बोसे पर 20 बेहतरीन शेर

बोसा यानी चुंबन को उर्दू शाइरी की हर परंपरा में ख़ास अहमियत हासिल है। इश्क़-ओ-आशिक़ी के मामलात में ही इस के कई रंग नज़र आते हैं। उर्दू शाइरी में बोसे की तलब की कैफ़ियतों से ले कर माशूक़ के इनकार की सूरतों तक का बयान काफ़ी दिलचस्प है। यहाँ शोख़ी है, हास्य है, हसरत है और ग़ुस्से की मिली-जुली कैफ़ियतें हैं। प्रसुतुत शाइरी से आप को उर्दू शाइरी के कुछ ख़ास रंगों का अंदाज़ा होगा।

टॉप 20 सीरीज़

एक बोसे के भी नसीब हों

होंठ इतने भी अब ग़रीब हों

फ़रहत एहसास

एक बोसे के तलबगार हैं हम

और माँगें तो गुनहगार हैं हम

A kiss is all that I aspire for

I would be guilty if I ask for more

A kiss is all that I aspire for

I would be guilty if I ask for more

अज्ञात

एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गया

जो हरारत थी मिरी उस के बदन में गई

काविश बद्री

बोसे अपने आरिज़-ए-गुलफ़ाम के

ला मुझे दे दे तिरे किस काम के

मुज़्तर ख़ैराबादी

बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए

ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह

जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हम को

दे जो बोसा तो मुँह से कहीं जवाब तो दे

with just the sight of moving lips, kill me, let me die

if you don't kiss me with your lips, do at least reply

with just the sight of moving lips, kill me, let me die

if you don't kiss me with your lips, do at least reply

मिर्ज़ा ग़ालिब

बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए

लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए

हफ़ीज़ जौनपुरी

बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के

आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को

we shall kiss your beautiful face without counting

your lover is unversed in the science of accounting

we shall kiss your beautiful face without counting

your lover is unversed in the science of accounting

हैदर अली आतिश

क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए

हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का

अज्ञात

लजा कर शर्म खा कर मुस्कुरा कर

दिया बोसा मगर मुँह को बना कर

अज्ञात

बोसा जो तलब मैं ने किया हँस के वो बोले

ये हुस्न की दौलत है लुटाई नहीं जाती

अज्ञात

बदन का सारा लहू खिंच के गया रुख़ पर

वो एक बोसा हमें दे के सुर्ख़-रू है बहुत

ज़फ़र इक़बाल

ले लो बोसा अपना वापस किस लिए तकरार की

क्या कोई जागीर हम ने छीन ली सरकार की

अकबर मेरठी

जिस लब के ग़ैर बोसे लें उस लब से 'शेफ़्ता'

कम्बख़्त गालियाँ भी नहीं मेरे वास्ते

those lips that others get to kiss alas on them I see

not even curses or abuse are now assigned for me

those lips that others get to kiss alas on them I see

not even curses or abuse are now assigned for me

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं

ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया

आदिल मंसूरी

बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है

गालियाँ भी मिलीं हम को तो मिलीं थोड़ी सी

निज़ाम रामपुरी

बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई

मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं रहा हूँ अभी चूम कर बदन उस का

सुना था आग पे बोसा रक़म नहीं होता

शनावर इस्हाक़

बोसा होंटों का मिल गया किस को

दिल में कुछ आज दर्द मीठा है

मुनीर शिकोहाबादी