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ताबाँ अब्दुल हई

1715 - 1749 | दिल्ली, भारत

शायरी के अलावा अपनी सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध। कम उम्र में देहांत हुआ

शायरी के अलावा अपनी सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध। कम उम्र में देहांत हुआ

ताबाँ अब्दुल हई के शेर

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किस किस तरह की दिल में गुज़रती हैं हसरतें

है वस्ल से ज़ियादा मज़ा इंतिज़ार का

किस किस तरह की दिल में गुज़रती हैं हसरतें

है वस्ल से ज़ियादा मज़ा इंतिज़ार का

कई फ़ाक़ों में ईद आई है

आज तू हो तो जान हम-आग़ोश

कई फ़ाक़ों में ईद आई है

आज तू हो तो जान हम-आग़ोश

दर्द-ए-सर है ख़ुमार से मुझ को

जल्द ले कर शराब साक़ी

दर्द-ए-सर है ख़ुमार से मुझ को

जल्द ले कर शराब साक़ी

एक बुलबुल भी चमन में रही अब की फ़सल

ज़ुल्म ऐसा ही किया तू ने सय्याद कि बस

एक बुलबुल भी चमन में रही अब की फ़सल

ज़ुल्म ऐसा ही किया तू ने सय्याद कि बस

जिस का गोरा रंग हो वो रात को खिलता है ख़ूब

रौशनाई शम्अ की फीकी नज़र आती है सुब्ह

जिस का गोरा रंग हो वो रात को खिलता है ख़ूब

रौशनाई शम्अ की फीकी नज़र आती है सुब्ह

मोहब्बत तू मत कर दिल उस बेवफ़ा से

दिल उस बेवफ़ा से मोहब्बत तू मत कर

मोहब्बत तू मत कर दिल उस बेवफ़ा से

दिल उस बेवफ़ा से मोहब्बत तू मत कर

तुम इस क़दर जो निडर हो के ज़ुल्म करते हो

बुताँ हमारा तुम्हारा कोई ख़ुदा भी है

तुम इस क़दर जो निडर हो के ज़ुल्म करते हो

बुताँ हमारा तुम्हारा कोई ख़ुदा भी है

जब तलक रहे जीता चाहिए हँसे बोले

आदमी को चुप रहना मौत की निशानी है

जब तलक रहे जीता चाहिए हँसे बोले

आदमी को चुप रहना मौत की निशानी है

आतिश-ए-इश्क़ में जो जल मरें

इश्क़ के फ़न में वो अनारी हैं

आतिश-ए-इश्क़ में जो जल मरें

इश्क़ के फ़न में वो अनारी हैं

दिल की हसरत रही दिल में मिरे कुछ बाक़ी

एक ही तेग़ लगा ऐसी जल्लाद कि बस

दिल की हसरत रही दिल में मिरे कुछ बाक़ी

एक ही तेग़ लगा ऐसी जल्लाद कि बस

ज़ाहिद हो और तक़्वा आबिद हो और मुसल्ला

माला हो और बरहमन सहबा हो और हम हों

ज़ाहिद हो और तक़्वा आबिद हो और मुसल्ला

माला हो और बरहमन सहबा हो और हम हों

हो रूह के तईं जिस्म से किस तरह मोहब्बत

ताइर को क़फ़स से भी कहीं हो है मोहब्बत

हो रूह के तईं जिस्म से किस तरह मोहब्बत

ताइर को क़फ़स से भी कहीं हो है मोहब्बत

ले मेरी ख़बर चश्म मिरे यार की क्यूँ-कर

बीमार अयादत करे बीमार की क्यूँ-कर

ले मेरी ख़बर चश्म मिरे यार की क्यूँ-कर

बीमार अयादत करे बीमार की क्यूँ-कर

महफ़िल के बीच सुन के मिरे सोज़-ए-दिल का हाल

बे-इख़्तियार शम्अ के आँसू ढलक पड़े

महफ़िल के बीच सुन के मिरे सोज़-ए-दिल का हाल

बे-इख़्तियार शम्अ के आँसू ढलक पड़े

हवा भी इश्क़ की लगने देता मैं उसे हरगिज़

अगर इस दिल पे होता हाए कुछ भी इख़्तियार अपना

हवा भी इश्क़ की लगने देता मैं उसे हरगिज़

अगर इस दिल पे होता हाए कुछ भी इख़्तियार अपना

तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है

आह क्या चाहना ऐसा ही बुरा होता है

तू भली बात से ही मेरी ख़फ़ा होता है

आह क्या चाहना ऐसा ही बुरा होता है

देख क़ासिद को मिरे यार ने पूछा 'ताबाँ'

क्या मिरे हिज्र में जीता है वो ग़मनाक हनूज़

देख क़ासिद को मिरे यार ने पूछा 'ताबाँ'

क्या मिरे हिज्र में जीता है वो ग़मनाक हनूज़

मुझे आता है रोना ऐसी तन्हाई पे 'ताबाँ'

यार अपना दिल अपना तन अपना जाँ अपना

मुझे आता है रोना ऐसी तन्हाई पे 'ताबाँ'

यार अपना दिल अपना तन अपना जाँ अपना

ख़्वान-ए-फ़लक पे नेमत-ए-अलवान है कहाँ

ख़ाली हैं महर-ओ-माह की दोनो रिकाबियाँ

ख़्वान-ए-फ़लक पे नेमत-ए-अलवान है कहाँ

ख़ाली हैं महर-ओ-माह की दोनो रिकाबियाँ

मलूँ हों ख़ाक जूँ आईना मुँह पर

तिरी सूरत मुझे आती है जब याद

मलूँ हों ख़ाक जूँ आईना मुँह पर

तिरी सूरत मुझे आती है जब याद

यहाँ यार और बरदार कोई नहीं किसी का

दुनिया के बीच 'ताबाँ' हम किस से दिल लगावें

यहाँ यार और बरदार कोई नहीं किसी का

दुनिया के बीच 'ताबाँ' हम किस से दिल लगावें

वो तो सुनता नहीं किसी की बात

उस से मैं हाल क्या कहूँ 'ताबाँ'

वो तो सुनता नहीं किसी की बात

उस से मैं हाल क्या कहूँ 'ताबाँ'

तू मिल उस से हो जिस से दिल तिरा ख़ुश

बला से तेरी मैं ना-ख़ुश हूँ या ख़ुश

तू मिल उस से हो जिस से दिल तिरा ख़ुश

बला से तेरी मैं ना-ख़ुश हूँ या ख़ुश

यार रूठा है मिरा उस को मनाऊँ किस तरह

मिन्नतें कर पाँव पड़ उस के ले आऊँ किस तरह

यार रूठा है मिरा उस को मनाऊँ किस तरह

मिन्नतें कर पाँव पड़ उस के ले आऊँ किस तरह

बुरा मानियो मैं पूछता हूँ ज़ालिम

कि बे-कसों के सताए से कुछ भला भी है

बुरा मानियो मैं पूछता हूँ ज़ालिम

कि बे-कसों के सताए से कुछ भला भी है

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