तअल्ली पर शेर
शायरों पर कभी-कभी आत्ममुग्घता
का ऐसा सुरूर छाता है कि वो शायरी में भी ख़ुद को ही आइडियल शक्ल में पेश करने लगता है। ऐसे अशआर तअल्ली के अशआर कहलाते हैं। तअल्ली शायरी का यह छोटा सा इन्तिख़ाब शायद आप के कुछ काम आ सके।
हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
इस दुनिया में कविता कहने वाले और भी बहुत से गुणी लोग मौजूद हैं।
लेकिन लोग कहते हैं कि ग़ालिब के बात करने का अंदाज़ सबसे निराला है।
यह शेर 'ताल्ली' यानी ख़ुद की तारीफ़ का एक बेहतरीन उदाहरण है। शायर मानता है कि दुनिया में और भी अच्छे कवि हैं, लेकिन साथ ही यह दावा करता है कि उसकी शैली या अंदाज़-ए-बयाँ बाकियों से बिल्कुल हटकर है, जो उसे सबसे ख़ास बनाता है।
और 'फ़राज़' चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया
होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को न जाने
शाइर तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
क्या दुनिया में कोई ऐसा भी होगा जो ग़ालिब को नहीं जानता?
वह कवि तो बहुत अच्छा है, लेकिन उसकी बदनामी बहुत ज्यादा है।
इस शेर में ग़ालिब मज़ाकिया अंदाज़ में खुद पर ही तंज कस रहे हैं। वे मानते हैं कि उनकी शायरी बहुत उम्दा है, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करते हैं कि समाज में उनकी आदतों के कारण उनकी इज़्ज़त कम है। यह शेर उनकी कला और उनके जीवन के विरोधाभास को दर्शाता है।
आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फ़िराक़' को देखा है
ऐ मेरे समय के साथियो, आने वाली पीढ़ियाँ तुम पर गर्व करेंगी।
जब भी उन्हें याद आएगा कि तुमने फ़िराक़ को अपनी आँखों से देखा था।
कवि अपने समय के लोगों से कहता है कि उनका यह अनुभव भविष्य में सम्मान की बात बनेगा। ‘फ़िराक़’ को देखना केवल मुलाक़ात नहीं, महानता का साक्षी बनना है। शेर में ख्याति, विरासत और स्मरण का भाव है—आज का एक क्षण कल की पीढ़ियों के लिए गौरव बन जाता है।
सारे आलम पर हूँ मैं छाया हुआ
मुस्तनद है मेरा फ़रमाया हुआ
मैं सारी दुनिया पर अपनी छाप और असर फैला चुका हूँ।
मेरी कही बात को लोग प्रमाण मानते हैं और उस पर भरोसा करते हैं।
मीर तक़ी मीर इस शेर में अपने प्रभाव को इतना बड़ा बताते हैं कि वे ‘सारे आलम’ पर छा गए हैं। दूसरे मिसरे में वे कहते हैं कि उनकी बात अपने आप में प्रमाण है, यानी उनके शब्दों पर लोगों को भरोसा है। भाव का केंद्र आत्मविश्वास और वाणी की शक्ति है, जहाँ कथन ही मानक बन जाता है।
कभी 'फ़राज़' से आ कर मिलो जो वक़्त मिले
ये शख़्स ख़ूब है अशआर के अलावा भी
ढूँडोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम
जो याद न आए भूल के फिर ऐ हम-नफ़सो वो ख़्वाब हैं हम
तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे
हम ऐसे लोग ज़माने में फिर कहाँ होंगे
मेरी घुट्टी में पड़ी थी हो के हल उर्दू ज़बाँ
जो भी मैं कहता गया हुस्न-ए-बयाँ बनता गया
मेरे बचपन की पहली घुट्टी में ही उर्दू भाषा घुल-मिल गई थी।
इसलिए मैं जो भी कहता गया, वह अपने आप सुंदर ढंग से कहा हुआ बनता गया।
फ़िराक़ गोरखपुरी कहते हैं कि उर्दू उनके भीतर शुरू से ही रची-बसी है, जैसे जन्म के साथ मिली घुट्टी में घुल जाए। “हुस्न-ए-बयाँ” का मतलब है बोलने में सुंदरता और असर, जो उनके शब्दों में बिना कोशिश के आ जाता है। भाव यह है कि भाषा से गहरा लगाव और स्वाभाविक वाणी-शक्ति मिलकर उनके कथन को कला बना देते हैं।
अपना लहू भर कर लोगों को बाँट गए पैमाने लोग
दुनिया भर को याद रहेंगे हम जैसे दीवाने लोग
और होते हैं जो महफ़िल में ख़मोश आते हैं
आँधियाँ आती हैं जब हज़रत-ए-'जोश' आते हैं
मिरी शाएरी में न रक़्स-ए-जाम न मय की रंग-फ़िशानियाँ
वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ
मेरा हर शेर है इक राज़-ए-हक़ीक़त 'बेख़ुद'
मैं हूँ उर्दू का 'नज़ीरी' मुझे तू क्या समझा
न देखे होंगे रिंद-ए-ला-उबाली तुम ने 'बेख़ुद' से
कि ऐसे लोग अब आँखों से ओझल होते जाते हैं
'मीर' का तर्ज़ अपनाया सब ने लेकिन ये अंदाज़ कहाँ
'आज़मी'-साहिब आप की ग़ज़लें सुन सुन कर सब हैराँ हैं