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रद करें डाउनलोड शेर

बोसे पर 20 बेहतरीन शेर

बोसा यानी चुंबन को उर्दू

शाइरी की हर परंपरा में ख़ास अहमियत हासिल है। इश्क़-ओ-आशिक़ी के मामलात में ही इस के कई रंग नज़र आते हैं। उर्दू शाइरी में बोसे की तलब की कैफ़ियतों से ले कर माशूक़ के इनकार की सूरतों तक का बयान काफ़ी दिलचस्प है। यहाँ शोख़ी है, हास्य है, हसरत है और ग़ुस्से की मिली-जुली कैफ़ियतें हैं। प्रसुतुत शाइरी से आप को उर्दू शाइरी के कुछ ख़ास रंगों का अंदाज़ा होगा।

टॉप 20 सीरीज़

दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हम को

दे जो बोसा तो मुँह से कहीं जवाब तो दे

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब की चुप्पी से परेशान है और कहता है कि अगर प्यार (बोसा) नहीं मिल सकता, तो कम से कम कुछ बोलो। महबूब के होंठों का हिलना ही इतना प्रभावशाली है कि वह शायर की जान लेने (काम तमाम करने) के लिए काफी है, भले ही वह जवाब में इनकार ही क्यों करे।

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब की चुप्पी से परेशान है और कहता है कि अगर प्यार (बोसा) नहीं मिल सकता, तो कम से कम कुछ बोलो। महबूब के होंठों का हिलना ही इतना प्रभावशाली है कि वह शायर की जान लेने (काम तमाम करने) के लिए काफी है, भले ही वह जवाब में इनकार ही क्यों करे।

मिर्ज़ा ग़ालिब

बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह

जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब की चालाकी को बयान कर रहे हैं जो प्यार को एक व्यापार की तरह देखता है। महबूब दिल जैसा कीमती तोहफा तो चाहता है, लेकिन उसके बदले में एक बोसा भी नहीं देना चाहता; वह सोचता है कि बिना कोई कीमत चुकाए अगर यह मिल जाए तो बहुत फायदे का सौदा होगा।

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब की चालाकी को बयान कर रहे हैं जो प्यार को एक व्यापार की तरह देखता है। महबूब दिल जैसा कीमती तोहफा तो चाहता है, लेकिन उसके बदले में एक बोसा भी नहीं देना चाहता; वह सोचता है कि बिना कोई कीमत चुकाए अगर यह मिल जाए तो बहुत फायदे का सौदा होगा।

मिर्ज़ा ग़ालिब

एक बोसे के भी नसीब हों

होंठ इतने भी अब ग़रीब हों

फ़रहत एहसास

बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए

लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए

हफ़ीज़ जौनपुरी

एक बोसे के तलबगार हैं हम

और माँगें तो गुनहगार हैं हम

अज्ञात

बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए

ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब से बड़ी चतुराई से प्रेम की मांग कर रहा है। वह तर्क देता है कि चेहरा फूल जैसा है और होंठ पंखुड़ी जैसे, इसलिए अगर गाल (फूल) का बोसा नहीं मिल सकता, तो 'समझौते' के तौर पर होंठ (पंखुड़ी) का बोसा ही दे दें।

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब से बड़ी चतुराई से प्रेम की मांग कर रहा है। वह तर्क देता है कि चेहरा फूल जैसा है और होंठ पंखुड़ी जैसे, इसलिए अगर गाल (फूल) का बोसा नहीं मिल सकता, तो 'समझौते' के तौर पर होंठ (पंखुड़ी) का बोसा ही दे दें।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गया

जो हरारत थी मिरी उस के बदन में गई

काविश बद्री

बोसे अपने आरिज़-ए-गुलफ़ाम के

ला मुझे दे दे तिरे किस काम के

मुज़्तर ख़ैराबादी

क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए

हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का

अज्ञात

बोसा जो तलब मैं ने किया हँस के वो बोले

ये हुस्न की दौलत है लुटाई नहीं जाती

अज्ञात

लजा कर शर्म खा कर मुस्कुरा कर

दिया बोसा मगर मुँह को बना कर

अज्ञात

बदन का सारा लहू खिंच के गया रुख़ पर

वो एक बोसा हमें दे के सुर्ख़-रू है बहुत

ज़फ़र इक़बाल

बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के

आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को

हैदर अली आतिश

जिस लब के ग़ैर बोसे लें उस लब से 'शेफ़्ता'

कम्बख़्त गालियाँ भी नहीं मेरे वास्ते

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

ले लो बोसा अपना वापस किस लिए तकरार की

क्या कोई जागीर हम ने छीन ली सरकार की

अकबर मेरठी

बोसा होंटों का मिल गया किस को

दिल में कुछ आज दर्द मीठा है

मुनीर शिकोहाबादी

मैं रहा हूँ अभी चूम कर बदन उस का

सुना था आग पे बोसा रक़म नहीं होता

शनावर इस्हाक़

बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है

गालियाँ भी मिलीं हम को तो मिलीं थोड़ी सी

निज़ाम रामपुरी

बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई

मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा

साक़ी फ़ारुक़ी

हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं

ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया

आदिल मंसूरी
बोलिए