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तअल्ली पर शेर

शायरों पर कभी-कभी आत्ममुग्घता

का ऐसा सुरूर छाता है कि वो शायरी में भी ख़ुद को ही आइडियल शक्ल में पेश करने लगता है। ऐसे अशआर तअल्ली के अशआर कहलाते हैं। तअल्ली शायरी का यह छोटा सा इन्तिख़ाब शायद आप के कुछ काम आ सके।

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे

कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर 'ताल्ली' यानी ख़ुद की तारीफ़ का एक बेहतरीन उदाहरण है। शायर मानता है कि दुनिया में और भी अच्छे कवि हैं, लेकिन साथ ही यह दावा करता है कि उसकी शैली या अंदाज़-ए-बयाँ बाकियों से बिल्कुल हटकर है, जो उसे सबसे ख़ास बनाता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

और 'फ़राज़' चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे

माओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया

अहमद फ़राज़

होगा कोई ऐसा भी कि 'ग़ालिब' को जाने

शाइर तो वो अच्छा है बदनाम बहुत है

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ग़ालिब मज़ाकिया अंदाज़ में खुद पर ही तंज कस रहे हैं। वे मानते हैं कि उनकी शायरी बहुत उम्दा है, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार करते हैं कि समाज में उनकी आदतों के कारण उनकी इज़्ज़त कम है। यह शेर उनकी कला और उनके जीवन के विरोधाभास को दर्शाता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो

जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फ़िराक़' को देखा है

Interpretation: Rekhta AI

कवि अपने समय के लोगों से कहता है कि उनका यह अनुभव भविष्य में सम्मान की बात बनेगा। ‘फ़िराक़’ को देखना केवल मुलाक़ात नहीं, महानता का साक्षी बनना है। शेर में ख्याति, विरासत और स्मरण का भाव है—आज का एक क्षण कल की पीढ़ियों के लिए गौरव बन जाता है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

सारे आलम पर हूँ मैं छाया हुआ

मुस्तनद है मेरा फ़रमाया हुआ

Interpretation: Rekhta AI

मीर तक़ी मीर इस शेर में अपने प्रभाव को इतना बड़ा बताते हैं कि वे ‘सारे आलम’ पर छा गए हैं। दूसरे मिसरे में वे कहते हैं कि उनकी बात अपने आप में प्रमाण है, यानी उनके शब्दों पर लोगों को भरोसा है। भाव का केंद्र आत्मविश्वास और वाणी की शक्ति है, जहाँ कथन ही मानक बन जाता है।

मीर तक़ी मीर

कभी 'फ़राज़' से कर मिलो जो वक़्त मिले

ये शख़्स ख़ूब है अशआर के अलावा भी

अहमद फ़राज़

ढूँडोगे अगर मुल्कों मुल्कों मिलने के नहीं नायाब हैं हम

जो याद आए भूल के फिर हम-नफ़सो वो ख़्वाब हैं हम

शाद अज़ीमाबादी

तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे

हम ऐसे लोग ज़माने में फिर कहाँ होंगे

इब्राहीम अश्क

मेरी घुट्टी में पड़ी थी हो के हल उर्दू ज़बाँ

जो भी मैं कहता गया हुस्न-ए-बयाँ बनता गया

Interpretation: Rekhta AI

फ़िराक़ गोरखपुरी कहते हैं कि उर्दू उनके भीतर शुरू से ही रची-बसी है, जैसे जन्म के साथ मिली घुट्टी में घुल जाए। “हुस्न-ए-बयाँ” का मतलब है बोलने में सुंदरता और असर, जो उनके शब्दों में बिना कोशिश के जाता है। भाव यह है कि भाषा से गहरा लगाव और स्वाभाविक वाणी-शक्ति मिलकर उनके कथन को कला बना देते हैं।

फ़िराक़ गोरखपुरी

यादगार-ए-ज़माना हैं हम लोग

सुन रखो तुम फ़साना हैं हम लोग

मुंतज़िर लखनवी

अपना लहू भर कर लोगों को बाँट गए पैमाने लोग

दुनिया भर को याद रहेंगे हम जैसे दीवाने लोग

कलीम आजिज़

और होते हैं जो महफ़िल में ख़मोश आते हैं

आँधियाँ आती हैं जब हज़रत-ए-'जोश' आते हैं

जोश मलसियानी

मिरी शाएरी में रक़्स-ए-जाम मय की रंग-फ़िशानियाँ

वही दुख-भरों की हिकायतें वही दिल-जलों की कहानियाँ

कलीम आजिज़

मेरा हर शेर है इक राज़-ए-हक़ीक़त 'बेख़ुद'

मैं हूँ उर्दू का 'नज़ीरी' मुझे तू क्या समझा

बेख़ुद देहलवी

देखे होंगे रिंद-ए-ला-उबाली तुम ने 'बेख़ुद' से

कि ऐसे लोग अब आँखों से ओझल होते जाते हैं

बेख़ुद देहलवी

'मीर' का तर्ज़ अपनाया सब ने लेकिन ये अंदाज़ कहाँ

'आज़मी'-साहिब आप की ग़ज़लें सुन सुन कर सब हैराँ हैं

ख़लील-उर-रहमान आज़मी
बोलिए