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मिर्ज़ा ग़ालिब की टॉप 20 शायरी
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर जन्नत के अस्तित्व पर एक चुलबुला कटाक्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी न किसी उम्मीद की ज़रूरत होती है। जन्नत का यह 'ख़याल' एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर जन्नत के अस्तित्व पर एक चुलबुला कटाक्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी न किसी उम्मीद की ज़रूरत होती है। जन्नत का यह 'ख़याल' एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।
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उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
Interpretation:
Rekhta AI
प्रिय की मौजूदगी प्रेमी के चेहरे पर पल भर की रौनक ले आती है, जबकि भीतर की पीड़ा बनी रहती है। देखने वाले इस बाहरी चमक को सेहत का संकेत समझ लेते हैं और असली दुख नहीं देख पाते। शे’र प्रेम की ‘बीमारी’ और दिखने‑वाले हाल व असली हाल के अंतर को मार्मिक ढंग से कहता है।
Interpretation:
Rekhta AI
प्रिय की मौजूदगी प्रेमी के चेहरे पर पल भर की रौनक ले आती है, जबकि भीतर की पीड़ा बनी रहती है। देखने वाले इस बाहरी चमक को सेहत का संकेत समझ लेते हैं और असली दुख नहीं देख पाते। शे’र प्रेम की ‘बीमारी’ और दिखने‑वाले हाल व असली हाल के अंतर को मार्मिक ढंग से कहता है।
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टैग : ज़र्बुल-मसल
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मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में प्रेम की चरम अवस्था दिखाई गई है, जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है। प्रेमी की जिंदगी का सहारा प्रिय का दर्शन है, लेकिन वही प्रिय इतना कठोर/उदासीन है कि उसी के कारण जान भी जा सकती है। एक ही चेहरा जीवन भी देता है और मृत्यु भी—यही तड़प और समर्पण का भाव है।
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में प्रेम की चरम अवस्था दिखाई गई है, जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है। प्रेमी की जिंदगी का सहारा प्रिय का दर्शन है, लेकिन वही प्रिय इतना कठोर/उदासीन है कि उसी के कारण जान भी जा सकती है। एक ही चेहरा जीवन भी देता है और मृत्यु भी—यही तड़प और समर्पण का भाव है।
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रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा न हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा न हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।
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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर मनुष्य की न खत्म होने वाली चाहत और अतृप्ति को दिखाता है। “दम निकलना” एक रूपक है, जो बताता है कि इच्छा की तीव्रता इंसान को भीतर तक थका देती है। फिर भी, जब कई अरमान पूरे हो जाते हैं, तब भी संतोष नहीं मिलता, क्योंकि दिल की माँगें लगातार बढ़ती रहती हैं।
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर मनुष्य की न खत्म होने वाली चाहत और अतृप्ति को दिखाता है। “दम निकलना” एक रूपक है, जो बताता है कि इच्छा की तीव्रता इंसान को भीतर तक थका देती है। फिर भी, जब कई अरमान पूरे हो जाते हैं, तब भी संतोष नहीं मिलता, क्योंकि दिल की माँगें लगातार बढ़ती रहती हैं।
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रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं
Interpretation:
Rekhta AI
मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ दुख को मन की आदत से जोड़ते हैं: बार-बार कष्ट सहने से मन मजबूत हो जाता है। लगातार कठिनाइयाँ मिलने पर उनका डर और तीखापन कम हो जाता है, क्योंकि इंसान उन्हें झेलना सीख लेता है। भाव यह है कि तकलीफ़ भी समय के साथ सहने लायक बन जाती है।
Interpretation:
Rekhta AI
मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ दुख को मन की आदत से जोड़ते हैं: बार-बार कष्ट सहने से मन मजबूत हो जाता है। लगातार कठिनाइयाँ मिलने पर उनका डर और तीखापन कम हो जाता है, क्योंकि इंसान उन्हें झेलना सीख लेता है। भाव यह है कि तकलीफ़ भी समय के साथ सहने लायक बन जाती है।
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हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर 'ताल्ली' यानी ख़ुद की तारीफ़ का एक बेहतरीन उदाहरण है। शायर मानता है कि दुनिया में और भी अच्छे कवि हैं, लेकिन साथ ही यह दावा करता है कि उसकी शैली या अंदाज़-ए-बयाँ बाकियों से बिल्कुल हटकर है, जो उसे सबसे ख़ास बनाता है।
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर 'ताल्ली' यानी ख़ुद की तारीफ़ का एक बेहतरीन उदाहरण है। शायर मानता है कि दुनिया में और भी अच्छे कवि हैं, लेकिन साथ ही यह दावा करता है कि उसकी शैली या अंदाज़-ए-बयाँ बाकियों से बिल्कुल हटकर है, जो उसे सबसे ख़ास बनाता है।
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में ग़ालिब ने बहुत ही विनम्रता से महान शायर मीर तक़ी 'मीर' की बड़ाई की है। वे खुद को समझाते हुए कहते हैं कि भले ही आज मैं उस्ताद हूँ, लेकिन मुझसे पहले भी एक ऐसा शायर था जिसे ज़माना 'मीर' कहता था। यह शेर अपने से बड़ों का सम्मान करने और अपनी कला पर घमंड न करने की सीख देता है।
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Rekhta AI
इस शेर में ग़ालिब ने बहुत ही विनम्रता से महान शायर मीर तक़ी 'मीर' की बड़ाई की है। वे खुद को समझाते हुए कहते हैं कि भले ही आज मैं उस्ताद हूँ, लेकिन मुझसे पहले भी एक ऐसा शायर था जिसे ज़माना 'मीर' कहता था। यह शेर अपने से बड़ों का सम्मान करने और अपनी कला पर घमंड न करने की सीख देता है।
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
Interpretation:
Rekhta AI
शायर का कहना है कि प्रेमी से मिलन उनकी किस्मत में था ही नहीं। उन्हें अपनी मौत का या जीवन के छोटा होने का कोई अफ़सोस नहीं है, क्योंकि अगर ज़िंदगी लंबी होती तो भी मिलन नहीं होता, बस इंतज़ार का दुख और लंबा खिंच जाता। यह शेर नाकामी को स्वीकार करने की बात करता है।
Interpretation:
Rekhta AI
शायर का कहना है कि प्रेमी से मिलन उनकी किस्मत में था ही नहीं। उन्हें अपनी मौत का या जीवन के छोटा होने का कोई अफ़सोस नहीं है, क्योंकि अगर ज़िंदगी लंबी होती तो भी मिलन नहीं होता, बस इंतज़ार का दुख और लंबा खिंच जाता। यह शेर नाकामी को स्वीकार करने की बात करता है।
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काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुम को मगर नहीं आती
Interpretation:
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शायर खुद पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि सारा जीवन पापों और दुनियादारी में बिताने के बाद अब वह किस हक से ईश्वर के घर जाने की सोच रहा है। यह शेर इंसान की बेशर्मी को दर्शाता है कि अपनी गलतियों और कमियों को जानने के बाद भी उसमें लज्जा या पछतावे की भावना नहीं है।
Interpretation:
Rekhta AI
शायर खुद पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि सारा जीवन पापों और दुनियादारी में बिताने के बाद अब वह किस हक से ईश्वर के घर जाने की सोच रहा है। यह शेर इंसान की बेशर्मी को दर्शाता है कि अपनी गलतियों और कमियों को जानने के बाद भी उसमें लज्जा या पछतावे की भावना नहीं है।
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न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
Interpretation:
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यह शेर सूफी दर्शन के उस विचार को दर्शाता है कि सब कुछ ईश्वर है। ग़ालिब अफसोस जताते हैं कि उनके अलग 'होने' या अस्तित्व ने उन्हें परमात्मा से जुदा कर दिया है। यदि उनका निर्माण न हुआ होता, तो वे उस परम सत्य का ही अटूट हिस्सा होते।
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यह शेर सूफी दर्शन के उस विचार को दर्शाता है कि सब कुछ ईश्वर है। ग़ालिब अफसोस जताते हैं कि उनके अलग 'होने' या अस्तित्व ने उन्हें परमात्मा से जुदा कर दिया है। यदि उनका निर्माण न हुआ होता, तो वे उस परम सत्य का ही अटूट हिस्सा होते।
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कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
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ग़ालिब यहाँ प्रेम-पीड़ा को ऐसे तीर से दिखाते हैं जो पूरा निकलता नहीं, इसलिए घाव बंद भी नहीं होता और दर्द बना रहता है। ‘आर-पार’ जाना एक साफ़, पूरा ज़ख्म है, पर ‘अध-निकला’ तीर अधूरी चोट का संकेत है। भाव यह है कि अनिश्चित, अधूरा दुख सबसे ज़्यादा तड़पाता है।
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ग़ालिब यहाँ प्रेम-पीड़ा को ऐसे तीर से दिखाते हैं जो पूरा निकलता नहीं, इसलिए घाव बंद भी नहीं होता और दर्द बना रहता है। ‘आर-पार’ जाना एक साफ़, पूरा ज़ख्म है, पर ‘अध-निकला’ तीर अधूरी चोट का संकेत है। भाव यह है कि अनिश्चित, अधूरा दुख सबसे ज़्यादा तड़पाता है।
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इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
Interpretation:
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ग़ालिब कहते हैं कि अपने अहंकार को मिटा देने में ही असली आनंद है, जैसे बूंद नदी में मिल जाती है। दूसरी पंक्ति का भाव यह है कि जब दुःख बहुत बढ़ जाता है, तो इंसान को उसका अहसास होना बंद हो जाता है, जिससे दर्द ही सुकून बन जाता है।
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ग़ालिब कहते हैं कि अपने अहंकार को मिटा देने में ही असली आनंद है, जैसे बूंद नदी में मिल जाती है। दूसरी पंक्ति का भाव यह है कि जब दुःख बहुत बढ़ जाता है, तो इंसान को उसका अहसास होना बंद हो जाता है, जिससे दर्द ही सुकून बन जाता है।
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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
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शायर कहता है कि प्रेम की पुकार का असर होने में बहुत लंबा समय लगता है, जबकि इंसान की ज़िंदगी बहुत छोटी है। प्रेमिका की 'ज़ुल्फ़ों के सर होने' यानी प्रेम की जटिलताओं के सुलझने तक, इंतज़ार करने वाला प्रेमी जीवित ही नहीं बचता। यह शेर इंसान की मजबूरी और समय की कमी को दर्शाता है।
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शायर कहता है कि प्रेम की पुकार का असर होने में बहुत लंबा समय लगता है, जबकि इंसान की ज़िंदगी बहुत छोटी है। प्रेमिका की 'ज़ुल्फ़ों के सर होने' यानी प्रेम की जटिलताओं के सुलझने तक, इंतज़ार करने वाला प्रेमी जीवित ही नहीं बचता। यह शेर इंसान की मजबूरी और समय की कमी को दर्शाता है।
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क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन
Interpretation:
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यह शेर गरीबी के बीच भी उम्मीद और जिद का भाव दिखाता है। उधार की शराब मजबूरी भी है और बेफिक्री का ढोंग भी, और “फ़ाक़ा-मस्ती” भूख से उपजी अजीब-सी बेसुध हिम्मत का रूपक है। व्यंग्य यह है कि इंसान अपनी तंगी को भी किसी आने वाली कामयाबी का कारण मानकर खुद को संभाल लेता है।
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यह शेर गरीबी के बीच भी उम्मीद और जिद का भाव दिखाता है। उधार की शराब मजबूरी भी है और बेफिक्री का ढोंग भी, और “फ़ाक़ा-मस्ती” भूख से उपजी अजीब-सी बेसुध हिम्मत का रूपक है। व्यंग्य यह है कि इंसान अपनी तंगी को भी किसी आने वाली कामयाबी का कारण मानकर खुद को संभाल लेता है।
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बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
Interpretation:
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ग़ालिब कहते हैं कि दुनिया में सरलता मिलना कठिन है। उन्होंने 'आदमी' (शारीरिक अस्तित्व) और 'इंसान' (नैतिक और मानवीय गुणों से पूर्ण) में अंतर किया है। जिस तरह हर काम आसान नहीं होता, वैसे ही जन्म से आदमी होने के बावजूद, उसमें मानवता के गुण पैदा करना एक अत्यंत कठिन साधना है।
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ग़ालिब कहते हैं कि दुनिया में सरलता मिलना कठिन है। उन्होंने 'आदमी' (शारीरिक अस्तित्व) और 'इंसान' (नैतिक और मानवीय गुणों से पूर्ण) में अंतर किया है। जिस तरह हर काम आसान नहीं होता, वैसे ही जन्म से आदमी होने के बावजूद, उसमें मानवता के गुण पैदा करना एक अत्यंत कठिन साधना है।
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
Interpretation:
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मिर्ज़ा ग़ालिब दुनिया को बच्चों के खेल का मैदान कहकर उसकी गंभीरता पर सवाल उठाते हैं, मानो यह सब असल नहीं, बस खेल है। “रात-दिन” का चलना एक लगातार मंच-सा बन जाता है, जिसमें घटनाएँ आती-जाती रहती हैं। भाव-केन्द्र में जीवन से ऊब और दूरी है: कवि भाग नहीं लेता, केवल देखता है।
Interpretation:
Rekhta AI
मिर्ज़ा ग़ालिब दुनिया को बच्चों के खेल का मैदान कहकर उसकी गंभीरता पर सवाल उठाते हैं, मानो यह सब असल नहीं, बस खेल है। “रात-दिन” का चलना एक लगातार मंच-सा बन जाता है, जिसमें घटनाएँ आती-जाती रहती हैं। भाव-केन्द्र में जीवन से ऊब और दूरी है: कवि भाग नहीं लेता, केवल देखता है।
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब ने इस शेर में धार्मिक दिखावे और पाखंड पर करारा व्यंग्य किया है। वे कहते हैं कि वैसे तो धर्मगुरु और शराबखाने का कोई संबंध नहीं होना चाहिए, लेकिन सच्चाई अलग है। जब शायर (जो अपनी कमियों को मानता है) बाहर निकल रहा था, तब धर्मगुरु चुपके से अंदर जा रहे थे, जो उनकी दोहरी मानसिकता को दर्शाता है।
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब ने इस शेर में धार्मिक दिखावे और पाखंड पर करारा व्यंग्य किया है। वे कहते हैं कि वैसे तो धर्मगुरु और शराबखाने का कोई संबंध नहीं होना चाहिए, लेकिन सच्चाई अलग है। जब शायर (जो अपनी कमियों को मानता है) बाहर निकल रहा था, तब धर्मगुरु चुपके से अंदर जा रहे थे, जो उनकी दोहरी मानसिकता को दर्शाता है।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब का कहना है कि अगर वे ठीक हो जाते, तो उन्हें दवा या हकीम का एहसान मानना पड़ता। इसलिए बीमारी का न जाना उनके लिए अच्छा रहा क्योंकि इससे उनका स्वाभिमान बचा रहा और उन्हें ठीक होने के लिए किसी का आभारी नहीं बनना पड़ा।
Interpretation:
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ग़ालिब का कहना है कि अगर वे ठीक हो जाते, तो उन्हें दवा या हकीम का एहसान मानना पड़ता। इसलिए बीमारी का न जाना उनके लिए अच्छा रहा क्योंकि इससे उनका स्वाभिमान बचा रहा और उन्हें ठीक होने के लिए किसी का आभारी नहीं बनना पड़ा।
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