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Mushafi Ghulam Hamdani's Photo'

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

1751 - 1824 | लखनऊ, भारत

18वीं सदी के बड़े शायरों में शामिल, मीर तक़ी 'मीर' के समकालीन।

18वीं सदी के बड़े शायरों में शामिल, मीर तक़ी 'मीर' के समकालीन।

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी के शेर

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'मुसहफ़ी' हम तो ये समझे थे कि होगा कोई ज़ख़्म

तेरे दिल में तो बहुत काम रफ़ू का निकला

EXPLANATION #1

यह मुस्हफ़ी के मशहूर अशआर में से एक है। ख़्याल नाज़ुक है इसलिए लोग इसे पसंद करते हैं। इस शे'र में दो किरदार हैं, एक मुस्हफ़ी से गुफ़्तगू करने वाला और दूसरा ख़ुद मुस्हफ़ी।

हम तो ये समझते थे, में तअ'ज्जुब भी और अफ़सोस का इज़हार भी कि “होगा कोई ज़ख़्म” यानी कोई एक-आध आम सा या छोटा सा ज़ख़्म होगा जो ख़ुदबख़ुद भर जाएगा। रफ़ू करने के मानी हैं, फटे हुए कपड़े को धागे से मरम्मत करना, फटी हुई जगह को भरना। उर्दू शायरी में “रफ़ू” लफ़्ज़ का बहुत इस्तेमाल हुआ है और इससे तात्पर्य आशिक़ के दिल के ज़ख़्मों की मरम्मत करना यानी टाँके लगाना है।

शायर से वाचक यानी बात करने वाला कहता है, ऐ मुस्हफ़ी तुमने तो ये जाना था कि तुम्हारे दिल में कोई छोटा सा ज़ख़्म होगा जो ख़ुद-ब-ख़ुद भर जाएगा मगर जब मैंने उसमें झांक कर देखा तो मैंने ये पाया कि तुम्हारे दिल में बहुत से ज़ख़्म मौजूद हैं जिन्हें मरम्मत की ज़रूरत है। ज़ाहिर है कि ये इश्क़ के ज़ख़्म हैं। कोई असली ज़ख़्म नहीं हैं कि जिन पर टाँके लगाए जाएं, जिन पर मरहम रखा जाए। इसलिए यहाँ रफ़ू से ये मतलब है कि इन ज़ख़्मों की मरम्मत तभी होगी जब शायर का महबूब उसकी तरफ़ तवज्जो देगा।

इस तरह से शे’र का भावार्थ ये निकलता है कि ऐ मुस्हफ़ी बज़ाहिर तुम्हारे दिल में लगता था कि कोई एक-आध ज़ख़्म होगा जो ख़ुदबख़ुद भर जाएगा मगर देखने पर मालूम हुआ कि अस्ल में तुमने इश्क़ में दिल पर बहुत ज़ख़्म खाए हैं और उन ज़ख़्मों की मरम्मत करना कोई आसान काम नहीं, अलबत्ता तुम्हारा महबूब अगर तुम्हारी तरफ़ लुत्फ़ की निगाहों से देखेगा तो ज़रूर ये ज़ख़्म भर सकते हैं।

शफ़क़ सुपुरी

लोग कहते हैं मोहब्बत में असर होता है

कौन से शहर में होता है किधर होता है

बाल अपने बढ़ाते हैं किस वास्ते दीवाने

क्या शहर-ए-मोहब्बत में हज्जाम नहीं होता

तिरी कू में इस बहाने हमें दिन को रात करना

कभी इस से बात करना कभी उस से बात करना

ईद अब के भी गई यूँही किसी ने न कहा

कि तिरे यार को हम तुझ से मिला देते हैं

वादों ही पे हर रोज़ मिरी जान न टालो

है ईद का दिन अब तो गले हम को लगा लो

छेड़ मत हर दम न आईना दिखा

अपनी सूरत से ख़फ़ा बैठे हैं हम

ऐ 'मुसहफ़ी' तू इन से मोहब्बत न कीजियो

ज़ालिम ग़ज़ब ही होती हैं ये दिल्ली वालियाँ

देख कर हम को न पर्दे में तू छुप जाया कर

हम तो अपने हैं मियाँ ग़ैर से शरमाया कर

जो मिला उस ने बेवफ़ाई की

कुछ अजब रंग है ज़माने का

हैराँ हूँ इस क़दर कि शब-ए-वस्ल भी मुझे

तू सामने है और तिरा इंतिज़ार है

ईद तू आ के मिरे जी को जलावे अफ़्सोस

जिस के आने की ख़ुशी हो वो न आवे अफ़्सोस

है ईद का दिन आज तो लग जाओ गले से

जाते हो कहाँ जान मिरी आ के मुक़ाबिल

अभी आग़ाज़-ए-मोहब्बत है कुछ इस का अंजाम

तुझ को मालूम है ऐ दीदा-ए-नम क्या होगा

हसरत पे उस मुसाफ़िर-ए-बे-कस की रोइए

जो थक गया हो बैठ के मंज़िल के सामने

आँखों को फोड़ डालूँ या दिल को तोड़ डालूँ

या इश्क़ की पकड़ कर गर्दन मरोड़ डालूँ

मूसा ने कोह-ए-तूर पे देखा जो कुछ वही

आता है आरिफ़ों को नज़र संग-ओ-ख़िश्त में

अब मिरी बात जो माने तो न ले इश्क़ का नाम

तू ने दुख ऐ दिल-ए-नाकाम बहुत सा पाया

दिल्ली में अपना था जो कुछ अस्बाब रह गया

इक दिल को ले के आए हैं उस सरज़मीं से हम

कर के ज़ख़्मी तू मुझे सौंप गया ग़ैरों को

कौन रक्खेगा मिरे ज़ख़्म पे मरहम तुझ बिन

मौसम-ए-होली है दिन आए हैं रंग और राग के

हम से तुम कुछ माँगने आओ बहाने फाग के

आसाँ नहीं दरिया-ए-मोहब्बत से गुज़रना

याँ नूह की कश्ती को भी तूफ़ान का डर है

आस्तीं उस ने जो कुहनी तक चढ़ाई वक़्त-ए-सुब्ह

आ रही सारे बदन की बे-हिजाबी हाथ में

अब ख़ुदा मग़फ़िरत करे उस की

'मीर' मरहूम था अजब कोई

इक दर्द-ए-मोहब्बत है कि जाता नहीं वर्ना

जिस दर्द की ढूँडे कोई दुनिया में दवा है

लाख हम शेर कहें लाख इबारत लिक्खें

बात वो है जो तिरे दिल में जगह पाती है

अल्लाह-रे तेरे सिलसिला-ए-ज़ुल्फ़ की कशिश

जाता है जी उधर ही खिंचा काएनात का

गो कि तू 'मीर' से हुआ बेहतर

'मुसहफ़ी' फिर भी 'मीर' 'मीर' ही है

चमन को आग लगावे है बाग़बाँ हर रोज़

नया बनाऊँ हूँ मैं अपना आशियाँ हर रोज़

किसी के हाथ तो लगता नहीं है इक अय्यार

कहाँ तलक तिरे पीछे कोई ख़राब फिरे

मज़े में अब तलक बैठा मैं अपने होंठ चाटूँ हूँ

लिया था ख़्वाब में बोसा जो यक शब सेब-ए-ग़बग़ब का

चराग़-ए-हुस्न-ए-यूसुफ़ जब हो रौशन

रहे फिर किस तरह ज़िंदाँ अंधेरा

ग़बग़ब से बचा दिल तो ज़नख़दान में डूबा

गिर्दाब में कश्ती गई तूफ़ाँ से निकल कर

चाहूँगा मैं तुम को जो मुझे चाहोगे तुम भी

होती है मोहब्बत तो मोहब्बत से ज़ियादा

'मुसहफ़ी' क्यूँके छुपे उन से मिरा दर्द-ए-निहाँ

यार तो बात के अंदाज़ से पा जाते हैं

दिल्ली हुई है वीराँ सूने खंडर पड़े हैं

वीरान हैं मोहल्ले सुनसान घर पड़े हैं

मैं जिन को बात करना ऐ 'मुसहफ़ी' सिखाया

हर बात में वो मेरी अब बात काटते हैं

सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ

जिन लबों से कि मयस्सर नहीं दुश्नाम मुझे

अव्वल तो थोड़ी थोड़ी चाहत थी दरमियाँ में

फिर बात कहते लुक्नत आने लगी ज़बाँ में

मैं अजब ये रस्म देखी मुझे रोज़-ए-ईद-ए-क़ुर्बां

वही ज़ब्ह भी करे और वही ले सवाब उल्टा

होश उड़ जाएँगे ऐ ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ तेरे

गर मैं अहवाल लिखा अपनी परेशानी का

क़ातिल तिरी गली भी बदायूँ से कम नहीं

जिस के क़दम क़दम पे मज़ार-ए-शहीद है

इक दिन तो लिपट जाए तसव्वुर ही से तेरे

ये भी दिल-ए-नामर्द को जुरअत नहीं मिलती

शोख़ी-ए-हुस्न के नज़्ज़ारे की ताक़त है कहाँ

तिफ़्ल-ए-नादाँ हूँ मैं बिजली से दहल जाता हूँ

कहूँ तो किस से कहूँ अपना दर्द-ए-दिल मैं ग़रीब

न आश्ना न मुसाहिब न हम-नशीं कोई

जमुना में कल नहा कर जब उस ने बाल बाँधे

हम ने भी अपने दिल में क्या क्या ख़याल बाँधे

आस्माँ को निशाना करते हैं

तीर रखते हैं जब कमान में हम

ऐ काश कोई शम्अ के ले जा के मुझे पास

ये बात कहे उस से कि परवाना है ये भी

कहिए जो झूट तो हम होते हैं कह के रुस्वा

सच कहिए तो ज़माना यारो नहीं है सच का

मुल्हिद हूँ अगर मैं तो भला इस से तुम्हें क्या

मुँह से ये सुख़न गब्र ओ मुसलमाँ न निकालो

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