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मीर तक़ी मीर की टॉप 20 शायरी
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
EXPLANATION #1
मीर अपनी सहल शायरी में कोई जोड़ नहीं रखते हैं। जिस सच्चाई और आसानी के साथ वो विषयों को बयान करने की क्षमता रखते हैं उसकी मिसाल मुश्किल ही से मिलती है।
इस शे’र में मीर ने बड़ी मासूमियत और सादगी के साथ अपने महबूब के हुस्न की तारीफ़ बयान की है। ज़ाहिर है कि हुस्न की तारीफ़ के बयान में महबूब के होंटों का बयान बहुत अहम वस्तु है। मीर अपने महबूब के होंटों की नाज़ुकी मुलाइमियत या नम्रता को बयान करते हुए उपमा देते हैं और वो उपमा गुलाब के फूल की पंखुड़ी से देते हैं। गुलाब की पंखुड़ी बहुत नाज़ुक होती हैं, बहुत नरम होती हैं, इतनी नरम और इतनी नाज़ुक होती हैं कि मीर को अपने महबूब के होंटों की बनावट बिल्कुल गुलाब की पंखुड़ी की तरह नज़र आती है। गुलाब की पंखुड़ियाँ बहुत ही उचित उपमा है, जो महबूब के होंटों के लिए दी जा सकती है और मीर ने इस मुनासिब तरीन उपमा का इस्तेमाल करके ये साबित कर दिया कि उपमा के चुनाव में भी उनका कोई बदल नहीं है।
आसान लफ़्ज़ों में कहा जाये तो बात साफ़ समझ में आती है कि मीर अपने महबूब के होंटों को गुलाब की पंखुड़ी की तरह महसूस करते हैं, उसकी नाज़ुकी की या उसकी नम्रता की वजह से और इस तरह इस उपमा ने महबूब के हुस्न का बेहतरीन नक़्शा खींच दिया है।
सुहैल आज़ाद
EXPLANATION #1
मीर अपनी सहल शायरी में कोई जोड़ नहीं रखते हैं। जिस सच्चाई और आसानी के साथ वो विषयों को बयान करने की क्षमता रखते हैं उसकी मिसाल मुश्किल ही से मिलती है।
इस शे’र में मीर ने बड़ी मासूमियत और सादगी के साथ अपने महबूब के हुस्न की तारीफ़ बयान की है। ज़ाहिर है कि हुस्न की तारीफ़ के बयान में महबूब के होंटों का बयान बहुत अहम वस्तु है। मीर अपने महबूब के होंटों की नाज़ुकी मुलाइमियत या नम्रता को बयान करते हुए उपमा देते हैं और वो उपमा गुलाब के फूल की पंखुड़ी से देते हैं। गुलाब की पंखुड़ी बहुत नाज़ुक होती हैं, बहुत नरम होती हैं, इतनी नरम और इतनी नाज़ुक होती हैं कि मीर को अपने महबूब के होंटों की बनावट बिल्कुल गुलाब की पंखुड़ी की तरह नज़र आती है। गुलाब की पंखुड़ियाँ बहुत ही उचित उपमा है, जो महबूब के होंटों के लिए दी जा सकती है और मीर ने इस मुनासिब तरीन उपमा का इस्तेमाल करके ये साबित कर दिया कि उपमा के चुनाव में भी उनका कोई बदल नहीं है।
आसान लफ़्ज़ों में कहा जाये तो बात साफ़ समझ में आती है कि मीर अपने महबूब के होंटों को गुलाब की पंखुड़ी की तरह महसूस करते हैं, उसकी नाज़ुकी की या उसकी नम्रता की वजह से और इस तरह इस उपमा ने महबूब के हुस्न का बेहतरीन नक़्शा खींच दिया है।
सुहैल आज़ाद
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राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर प्रेम को एक लंबी और कठिन यात्रा मानते हैं, जहाँ शुरुआत में ही रो पड़ना जल्दबाज़ी है। वक्ता धैर्य रखने को कहता है और संकेत देता है कि आगे और बड़ी कसौटियाँ आ सकती हैं। भाव यह है कि प्रेम का असली दर्द और सच आगे बढ़ने पर ही खुलता है।
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर प्रेम को एक लंबी और कठिन यात्रा मानते हैं, जहाँ शुरुआत में ही रो पड़ना जल्दबाज़ी है। वक्ता धैर्य रखने को कहता है और संकेत देता है कि आगे और बड़ी कसौटियाँ आ सकती हैं। भाव यह है कि प्रेम का असली दर्द और सच आगे बढ़ने पर ही खुलता है।
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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
EXPLANATION #1
हर पत्ता और हर छोटा पौधा मेरी हालत जानता है।
फूल जाने या न जाने, पूरा बाग मेरी दशा जानता है।
यहाँ वक्ता का दर्द इतना साफ़ है कि प्रकृति की हर चीज़ उसकी तड़प की गवाह बन जाती है। लेकिन “फूल” यानी प्रिय/जिससे उम्मीद है, वही अनजान या बेपरवाह रहता है। बाग़ का सब कुछ जानना और फूल का न जानना—यही विरह, चाह और उदासीनता की चोट को तीखा कर देता है।
सुहैल आज़ाद
EXPLANATION #1
हर पत्ता और हर छोटा पौधा मेरी हालत जानता है।
फूल जाने या न जाने, पूरा बाग मेरी दशा जानता है।
यहाँ वक्ता का दर्द इतना साफ़ है कि प्रकृति की हर चीज़ उसकी तड़प की गवाह बन जाती है। लेकिन “फूल” यानी प्रिय/जिससे उम्मीद है, वही अनजान या बेपरवाह रहता है। बाग़ का सब कुछ जानना और फूल का न जानना—यही विरह, चाह और उदासीनता की चोट को तीखा कर देता है।
सुहैल आज़ाद
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अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर विदाई और मिलने की अनिश्चितता का भाव रखता है। प्रेमी प्रिय के ठिकाने को “बुत-कदा” कहकर उसे पूजा-सा मान देता है, पर साथ ही वहाँ से दूर जाना पड़ रहा है। “अगर ख़ुदा लाया” में उम्मीद भी है और यह बात भी कि फिर मिलना अपने बस में नहीं, किस्मत/ईश्वर की मरज़ी पर है।
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर विदाई और मिलने की अनिश्चितता का भाव रखता है। प्रेमी प्रिय के ठिकाने को “बुत-कदा” कहकर उसे पूजा-सा मान देता है, पर साथ ही वहाँ से दूर जाना पड़ रहा है। “अगर ख़ुदा लाया” में उम्मीद भी है और यह बात भी कि फिर मिलना अपने बस में नहीं, किस्मत/ईश्वर की मरज़ी पर है।
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आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में प्रेम की शुरुआत का उग्र जोश और अंत की थकान दिखती है। “आग” जुनून, बेचैनी और अपने-आप को जलाने वाली लगन का रूपक है, और “राख” उस जलन के बाद बची हुई खालीपन और टूटन को। भाव यह है कि प्रेम का अंत कभी-कभी मिलन नहीं, बल्कि खुद का मिट जाना होता है।
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में प्रेम की शुरुआत का उग्र जोश और अंत की थकान दिखती है। “आग” जुनून, बेचैनी और अपने-आप को जलाने वाली लगन का रूपक है, और “राख” उस जलन के बाद बची हुई खालीपन और टूटन को। भाव यह है कि प्रेम का अंत कभी-कभी मिलन नहीं, बल्कि खुद का मिट जाना होता है।
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ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का
EXPLANATION #1
साँस भी धीरे लेना, क्योंकि यह काम बहुत नाज़ुक है।
यह सारी दुनिया काँच बनाने की कार्यशाला जैसी है, जहाँ ज़रा-सी ठोकर से सब टूट सकता है।
मीर तक़ी मीर ने संसार को काँच की कार्यशाला का रूपक दिया है—सुंदर, पर बहुत जल्दी टूट जाने वाला। “धीरे साँस लेना” का मतलब है कि जीवन में हर कदम सोच-समझकर रखना चाहिए, क्योंकि यहाँ सब कुछ बहुत कोमल है। इस शेर में डर और आदर दोनों का भाव है—अस्तित्व अनमोल है, लेकिन क्षणभंगुर। इसलिए बोलचाल और कर्म में नरमी व सावधानी की सीख मिलती है।
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
EXPLANATION #1
साँस भी धीरे लेना, क्योंकि यह काम बहुत नाज़ुक है।
यह सारी दुनिया काँच बनाने की कार्यशाला जैसी है, जहाँ ज़रा-सी ठोकर से सब टूट सकता है।
मीर तक़ी मीर ने संसार को काँच की कार्यशाला का रूपक दिया है—सुंदर, पर बहुत जल्दी टूट जाने वाला। “धीरे साँस लेना” का मतलब है कि जीवन में हर कदम सोच-समझकर रखना चाहिए, क्योंकि यहाँ सब कुछ बहुत कोमल है। इस शेर में डर और आदर दोनों का भाव है—अस्तित्व अनमोल है, लेकिन क्षणभंगुर। इसलिए बोलचाल और कर्म में नरमी व सावधानी की सीख मिलती है।
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
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टैग : बेसबाती
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मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
EXPLANATION #1
ये मीर तक़ी मीर के मशहूर अशआर में से एक है। इस शे’र की बुनियाद ''मत सहल हमें जानो” पर है। सहल का मतलब आसान है और कम से कम भी। मगर इस शे’र में यह लफ़्ज़ कम से कम के मानी में इस्तेमाल हुआ है। फ़लक का मतलब आस्मान है और फ़लक के फिरने से तात्पर्य चक्कर काटने और मारा मारा फिरने के भी हैं। इस शे’र में फ़लक के फिरने से तात्पर्य मारा मारा फिरने के ही हैं। ख़ाक का मतलब ज़मीन, मिट्टी है और ख़ाक शब्द मीर ने इस लिए इस्तेमाल किया है कि इंसान ख़ाक (मिट्टी) से बना हुआ है यानी ख़ाकी कहा जाता है।
शे’र में ख़ास बात ये है कि शायर ने “फ़लक”, “ख़ाक” और “इंसान” जैसे शब्दों से बहुत कमाल का ख़्याल पेश किया है। शे’र के नज़दीक के मानी तो ये हुए कि ऐ इंसान हम जैसे लोगों को आसान मत समझो, हम जैसे लोग तब मिट्टी से पैदा होते हैं जब आस्मान बरसों तक भटकता है। लेकिन शायर अस्ल में ये कहना चाहता है कि हम जैसे कमाल के लोग रोज़ रोज़ पैदा नहीं होते बल्कि जब आस्मान बरसों मारा मारा फिरता है तब हम जैसे लोग पैदा होते हैं। इसलिए हमें कम या बहुत छोटा मत जानो। यानी जब आस्मान बरसों तक हम जैसे कमाल के लोगों को पैदा करने के लिए मारा मारा फिरता है तब कहीं जाकर हम मिट्टी के पर्दे से पैदा होते हैं।
इस शे’र में शब्द इंसान से दो मानी निकलते हैं, एक कमाल का, हुनरमंद और योग्य आदमी। दूसरा इंसानियत से भरपूर आदमी।
शफ़क़ सुपुरी
EXPLANATION #1
ये मीर तक़ी मीर के मशहूर अशआर में से एक है। इस शे’र की बुनियाद ''मत सहल हमें जानो” पर है। सहल का मतलब आसान है और कम से कम भी। मगर इस शे’र में यह लफ़्ज़ कम से कम के मानी में इस्तेमाल हुआ है। फ़लक का मतलब आस्मान है और फ़लक के फिरने से तात्पर्य चक्कर काटने और मारा मारा फिरने के भी हैं। इस शे’र में फ़लक के फिरने से तात्पर्य मारा मारा फिरने के ही हैं। ख़ाक का मतलब ज़मीन, मिट्टी है और ख़ाक शब्द मीर ने इस लिए इस्तेमाल किया है कि इंसान ख़ाक (मिट्टी) से बना हुआ है यानी ख़ाकी कहा जाता है।
शे’र में ख़ास बात ये है कि शायर ने “फ़लक”, “ख़ाक” और “इंसान” जैसे शब्दों से बहुत कमाल का ख़्याल पेश किया है। शे’र के नज़दीक के मानी तो ये हुए कि ऐ इंसान हम जैसे लोगों को आसान मत समझो, हम जैसे लोग तब मिट्टी से पैदा होते हैं जब आस्मान बरसों तक भटकता है। लेकिन शायर अस्ल में ये कहना चाहता है कि हम जैसे कमाल के लोग रोज़ रोज़ पैदा नहीं होते बल्कि जब आस्मान बरसों मारा मारा फिरता है तब हम जैसे लोग पैदा होते हैं। इसलिए हमें कम या बहुत छोटा मत जानो। यानी जब आस्मान बरसों तक हम जैसे कमाल के लोगों को पैदा करने के लिए मारा मारा फिरता है तब कहीं जाकर हम मिट्टी के पर्दे से पैदा होते हैं।
इस शे’र में शब्द इंसान से दो मानी निकलते हैं, एक कमाल का, हुनरमंद और योग्य आदमी। दूसरा इंसानियत से भरपूर आदमी।
शफ़क़ सुपुरी
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याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा
Interpretation:
Rekhta AI
कवि अपने ही मन को समझा रहा है कि प्रिय की याद को ज़रूरत से ज़्यादा सुंदर मत मानो। लेकिन वह जानता है कि एक बार फिर उसी याद को जगह दी, तो वह दिल पर चिपक जाएगी और मिटेगी नहीं। यहाँ प्रेम की तड़प, पछतावा और बेबस़ी साथ-साथ हैं। याद ही दिल की कैद बन जाती है।
Interpretation:
Rekhta AI
कवि अपने ही मन को समझा रहा है कि प्रिय की याद को ज़रूरत से ज़्यादा सुंदर मत मानो। लेकिन वह जानता है कि एक बार फिर उसी याद को जगह दी, तो वह दिल पर चिपक जाएगी और मिटेगी नहीं। यहाँ प्रेम की तड़प, पछतावा और बेबस़ी साथ-साथ हैं। याद ही दिल की कैद बन जाती है।
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टैग : याद
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'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर पूछने वालों पर व्यंग्य करता है कि मीर की धार्मिक पहचान अब सवाल नहीं रही। “मंदिर” और “माथे का निशान” सीमा-लांघने और दूसरी दुनिया अपनाने के प्रतीक हैं। भाव यह है कि प्रेम की तीव्रता इंसान को परंपरागत धर्म-खानों से बाहर ले जाती है। लहजे में तंज और बेपरवाही है।
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर पूछने वालों पर व्यंग्य करता है कि मीर की धार्मिक पहचान अब सवाल नहीं रही। “मंदिर” और “माथे का निशान” सीमा-लांघने और दूसरी दुनिया अपनाने के प्रतीक हैं। भाव यह है कि प्रेम की तीव्रता इंसान को परंपरागत धर्म-खानों से बाहर ले जाती है। लहजे में तंज और बेपरवाही है।
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टैग : मज़हब
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इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ इश्क़ को भारी पत्थर मानकर उसकी कठिनाई दिखाई गई है। कवि अपने-आप से या किसी कमज़ोर आशिक़ से कहता है कि प्रेम का भार उठाना साधारण बात नहीं। भाव यह है कि इश्क़ बड़ा और कठोर है, जबकि इंसान की ताक़त सीमित है, इसलिए भीतर बेबसी और दर्द है।
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ इश्क़ को भारी पत्थर मानकर उसकी कठिनाई दिखाई गई है। कवि अपने-आप से या किसी कमज़ोर आशिक़ से कहता है कि प्रेम का भार उठाना साधारण बात नहीं। भाव यह है कि इश्क़ बड़ा और कठोर है, जबकि इंसान की ताक़त सीमित है, इसलिए भीतर बेबसी और दर्द है।
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सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है
EXPLANATION #1
मीर के इस शे’र में कमाल की नाटकीय स्थिति पाई जाती है। इस नाटकीय स्थिति में कम से कम तीन पात्रों की कल्पना की जा सकती है। यदि यह मान लिया जाए कि काव्य पात्र कई लोगों से संबोधित हैं तो पात्रों का निर्धारण करना मुश्किल है। अर्थात ये कहना कि कितने लोग मीर की मिज़ाजपुर्सी के लिए आए हैं, स्पष्ट नहीं होता। इस शे’र में शब्द “टुक” (अर्थात ज़रा सा)को बीज स्थिति प्राप्त है क्योंकि इसी से शे’र में प्रभाव पैदा किया गया है। “रोते-रोते” से जो निरंतर रोने की स्थिति पैदा की गई है वो भी कम दिलचस्प नहीं है।
शे’र एक दृश्य की स्थिति को बयान करता है। सम्बोधित का लहजा चेतावनीपूर्ण भी हो सकता है और आग्रहपूर्ण भी। दूसरी स्थिति ये बनती है कि सम्बोधन केवल उन लोगों से है जो मीर के सिरहाने बैठ कर या तो गुफ़्तगू करते हैं या फिर मीर की तबीयत का हाल सम्बोधित से पूछ रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है कि जो लोग मिज़ाजपुर्सी सिरहाने बैठ कर करते हैं वो बीमार के ज़्यादा क़रीबी होते हैं। बहरहाल सम्बोधित का मीर के सिरहाने बैठ कर गुफ़्तगू करने वालों से कहना कि मीर के सिरहाने कोई न बोलो से ये भी स्पष्ट होता है कि मीर ज़रा सी आवाज़ से भी जाग सकते हैं। “अभी टुक रोते-रोते सो गया है” में कमाल की नाटकीयता है। अर्थात सम्बोधित गवाह है कि मीर ने बहुत देर तक रोया है, अब थक-हार के अभी ज़रा सा सो गए हैं। ज़रा सा जब कहा तो मानो मीर अभी उठकर फिर से रोना शुरू करेंगे।
शफ़क़ सुपुरी
EXPLANATION #1
मीर के इस शे’र में कमाल की नाटकीय स्थिति पाई जाती है। इस नाटकीय स्थिति में कम से कम तीन पात्रों की कल्पना की जा सकती है। यदि यह मान लिया जाए कि काव्य पात्र कई लोगों से संबोधित हैं तो पात्रों का निर्धारण करना मुश्किल है। अर्थात ये कहना कि कितने लोग मीर की मिज़ाजपुर्सी के लिए आए हैं, स्पष्ट नहीं होता। इस शे’र में शब्द “टुक” (अर्थात ज़रा सा)को बीज स्थिति प्राप्त है क्योंकि इसी से शे’र में प्रभाव पैदा किया गया है। “रोते-रोते” से जो निरंतर रोने की स्थिति पैदा की गई है वो भी कम दिलचस्प नहीं है।
शे’र एक दृश्य की स्थिति को बयान करता है। सम्बोधित का लहजा चेतावनीपूर्ण भी हो सकता है और आग्रहपूर्ण भी। दूसरी स्थिति ये बनती है कि सम्बोधन केवल उन लोगों से है जो मीर के सिरहाने बैठ कर या तो गुफ़्तगू करते हैं या फिर मीर की तबीयत का हाल सम्बोधित से पूछ रहे हैं। ज़ाहिर सी बात है कि जो लोग मिज़ाजपुर्सी सिरहाने बैठ कर करते हैं वो बीमार के ज़्यादा क़रीबी होते हैं। बहरहाल सम्बोधित का मीर के सिरहाने बैठ कर गुफ़्तगू करने वालों से कहना कि मीर के सिरहाने कोई न बोलो से ये भी स्पष्ट होता है कि मीर ज़रा सी आवाज़ से भी जाग सकते हैं। “अभी टुक रोते-रोते सो गया है” में कमाल की नाटकीयता है। अर्थात सम्बोधित गवाह है कि मीर ने बहुत देर तक रोया है, अब थक-हार के अभी ज़रा सा सो गए हैं। ज़रा सा जब कहा तो मानो मीर अभी उठकर फिर से रोना शुरू करेंगे।
शफ़क़ सुपुरी
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होगा किसी दीवार के साए में पड़ा 'मीर'
क्या रब्त मोहब्बत से उस आराम-तलब को
Interpretation:
Rekhta AI
पहली पंक्ति में दीवार की छाया में पड़े होने से थकान और टूटन का भाव बनता है। दूसरी पंक्ति व्यंग्य में कहती है कि सच्चा प्रेम बेचैनी और लगन माँगता है, आराम की चाह नहीं। इस तरह प्रेम की तड़प और आराम-चाहत के बीच का विरोध सामने आता है।
Interpretation:
Rekhta AI
पहली पंक्ति में दीवार की छाया में पड़े होने से थकान और टूटन का भाव बनता है। दूसरी पंक्ति व्यंग्य में कहती है कि सच्चा प्रेम बेचैनी और लगन माँगता है, आराम की चाह नहीं। इस तरह प्रेम की तड़प और आराम-चाहत के बीच का विरोध सामने आता है।
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दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
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Rekhta AI
प्रिय का दर्शन इतना तीव्र है कि प्रेमी की सुध-बुध चली जाती है और वह अपने ऊपर काबू नहीं रख पाता। पर यह मिलन नहीं बनता; उसी पल दूरी और बढ़ जाती है, मानो दर्शन के बाद भी प्रिय दूर चला गया। कविता में विरोधाभास है कि सामने आना भी अलगाव का कारण बन जाता है। भाव है तड़प, असहायता और प्रेम की तीखी चोट।
Interpretation:
Rekhta AI
प्रिय का दर्शन इतना तीव्र है कि प्रेमी की सुध-बुध चली जाती है और वह अपने ऊपर काबू नहीं रख पाता। पर यह मिलन नहीं बनता; उसी पल दूरी और बढ़ जाती है, मानो दर्शन के बाद भी प्रिय दूर चला गया। कविता में विरोधाभास है कि सामने आना भी अलगाव का कारण बन जाता है। भाव है तड़प, असहायता और प्रेम की तीखी चोट।
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उस के फ़रोग़-ए-हुस्न से झमके है सब में नूर
शम-ए-हरम हो या कि दिया सोमनात का
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर कहते हैं कि प्रिय के सौंदर्य का प्रकाश एक ही स्रोत से सब जगह फैलता है। हरम की शमा और सोमनाथ के दिए का साथ आना दिखाता है कि उजाला किसी एक धर्म-स्थान तक सीमित नहीं। दीपक-रूपक से भीतर की जागृति और सबमें एक ही चमक का भाव उभरता है।
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Rekhta AI
मीर तक़ी मीर कहते हैं कि प्रिय के सौंदर्य का प्रकाश एक ही स्रोत से सब जगह फैलता है। हरम की शमा और सोमनाथ के दिए का साथ आना दिखाता है कि उजाला किसी एक धर्म-स्थान तक सीमित नहीं। दीपक-रूपक से भीतर की जागृति और सबमें एक ही चमक का भाव उभरता है।
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हमारे आगे तिरा जब किसू ने नाम लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा को हम ने थाम थाम लिया
EXPLANATION #1
जब मेरे सामने किसी ने तुम्हारा नाम लिया,
मैंने अपने बहुत दुखी दिल को बार-बार संभाल लिया।
प्रिय का नाम सुनते ही दबा हुआ दर्द फिर से उठ खड़ा होता है। वक्ता का दिल पहले ही चोट खाया हुआ है, इसलिए वह अपने भावों को बाहर आने से रोकने के लिए उसे बार-बार थामता है। “थामना” रोने, कांपने और टूट जाने को छुपाने का संकेत है। यह प्रेम की तड़प और संयम की लड़ाई को दिखाता है।
मोहम्मद आज़म
EXPLANATION #1
जब मेरे सामने किसी ने तुम्हारा नाम लिया,
मैंने अपने बहुत दुखी दिल को बार-बार संभाल लिया।
प्रिय का नाम सुनते ही दबा हुआ दर्द फिर से उठ खड़ा होता है। वक्ता का दिल पहले ही चोट खाया हुआ है, इसलिए वह अपने भावों को बाहर आने से रोकने के लिए उसे बार-बार थामता है। “थामना” रोने, कांपने और टूट जाने को छुपाने का संकेत है। यह प्रेम की तड़प और संयम की लड़ाई को दिखाता है।
मोहम्मद आज़म
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मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया
EXPLANATION #1
मेरे अपने ढंग से भी मेरी मोहब्बत ठीक से निभ नहीं सकी।
मैंने पूरी ज़िंदगी सफल होने के बजाय असफलताओं से ही काम चलाया।
कवि कहता है कि उसके पास प्रेम निभाने की समझ थी, फिर भी प्रेम का अंत वैसा नहीं हुआ जैसा वह चाहता था। जीवन में उसे बार-बार हार और कमी ही मिली, उपलब्धि नहीं। इसमें आत्म-दोष और पीड़ा है, साथ ही यह विडंबना भी कि सच्ची कोशिश के बाद भी नतीजा असफलता रहा। कहीं न कहीं भाग्य के आगे बेबसी भी झलकती है।
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
EXPLANATION #1
मेरे अपने ढंग से भी मेरी मोहब्बत ठीक से निभ नहीं सकी।
मैंने पूरी ज़िंदगी सफल होने के बजाय असफलताओं से ही काम चलाया।
कवि कहता है कि उसके पास प्रेम निभाने की समझ थी, फिर भी प्रेम का अंत वैसा नहीं हुआ जैसा वह चाहता था। जीवन में उसे बार-बार हार और कमी ही मिली, उपलब्धि नहीं। इसमें आत्म-दोष और पीड़ा है, साथ ही यह विडंबना भी कि सच्ची कोशिश के बाद भी नतीजा असफलता रहा। कहीं न कहीं भाग्य के आगे बेबसी भी झलकती है।
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
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'मीर' हम मिल के बहुत ख़ुश हुए तुम से प्यारे
इस ख़राबे में मिरी जान तुम आबाद रहो
Interpretation:
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इस शेर में मिलन की खुशी के साथ मन की उजाड़ भी छिपी है। कवि अपने दिल/जीवन को “ख़राबा” यानी उजड़ा हुआ स्थान मानता है, फिर भी प्रिय का आना उसे अर्थ देता है। वह दुआ करता है कि इतनी टूटन के बीच भी प्रिय “आबाद” रहे—यानी खुश और सुरक्षित। भाव प्रेम, त्याग और मंगल-कामना का है।
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में मिलन की खुशी के साथ मन की उजाड़ भी छिपी है। कवि अपने दिल/जीवन को “ख़राबा” यानी उजड़ा हुआ स्थान मानता है, फिर भी प्रिय का आना उसे अर्थ देता है। वह दुआ करता है कि इतनी टूटन के बीच भी प्रिय “आबाद” रहे—यानी खुश और सुरक्षित। भाव प्रेम, त्याग और मंगल-कामना का है।
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चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर का संकेत है कि दुनिया वैसी नहीं, जैसी बस दिखती है—देखने वाले की दृष्टि उसे “आईना-घर” बना देती है। “दीवारों के बीच चेहरा” दिखना बताता है कि साधारण, सूनी जगहों में भी इंसान अपना ही प्रतिबिंब और अपनी पहचान पा सकता है। भाव यह है कि भीतर की जागरूकता बाहरी दुनिया को अर्थ से भर देती है।
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर का संकेत है कि दुनिया वैसी नहीं, जैसी बस दिखती है—देखने वाले की दृष्टि उसे “आईना-घर” बना देती है। “दीवारों के बीच चेहरा” दिखना बताता है कि साधारण, सूनी जगहों में भी इंसान अपना ही प्रतिबिंब और अपनी पहचान पा सकता है। भाव यह है कि भीतर की जागरूकता बाहरी दुनिया को अर्थ से भर देती है।
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किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया
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Rekhta AI
शायर अपनी रोती आँख से कहता है कि इतने बड़े दुख के बाद नींद कैसे आ सकती है। आँसू यहाँ सैलाब बनकर “शहर” को बहा ले जाते हैं, यानी उसका सारा संसार, चैन और व्यवस्था टूट चुकी है। पलकें खोलने का अर्थ है सच का सामना करना और जागे रहना। भाव यह है कि दुख की बाढ़ में इंसान पूरी तरह बेबस हो जाता है।
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शायर अपनी रोती आँख से कहता है कि इतने बड़े दुख के बाद नींद कैसे आ सकती है। आँसू यहाँ सैलाब बनकर “शहर” को बहा ले जाते हैं, यानी उसका सारा संसार, चैन और व्यवस्था टूट चुकी है। पलकें खोलने का अर्थ है सच का सामना करना और जागे रहना। भाव यह है कि दुख की बाढ़ में इंसान पूरी तरह बेबस हो जाता है।
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जम गया ख़ूँ कफ़-ए-क़ातिल पे तिरा 'मीर' ज़ि-बस
उन ने रो रो दिया कल हाथ को धोते धोते
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इस शेर में प्रिय को “क़ातिल” कहकर उसकी बेरहमी दिखाई गई है, और प्रेमी का ख़ून ऐसा दाग़ है जो आसानी से नहीं मिटता। हथेली पर ख़ून का जम जाना बताता है कि किए गए काम की निशानी पक्की हो गई। बार-बार हाथ धोना और साथ रोना पछतावे और अपराधबोध का संकेत है, लेकिन नुकसान वापस नहीं होता। विडंबना यही है कि हाथ धुल सकता है, पर किया हुआ अपराध नहीं मिटता।
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इस शेर में प्रिय को “क़ातिल” कहकर उसकी बेरहमी दिखाई गई है, और प्रेमी का ख़ून ऐसा दाग़ है जो आसानी से नहीं मिटता। हथेली पर ख़ून का जम जाना बताता है कि किए गए काम की निशानी पक्की हो गई। बार-बार हाथ धोना और साथ रोना पछतावे और अपराधबोध का संकेत है, लेकिन नुकसान वापस नहीं होता। विडंबना यही है कि हाथ धुल सकता है, पर किया हुआ अपराध नहीं मिटता।
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