एक तू रह गई है

शरफ़ुद्दीन इल्हाम

कर के दफ़्न अपने पराए चल दिए

बेकसी का क़ब्र पर मातम रहा

अहसन मारहरवी

क्यूँ मोज़ाहिम है मेरे आने से

कुइ तिरा घर नहीं ये रस्ता है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम