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व्हाट्सऐप पर शेर

जो गुज़ारी जा सकी हम से

हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है

जौन एलिया

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए

फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए

अहमद फ़राज़

आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए

वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है

मुनीर नियाज़ी

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा

अहमद फ़राज़

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया

तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

हमारे नसीब में यह नहीं लिखा था कि हमें अपने प्रियतम से मिलन प्राप्त होता।

अगर हम और ज़्यादा दिन ज़िंदा रहते, तो भी बस उनका इंतज़ार ही करते रहते।

शायर का कहना है कि प्रेमी से मिलन उनकी किस्मत में था ही नहीं। उन्हें अपनी मौत का या जीवन के छोटा होने का कोई अफ़सोस नहीं है, क्योंकि अगर ज़िंदगी लंबी होती तो भी मिलन नहीं होता, बस इंतज़ार का दुख और लंबा खिंच जाता। यह शेर नाकामी को स्वीकार करने की बात करता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

तुम सलामत रहो हज़ार बरस

हर बरस के हों दिन पचास हज़ार

तुम हज़ार साल तक सुरक्षित और स्वस्थ रहो।

और हर साल के दिन इतने ज़्यादा हों जैसे पचास हज़ार दिन हों।

यह शेर दुआ और प्रेम का इज़हार है, जिसमें अतिशयोक्ति से समय को बहुत बड़ा कर दिया गया है। कहने वाला चाहता है कि प्रिय की उम्र सिर्फ़ लंबी हो, बल्कि समय की कमी ही मिट जाए। इसलिए वह हर साल में “पचास हज़ार दिन” होने की कामना करता है, जो सच नहीं बल्कि चाहत की तीव्रता है। भावनात्मक केंद्र कोमलता, अपनापन और हमेशा साथ रहने की इच्छा है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

मोहब्बत अब नहीं होगी ये कुछ दिन ब'अद में होगी

गुज़र जाएँगे जब ये दिन ये उन की याद में होगी

मुनीर नियाज़ी

इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से

मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते

फ़रहत एहसास

मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर

ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ

अहमद फ़राज़

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं

शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं

जौन एलिया

सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त

मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं

अहमद फ़राज़

मैं अब हर शख़्स से उक्ता चुका हूँ

फ़क़त कुछ दोस्त हैं और दोस्त भी क्या

जौन एलिया

मुझ को अक्सर उदास करती है

एक तस्वीर मुस्कुराती हुई

विकास शर्मा राज़

इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र

काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

जौन एलिया

हम हैं असीर-ए-ज़ब्त इजाज़त नहीं हमें

रो पा रहे हैं आप बधाई है रोइए

अब्बास क़मर

जैसी अब है ऐसी हालत में नहीं रह सकता

मैं हमेशा तो मोहब्बत में नहीं रह सकता

ज़फ़र इक़बाल

तुम आए हो शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है

तलाश में है सहर बार बार गुज़री है

Rekhta AI Explanation

इस शे’र को प्रायः टीकाकारों और आलोचकों ने प्रगतिशील विचारों की दृष्टि से देखा है। उनकी नज़र में “तुम”, “इन्क़िलाब”, “शब-ए-इंतज़ार” द्विधा, शोषण और अन्वेषण का प्रतीक है। इस दृष्टि से शे’र का विषय ये बनता है कि क्रांति करने का प्रयत्न करने वालों ने शोषक तत्वों के विरुद्ध हालांकि बहुत कोशिशें की मगर हर दौर अपने साथ नए शोषक तत्व लाता है। चूँकि फ़ैज़ ने अपनी शायरी में उर्दू शायरी की परंपरा से बग़ावत नहीं की और पारंपरिक विधानों को ही बरता है इसलिए इस शे’र को अगर प्रगतिशील सोच के दायरे से निकाल कर भी देखा जाये तो इसमें एक प्रेमी अपनी प्रेमिका से कहता है कि तुम आए और इंतज़ार की रात गुज़री। हालांकि नियम ये है कि हर रात की सुबह होती है मगर सुबह के बार-बार आने के बावजूद इंतज़ार की रात ख़त्म नहीं होती।

शफ़क़ सुपुरी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

लाया है मिरा शौक़ मुझे पर्दे से बाहर

मैं वर्ना वही ख़ल्वती-ए-राज़-ए-निहाँ हूँ

मेरे शौक ने मुझे परदे के पीछे से बाहर, सबके सामने ला दिया है।

वरना मैं तो वही इंसान हूँ जो छिपे हुए राज़ों के एकांत में रहता है।

वक्ता कहता है कि खुलकर सामने आना उसकी आदत नहीं; उसे उसकी तड़प ही परदे से बाहर ले आई। “परदा” छिपाव और संकोच का संकेत है, और “छिपे राज़ों का एकांत” अंदरूनी, गुप्त स्वभाव को दिखाता है। भाव यह है कि चाह इतनी तीखी है कि आदमी अपने भीतर के बंद दरवाज़े भी खोल देता है।

मीर तक़ी मीर

ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा

दिल के जाने का निहायत ग़म रहा

जब तक शरीर में सांस थी, तब तक दुख भी साथ रहा।

दिल के चले जाने का दुख बहुत ही ज़्यादा रहा।

वक्ता कहता है कि उसका दुख जीवन भर कम नहीं हुआ, जैसे हर सांस के साथ वह दुख भी चलता रहा। “दिल का जाना” केवल हृदय का रहना नहीं, बल्कि प्रेम, हिम्मत और जीने की चाह का छूट जाना भी है। इसी कारण यह दुख सबसे गहरा बन जाता है। शेर की भावना लगातार बनी रहने वाली टूटन और हानि है।

मीर तक़ी मीर

जो तलब पे अहद-ए-वफ़ा किया तो वो आबरू-ए-वफ़ा गई

सर-ए-आम जब हुए मुद्दई तो सवाब-ए-सिदक़-ओ-वफ़ा गया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो अब भी दिल दुखा देता है मेरा

वो मेरा दोस्त है दुश्मन नहीं है

अभिषेक कुमार अम्बर

हम तिरा हिज्र मनाने के लिए निकले हैं

शहर में आग लगाने के लिए निकले हैं

जौन एलिया

आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो

बावले हो जाओगे महताब मत देखा करो

अहमद फ़राज़

बस मोहब्बत बस मोहब्बत बस मोहब्बत जान-ए-मन

बाक़ी सब जज़्बात का इज़हार कम कर दीजिए

फ़रहत एहसास

रक्खी हुई है दोनों की बुनियाद रेत पर

सहरा-ए-बे-कराँ को समुंदर लिखेंगे हम

अमीर इमाम

हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है

ख़ुद को माज़ी का निहाँ-ख़ाना बना रक्खा है

अब्बास क़मर

पहले सहरा से मुझे लाया समुंदर की तरफ़

नाव पर काग़ज़ की फिर मुझ को सवार उस ने किया

अमीर इमाम

मेरी कोशिश तो यही है कि ये मासूम रहे

और दिल है कि समझदार हुआ जाता है

विकास शर्मा राज़

जाने क्या कुछ हो छुपा तुम में मोहब्बत के सिवा

हम तसल्ली के लिए फिर से खगालेंगे तुम्हें

अभिषेक शुक्ला

चलो इतनी तो आसानी रहेगी

मिलेंगे और परेशानी रहेगी

ज़फ़र इक़बाल
बोलिए