शोख़ी पर शेर
शोख़ी माशूक़ के हुस्न
में मज़ीद इज़ाफ़ा करती है। माशूक़ अगर शोख़ न हो तो उस के हुस्न में एक ज़रा कमी रह जाती है। हमारे इन्तिख़ाब किए हुए इन अशआर में आप देखेंगे कि माशूक़ की शोख़ियाँ कितनी दिल-चस्प और मज़ेदार हैं इनका इज़हार अक्सर जगहों पर आशिक़ के साथ मुकालमें में हुआ है।
फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है
Interpretation:
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इस शेर में कहा गया है कि प्रेम का असली निर्णय शब्दों से नहीं, नज़र के संकेत से होता है। नज़र की “शोखी” यानी चंचल, हल्की-सी नटखट चमक दिल में खिंचाव और चाह पैदा करती है। यही आकर्षण को जीवंत बनाती है; इसके बिना सुंदरता भी फीकी और असरहीन लगती है।
जो कहा मैं ने कि प्यार आता है मुझ को तुम पर
हँस के कहने लगा और आप को आता क्या है
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इश्वा भी है शोख़ी भी तबस्सुम भी हया भी
ज़ालिम में और इक बात है इस सब के सिवा भी
साथ शोख़ी के कुछ हिजाब भी है
इस अदा का कहीं जवाब भी है
Interpretation:
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दाग़ देहलवी यहाँ उस प्रिय के आकर्षण की तारीफ़ करते हैं जिसमें शरारती चंचलता के साथ लज्जा भी जुड़ी हुई है। “हिजाब” परदे और संकोच का संकेत है, जो उसकी शरारत को अशिष्ट नहीं होने देता, बल्कि और मनोहर बनाता है। इसी संतुलन से उसकी अदा अनोखी हो जाती है और कवि को उसका कोई मुकाबला दिखाई नहीं देता। भाव प्रशंसा और विस्मय का है।
पर्दा-ए-लुत्फ़ में ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या कहिए
हाए ज़ालिम तिरा अंदाज़-ए-करम क्या कहिए
Interpretation:
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कवि कहता है कि प्रिय की कठोरता दया के रूप में सामने आती है, जैसे दर्द को प्यार का नाम दे दिया गया हो। यही विडंबना इस शेर का केंद्र है: बाहर से नरमी, भीतर से चोट। “मेहरबानी का ढंग” कहकर वह उस दिखावे पर तंज करता है जो प्रेमी को और असहाय बना देता है।
शोख़ी से ठहरती नहीं क़ातिल की नज़र आज
ये बर्क़-ए-बला देखिए गिरती है किधर आज
Interpretation:
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इस शे’र में दाग़ देहलवी ने प्रिय की नज़र को खेलती हुई, पर घातक बताया है। ‘कातिल’ और ‘बिजली’ के बिंब से सुंदरता का असर खतरे जैसा लगने लगता है। प्रेमी के मन में डर और बेचैनी है कि यह नज़र कब और किस पर पड़ेगी। यही आकर्षण और अनिश्चितता मिलकर भाव को तीखा बनाती है।
शोख़ी-ए-हुस्न के नज़्ज़ारे की ताक़त है कहाँ
तिफ़्ल-ए-नादाँ हूँ मैं बिजली से दहल जाता हूँ
ये मिसरा लिख दिया किस शोख़ ने मेहराब-ए-मस्जिद पर
ये नादाँ गिर गए सज्दों में जब वक़्त-ए-क़याम आया
Interpretation:
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इस शेर में व्यंग्य के जरिए दिखाया गया है कि कुछ लोग धर्म को समझकर नहीं, बस रस्म की तरह निभाते हैं। मेहराब पर लिखा वाक्य उनके भ्रम को उजागर कर देता है। नमाज़ में जिस वक्त खड़ा होना चाहिए, उसी वक्त सज्दा कर देना उनकी नासमझी और अंधी नकल का संकेत है। भाव यह है कि इबादत जागरूकता और सही समझ के साथ होनी चाहिए।
बढ़ती रही निगाह बहकते रहे क़दम
गुज़रा है इस तरह भी ज़माना शबाब का
जाने क्या भर दी हैं उस ने इस चमन में शोख़ियाँ
जो भी आया वो चमन का राज़-दाँ बनता गया