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शराब पर 20 मशहूर शेर

अगर आपको बस यूँही बैठे

बैठे ज़रा सा झूमना है तो शराब शायरी पर हमारा ये इन्तिख़ाब पढ़िए। आप महसूस करेंगे कि शराब की लज़्ज़त और इस के सरूर की ज़रा सी मिक़दार उस शायरी में भी उतर आई है। ये शायरी आपको मज़ा तो देगी ही, साथ में हैरान भी करेगी कि शराब जो ब-ज़ाहिर बे-ख़ुदी और सुरूर बख़्शती है, शायरी मैं किस तरह मानी की एक लामहदूद कायनात का इस्तिआरा बन गई है।

टॉप 20 सीरीज़

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा हो

अज्ञात

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में

दिवाकर राही

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'

जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर एक विडंबना दिखाता है: जहाँ मस्ती की उम्मीद होती है, वहीं पीकर आदमी गंभीर हो जाता है। यहाँ शराब केवल नशा नहीं, अनुभव और सच्चाई का प्रतीक भी है, जो हँसी को कम करके सोच को जगा देती है। भाव यह है कि जैसे ही अंदर समझ बढ़ती है, बेफिक्री खत्म हो जाती है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर एक विडंबना दिखाता है: जहाँ मस्ती की उम्मीद होती है, वहीं पीकर आदमी गंभीर हो जाता है। यहाँ शराब केवल नशा नहीं, अनुभव और सच्चाई का प्रतीक भी है, जो हँसी को कम करके सोच को जगा देती है। भाव यह है कि जैसे ही अंदर समझ बढ़ती है, बेफिक्री खत्म हो जाती है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर गरीबी के बीच भी उम्मीद और जिद का भाव दिखाता है। उधार की शराब मजबूरी भी है और बेफिक्री का ढोंग भी, और “फ़ाक़ा-मस्ती” भूख से उपजी अजीब-सी बेसुध हिम्मत का रूपक है। व्यंग्य यह है कि इंसान अपनी तंगी को भी किसी आने वाली कामयाबी का कारण मानकर खुद को संभाल लेता है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर गरीबी के बीच भी उम्मीद और जिद का भाव दिखाता है। उधार की शराब मजबूरी भी है और बेफिक्री का ढोंग भी, और “फ़ाक़ा-मस्ती” भूख से उपजी अजीब-सी बेसुध हिम्मत का रूपक है। व्यंग्य यह है कि इंसान अपनी तंगी को भी किसी आने वाली कामयाबी का कारण मानकर खुद को संभाल लेता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है

रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपनी शारीरिक कमजोरी का वर्णन करते हुए कहता है कि भले ही उसके हाथ अब जाम उठाने के काबिल नहीं रहे, मगर उसकी आँखों की प्यास अभी बुझी नहीं है। वह केवल शराब और सुराही को देखकर ही अपनी आत्मा को तसल्ली देना चाहता है, जो यह दर्शाता है कि शरीर थक सकता है लेकिन मन की चाहत अंत तक बनी रहती है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपनी शारीरिक कमजोरी का वर्णन करते हुए कहता है कि भले ही उसके हाथ अब जाम उठाने के काबिल नहीं रहे, मगर उसकी आँखों की प्यास अभी बुझी नहीं है। वह केवल शराब और सुराही को देखकर ही अपनी आत्मा को तसल्ली देना चाहता है, जो यह दर्शाता है कि शरीर थक सकता है लेकिन मन की चाहत अंत तक बनी रहती है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी कभी

पीता हूँ रोज़-ए-अब्र शब-ए-माहताब में

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि छोड़ी हुई आदत पूरी तरह मिटती नहीं, कभी-कभी लौट आती है। बादलों वाला दिन उदासी का संकेत है, और चाँदनी रात नरमी तन्हाई का; दोनों मन को कमजोर कर देते हैं। इसी माहौल में वक्ता फिर से शराब की तरफ खिंच जाता है।

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि छोड़ी हुई आदत पूरी तरह मिटती नहीं, कभी-कभी लौट आती है। बादलों वाला दिन उदासी का संकेत है, और चाँदनी रात नरमी तन्हाई का; दोनों मन को कमजोर कर देते हैं। इसी माहौल में वक्ता फिर से शराब की तरफ खिंच जाता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

पिला दे ओक से साक़ी जो हम से नफ़रत है

पियाला गर नहीं देता दे शराब तो दे

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ बोलने वाला तिरस्कार सहकर भी अपनी चाह नहीं छोड़ता। उसे सम्मान वाला प्याला मिले तो भी चलेगा; वह हथेली में पीने की बेइज्जती भी स्वीकार कर लेता है, पर असल चीज़—शराब—चाहिए। शराब प्रेम, ध्यान या कृपा का संकेत है, और भाव यह है कि रूप छीन लो, पर सार मत छीनो।

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ बोलने वाला तिरस्कार सहकर भी अपनी चाह नहीं छोड़ता। उसे सम्मान वाला प्याला मिले तो भी चलेगा; वह हथेली में पीने की बेइज्जती भी स्वीकार कर लेता है, पर असल चीज़—शराब—चाहिए। शराब प्रेम, ध्यान या कृपा का संकेत है, और भाव यह है कि रूप छीन लो, पर सार मत छीनो।

मिर्ज़ा ग़ालिब

कुछ भी बचा कहने को हर बात हो गई

आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई

निदा फ़ाज़ली

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ

क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया

EXPLANATION #1

यह शे’र मायनी और लक्षण दोनों दृष्टि से दिलचस्प है। शे’र में वही शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, जिन्हें उर्दू ग़ज़ल की परम्परा की विशेषता समझा जाता है। जैसे ज़ाहिद-ए-शराब, काफ़िर, ईमान। मगर मायनी की सतह पर ज़ौक़ ने व्यंग्य के लहजे से जो बात पैदा की है वो पाठक को चौंका देती है। शे’र में ज़ाहिद के सम्बंध से शराब, काफ़िर के सम्बंध से ईमान के अलावा पीने, पानी और बहने से जो स्थिति पैदा हुई है वो अपने आप में एक शायराना कमाल है। ज़ाहिद उर्दू ग़ज़ल की परम्परा में उन पात्रों में से एक है जिन पर शायरों ने खुल कर तंज़ किए हैं।

शे’र के किरदार ज़ाहिद से सवाल पूछता है कि शराब पीने से आदमी काफ़िर कैसे हो सकता है, क्या ईमान इस क़दर कमज़ोर चीज़ होती है कि ज़रा से पानी के साथ बह जाती है। इस शे’र के पंक्तियों के बीच में ज़ाहिद पर जो तंज़ किया गया है वो “डेढ़ चुल्लू” पानी से स्पष्ट होता है। यानी मैंने तो ज़रा सी शराब पी ली है और तुमने मुझ पर काफ़िर होने का फ़तवा जारी कर दिया। क्या तुम्हारी नज़र में ईमान इतनी कमज़ोर चीज़ है कि ज़रा सी शराब पीने से ख़त्म हो जाती है।

शफ़क़ सुपुरी

EXPLANATION #1

यह शे’र मायनी और लक्षण दोनों दृष्टि से दिलचस्प है। शे’र में वही शब्द इस्तेमाल किए गए हैं, जिन्हें उर्दू ग़ज़ल की परम्परा की विशेषता समझा जाता है। जैसे ज़ाहिद-ए-शराब, काफ़िर, ईमान। मगर मायनी की सतह पर ज़ौक़ ने व्यंग्य के लहजे से जो बात पैदा की है वो पाठक को चौंका देती है। शे’र में ज़ाहिद के सम्बंध से शराब, काफ़िर के सम्बंध से ईमान के अलावा पीने, पानी और बहने से जो स्थिति पैदा हुई है वो अपने आप में एक शायराना कमाल है। ज़ाहिद उर्दू ग़ज़ल की परम्परा में उन पात्रों में से एक है जिन पर शायरों ने खुल कर तंज़ किए हैं।

शे’र के किरदार ज़ाहिद से सवाल पूछता है कि शराब पीने से आदमी काफ़िर कैसे हो सकता है, क्या ईमान इस क़दर कमज़ोर चीज़ होती है कि ज़रा से पानी के साथ बह जाती है। इस शे’र के पंक्तियों के बीच में ज़ाहिद पर जो तंज़ किया गया है वो “डेढ़ चुल्लू” पानी से स्पष्ट होता है। यानी मैंने तो ज़रा सी शराब पी ली है और तुमने मुझ पर काफ़िर होने का फ़तवा जारी कर दिया। क्या तुम्हारी नज़र में ईमान इतनी कमज़ोर चीज़ है कि ज़रा सी शराब पीने से ख़त्म हो जाती है।

शफ़क़ सुपुरी

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

'ज़ौक़' देख दुख़्तर-ए-रज़ को मुँह लगा

छुटती नहीं है मुँह से ये काफ़र लगी हुई

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर ने शराब की लत से बचने की सलाह दी है। शराब को 'दुख़्तर-ए-रज़' और 'काफ़िर' कहकर पुकारा गया है, जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी जालिम चीज़ है जो अगर एक बार आदत बन जाए तो छूटती नहीं है। इसमें नशे की बुराई और उसकी मज़बूत पकड़ को दर्शाया गया है।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर ने शराब की लत से बचने की सलाह दी है। शराब को 'दुख़्तर-ए-रज़' और 'काफ़िर' कहकर पुकारा गया है, जिसका मतलब है कि यह एक ऐसी जालिम चीज़ है जो अगर एक बार आदत बन जाए तो छूटती नहीं है। इसमें नशे की बुराई और उसकी मज़बूत पकड़ को दर्शाया गया है।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

तुम होश में हो हम होश में हैं

चलो मय-कदे में वहीं बात होगी

बशीर बद्र

लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद

हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं

Interpretation: Rekhta AI

शायर एक उपदेश देने वाले ज़ाहिद से कहता है कि शराब की लज़्ज़त उसे कैसे समझाई जाए जिसने उसे कभी चखा ही नहीं। यहाँ शराब जीवन के रस, मस्ती और खुली अनुभूति का संकेत बन जाती है। व्यंग्य यह है कि बिना अनुभव किए फैसले सुनाना खाली बात है, और इसी बे-रसी को बदक़िस्मती कहा गया है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर एक उपदेश देने वाले ज़ाहिद से कहता है कि शराब की लज़्ज़त उसे कैसे समझाई जाए जिसने उसे कभी चखा ही नहीं। यहाँ शराब जीवन के रस, मस्ती और खुली अनुभूति का संकेत बन जाती है। व्यंग्य यह है कि बिना अनुभव किए फैसले सुनाना खाली बात है, और इसी बे-रसी को बदक़िस्मती कहा गया है।

दाग़ देहलवी

'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला

उन को मय-ख़ाने में ले आओ सँवर जाएँगे

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर ने धार्मिक दिखावे पर कटाक्ष किया है। उनका मानना है कि मदरसे की किताबी पढ़ाई ने मुल्लाओं को घमंडी बना दिया है, जबकि मयखाना (प्रेम और मस्ती की जगह) उनके अहंकार को मिटाकर उन्हें विनम्रता सिखाएगा, जिससे उनका चरित्र सँवर जाएगा।

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में शायर ने धार्मिक दिखावे पर कटाक्ष किया है। उनका मानना है कि मदरसे की किताबी पढ़ाई ने मुल्लाओं को घमंडी बना दिया है, जबकि मयखाना (प्रेम और मस्ती की जगह) उनके अहंकार को मिटाकर उन्हें विनम्रता सिखाएगा, जिससे उनका चरित्र सँवर जाएगा।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगी

साक़ी ने जैसे प्यास मिला दी शराब में

अज्ञात

साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं

ज़हर दे दे अगर शराब नहीं

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्यास का मतलब सिर्फ पानी की प्यास नहीं, बल्कि तीव्र चाह और मन की जलन है। शराब राहत, प्रेम या मदहोशी का संकेत है जो इस बेचैनी को शांत कर सकती है। जब वह नहीं मिलती, तो बोलने वाला कहता है कि ऐसे तड़पते रहने से अच्छा है ज़हर मिल जाए। यह शेर मजबूरी और हद से बढ़ी हुई बेकरारी को दिखाता है।

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्यास का मतलब सिर्फ पानी की प्यास नहीं, बल्कि तीव्र चाह और मन की जलन है। शराब राहत, प्रेम या मदहोशी का संकेत है जो इस बेचैनी को शांत कर सकती है। जब वह नहीं मिलती, तो बोलने वाला कहता है कि ऐसे तड़पते रहने से अच्छा है ज़हर मिल जाए। यह शेर मजबूरी और हद से बढ़ी हुई बेकरारी को दिखाता है।

दाग़ देहलवी

पहले शराब ज़ीस्त थी अब ज़ीस्त है शराब

कोई पिला रहा है पिए जा रहा हूँ मैं

जिगर मुरादाबादी

तर्क-ए-मय ही समझ इसे नासेह

इतनी पी है कि पी नहीं जाती

शकील बदायूनी

शिकन डाल जबीं पर शराब देते हुए

ये मुस्कुराती हुई चीज़ मुस्कुरा के पिला

EXPLANATION #1

जबीं अर्थात माथा। जबीं पर शिकन डालने के कई मायने हैं। जैसे ग़ुस्सा करना, किसी से रूठ जाना आदि। शायर मदिरापान कराने वाले अर्थात अपने महबूब को सम्बोधित करते हुए कहता है कि शराब एक मुस्कुराती हुई चीज़ है और उसे किसी को देते हुए माथे पर बल डालना अच्छी बात नहीं क्योंकि अगर साक़ी माथे पर बल डालकर किसी को शराब पिलाता है तो फिर उस मदिरा का असली मज़ा जाता रहता है। इसलिए मदिरापान कराने वाले पर अनिवार्य है कि वो मदिरापान के नियमों को ध्यान में रखते हुए पीने वाले को शराब मुस्कुरा कर पिलाए।

शफ़क़ सुपुरी

EXPLANATION #1

जबीं अर्थात माथा। जबीं पर शिकन डालने के कई मायने हैं। जैसे ग़ुस्सा करना, किसी से रूठ जाना आदि। शायर मदिरापान कराने वाले अर्थात अपने महबूब को सम्बोधित करते हुए कहता है कि शराब एक मुस्कुराती हुई चीज़ है और उसे किसी को देते हुए माथे पर बल डालना अच्छी बात नहीं क्योंकि अगर साक़ी माथे पर बल डालकर किसी को शराब पिलाता है तो फिर उस मदिरा का असली मज़ा जाता रहता है। इसलिए मदिरापान कराने वाले पर अनिवार्य है कि वो मदिरापान के नियमों को ध्यान में रखते हुए पीने वाले को शराब मुस्कुरा कर पिलाए।

शफ़क़ सुपुरी

अब्दुल हमीद अदम

मोहतसिब फेंक मिरे मोहतसिब फेंक

ज़ालिम शराब है अरे ज़ालिम शराब है

जिगर मुरादाबादी
बोलिए