मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
मुझे साधारण मत समझो; आसमान बरसों तक घूमता रहता है।
तभी मिट्टी के परदे के भीतर से इंसान निकलते हैं।
इस शेर में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को हल्का नहीं आंकना चाहिए। “आसमान का बरसों घूमना” समय और भाग्य की लंबी प्रक्रिया का संकेत है, और “मिट्टी का परदा” हमारी धरती जैसी साधारण उत्पत्ति को दिखाता है। भाव यह है कि सच्ची इंसानियत और क़द्र धीरे-धीरे बनती है, तुरंत नहीं। इसमें आत्मसम्मान भी है और विनम्रता भी।
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इधर फ़लक को है ज़िद बिजलियाँ गिराने की
उधर हमें भी है धुन आशियाँ बनाने की
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गुनगुनाती हुई आती हैं फ़लक से बूँदें
कोई बदली तिरी पाज़ेब से टकराई है
वो चार चाँद फ़लक को लगा चला हूँ 'क़मर'
कि मेरे बा'द सितारे कहेंगे अफ़्साने
फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं
हवा कहती है मुझ से ये तमाशा कैसा लगता है
दौलत का फ़लक तोड़ के आलम की जबीं पर
मज़दूर की क़िस्मत के सितारे निकल आए
उजालों में छुपी थी एक लड़की
फ़लक का रंग-रोग़न कर गई है
आँसू फ़लक की आँख से टपके तमाम रात
और सुब्ह तक ज़मीन का आँचल भिगो गए
फ़लक की ख़बर कब है ना-शाइरों को
यूँही घर में बैठे हवा बाँधते हैं
थी दर्द की जब तक दिल में खटक हिलता था फ़लक लर्ज़ां थी ज़मीं
हम आहें जिस दम भरते थे इक महशर बरपा होता था
कभी उस की मौजों में अफ़्लाक बहते मिले हैं
कभी उस को कश्ती चलाते हुए देखता हूँ