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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

एटीट्यूड पर शेर

कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई

तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया

जौन एलिया

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

जिगर मुरादाबादी

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

Interpretation: Rekhta AI

मिर्ज़ा ग़ालिब दुनिया को बच्चों के खेल का मैदान कहकर उसकी गंभीरता पर सवाल उठाते हैं, मानो यह सब असल नहीं, बस खेल है। “रात-दिन” का चलना एक लगातार मंच-सा बन जाता है, जिसमें घटनाएँ आती-जाती रहती हैं। भाव-केन्द्र में जीवन से ऊब और दूरी है: कवि भाग नहीं लेता, केवल देखता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी

तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँ करें हम

जौन एलिया

सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा

मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा

इक़बाल साजिद

हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं

इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे

अहमद फ़राज़

क्या है जो हो गया हूँ मैं थोड़ा बहुत ख़राब

थोड़ा बहुत ख़राब तो होना भी चाहिए

जव्वाद शैख़

काश वो रास्ते में मिल जाए

मुझ को मुँह फेर कर गुज़रना है

फ़हमी बदायूनी

रास आने लगी दुनिया तो कहा दिल ने कि जा

अब तुझे दर्द की दौलत नहीं मिलने वाली

इफ़्तिख़ार आरिफ़

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से

वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला

अहमद फ़राज़

इंक़लाब एक ख़्वाब है सो है

दिल की दुनिया ख़राब है सो है

जौन एलिया

चाहिए है मुझे इंकार-ए-मोहब्बत मिरे दोस्त

लेकिन इस में तिरा इंकार नहीं चाहिए है

अहमद कामरान

हम ऐसे जाएँगे ले कर बलाएँ दुनिया की

कहीं न होगा कोई हादिसा हमारे बाद

सफ़र नक़वी

चाहें तो इस को तेग़-ए-ख़मोशी से काट दें

लेकिन जुनूँ से जंग ज़बानी करेंगे हम

अभिनंदन पांडे

मुझे कुरेदने वालो मैं एक सहरा हूँ

कि मुझ से रेत ही निकलेगी आबशार नहीं

वरुण आनंद

पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ

कि मैं वो क़ैस नहीं हूँ जो मार खा जाए

वरुण आनंद

क्यों इतने मग़रूर हैं 'राही' क्यों इतना इतराते हैं

गंगा तट वीरान न होगा इक उन के उठ जाने से

राही मासूम रज़ा

मैं ऐसा सफ़ीना हूँ कि साहिल की सदा पर

तूफ़ान के सीने में उतर जाता हूँ अक्सर

वासिफ़ अली वासिफ़

हम को तज्दीद-ए-मुलाक़ात से कब है इंकार

लेकिन अब पहले उन्हें हाथ बढ़ाना होगा

इक़बाल सफ़ीपूरी

तलातुम-ख़ेज़ तूफ़ानों से टकराते रहे हर दम

डुबो दी हम ने ख़ुद कश्ती जूँ-ही साहिल नज़र आया

वासिफ़ अली वासिफ़
बोलिए