किस पर शेर
बोसा यानी चुंबन को उर्दू
शाइरी की हर परंपरा में ख़ास अहमियत हासिल है । इश्क़-ओ-आशिक़ी के मामलात में ही इस के कई रंग नज़र आते हैं । उर्दू शाइरी में बोसे की तलब की कैफ़ियतों से ले कर माशूक़ के इनकार की सूरतों तक का बयान काफ़ी दिलचस्प है । यहाँ शोख़ी है, हास्य है, हसरत है और ग़ुस्से की मिली-जुली कैफ़ियतें हैं । प्रसुतुत शाइरी से आप को उर्दू शाइरी के कुछ ख़ास रंगों का अंदाज़ा होगा ।
दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हम को
न दे जो बोसा तो मुँह से कहीं जवाब तो दे
Interpretation:
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शायर अपने महबूब की चुप्पी से परेशान है और कहता है कि अगर प्यार (बोसा) नहीं मिल सकता, तो कम से कम कुछ बोलो। महबूब के होंठों का हिलना ही इतना प्रभावशाली है कि वह शायर की जान लेने (काम तमाम करने) के लिए काफी है, भले ही वह जवाब में इनकार ही क्यों न करे।
बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह
जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है
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शायर अपने महबूब की चालाकी को बयान कर रहे हैं जो प्यार को एक व्यापार की तरह देखता है। महबूब दिल जैसा कीमती तोहफा तो चाहता है, लेकिन उसके बदले में एक बोसा भी नहीं देना चाहता; वह सोचता है कि बिना कोई कीमत चुकाए अगर यह मिल जाए तो बहुत फायदे का सौदा होगा।
धमका के बोसे लूँगा रुख़-ए-रश्क-ए-माह का
चंदा वसूल होता है साहब दबाव से
बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए
लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए
मिल गए थे एक बार उस के जो मेरे लब से लब
'उम्र भर होंटों पे अपने मैं ज़बाँ फेरा किया
बे-ख़ुदी में ले लिया बोसा ख़ता कीजे मुआफ़
ये दिल-ए-बेताब की सारी ख़ता थी मैं न था
बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए
ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही
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शायर अपने महबूब से बड़ी चतुराई से प्रेम की मांग कर रहा है। वह तर्क देता है कि चेहरा फूल जैसा है और होंठ पंखुड़ी जैसे, इसलिए अगर गाल (फूल) का बोसा नहीं मिल सकता, तो 'समझौते' के तौर पर होंठ (पंखुड़ी) का बोसा ही दे दें।
एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गया
जो हरारत थी मिरी उस के बदन में आ गई
बोसे अपने आरिज़-ए-गुलफ़ाम के
ला मुझे दे दे तिरे किस काम के
क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए
हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का
बदन का सारा लहू खिंच के आ गया रुख़ पर
वो एक बोसा हमें दे के सुर्ख़-रू है बहुत
बोसा लिया जो उस लब-ए-शीरीं का मर गए
दी जान हम ने चश्मा-ए-आब-ए-हयात पर
बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के
आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को
मोहब्बत एक पाकीज़ा अमल है इस लिए शायद
सिमट कर शर्म सारी एक बोसे में चली आई
बोसे बीवी के हँसी बच्चों की आँखें माँ की
क़ैद-ख़ाने में गिरफ़्तार समझिए हम को
क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसा नहीं दिया
बस चुप रहो हमारे भी मुँह में ज़बान है
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यहाँ ‘वाह’ कहना असल में ताना है: बोलने वाला अंदर ही अंदर शक और जलन से भरा है। दूसरी पंक्ति में वह अपना स्वाभिमान दिखाता है कि वह भी जवाब दे सकता है, बस अभी रुका हुआ है। भाव-केन्द्र ईर्ष्या, चोट और दबे हुए गुस्से की चेतावनी है।
जिस लब के ग़ैर बोसे लें उस लब से 'शेफ़्ता'
कम्बख़्त गालियाँ भी नहीं मेरे वास्ते
आता है जी में साक़ी-ए-मह-वश पे बार बार
लब चूम लूँ तिरा लब-ए-पैमाना छोड़ कर
उस लब से मिल ही जाएगा बोसा कभी तो हाँ
शौक़-ए-फ़ुज़ूल ओ जुरअत-ए-रिंदाना चाहिए
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ग़ालिब का कहना है कि प्यार में कामयाबी मिल सकती है, लेकिन इसके लिए साधारण कोशिश काफी नहीं है। प्रियतम का प्यार पाने के लिए पागलपन की हद तक जुनून और किसी शराबी जैसी निडरता चाहिए, जो समाज या अंजाम के डर से आज़ाद हो।
ले लो बोसा अपना वापस किस लिए तकरार की
क्या कोई जागीर हम ने छीन ली सरकार की
लब-ए-नाज़ुक के बोसे लूँ तो मिस्सी मुँह बनाती है
कफ़-ए-पा को अगर चूमूँ तो मेहंदी रंग लाती है
बोसा होंटों का मिल गया किस को
दिल में कुछ आज दर्द मीठा है
मैं आ रहा हूँ अभी चूम कर बदन उस का
सुना था आग पे बोसा रक़म नहीं होता
बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है
गालियाँ भी मिलीं हम को तो मिलीं थोड़ी सी
बोसाँ लबाँ सीं देने कहा कह के फिर गया
प्याला भरा शराब का अफ़्सोस गिर गया
बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई
मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा
क्या ताब क्या मजाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिला कर कहे बग़ैर
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इस शेर में चाहत के साथ संकोच और बेबसी है। कवि कहता है कि इच्छा होते हुए भी साहस नहीं पड़ता, जैसे खुद को इसकी अनुमति ही न मिले। होंठों का मिलना निकटता का रूपक है, लेकिन वह निकटता भी ‘कहे बगैर’ यानी बिना कहे-समझे/पूछे उसे असंभव लगती है।
हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं
ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया
सभी इनआम नित पाते हैं ऐ शीरीं-दहन तुझ से
कभू तू एक बोसे से हमारा मुँह भी मीठा कर
रुख़्सार पर है रंग-ए-हया का फ़रोग़ आज
बोसे का नाम मैं ने लिया वो निखर गए
लब-ए-ख़याल से उस लब का जो लिया बोसा
तो मुँह ही मुँह में अजब तरह का मज़ा आया
दिल-लगी में हसरत-ए-दिल कुछ निकल जाती तो है
बोसे ले लेते हैं हम दो-चार हँसते बोलते
जो उन को लिपटा के गाल चूमा हया से आने लगा पसीना
हुई है बोसों की गर्म भट्टी खिंचे न क्यूँकर शराब-ए-आरिज़
गुड़ सीं मीठा है बोसा तुझ लब का
इस जलेबी में क़ंद ओ शक्कर है
सादगी देख कि बोसे की तमअ रखता हूँ
जिन लबों से कि मयस्सर नहीं दुश्नाम मुझे
बोसा कैसा यही ग़नीमत है
कि न समझे वो लज़्ज़त-ए-दुश्नाम
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ग़ालिब यहाँ व्यंग्य के साथ अपनी कमी को भी ‘लाभ’ बना लेते हैं: चुंबन तो दूर, बस यह ग़नीमत है कि प्रिय उनकी कड़ी बातों में छिपी मोहब्बत की मिठास नहीं समझता/समझती। ‘दुश्नाम’ यानी डाँट-फटकार, शिकायत बनकर भी प्रेम की भाषा हो जाती है। भाव यह है कि प्रेम चोट खाया है, पर चाहत को तंज़ और सख़्त लहजे की आड़ में छिपाया गया है।
जी उठूँ फिर कर अगर तू एक बोसा दे मुझे
चूसना लब का तिरे है मुझ को जूँ आब-ए-हयात
लुटाते हैं वो दौलत हुस्न की बावर नहीं आता
हमें तो एक बोसा भी बड़ी मुश्किल से मिलता है
नमकीं गोया कबाब हैं फीके शराब के
बोसा है तुझ लबाँ का मज़े-दार चटपटा
हम तो क्यूँकर कहें कि बोसा दो
गर इनायत करो इनायत है
बोले वो बोसा-हा-ए-पैहम पर
अरे कम-बख़्त कुछ हिसाब भी है
बोसे में होंट उल्टा आशिक़ का काट खाया
तेरा दहन मज़े सीं पुर है पे है कटोरा
रखे है लज़्ज़त-ए-बोसा से मुझ को गर महरूम
तो अपने तू भी न होंटों तलक ज़बाँ पहुँचा
जी में है इतने बोसे लीजे कि आज
महर उस के वहाँ से उठ जावे
उस वक़्त दिल पे क्यूँके कहूँ क्या गुज़र गया
बोसा लेते लिया तो सही लेक मर गया