हसरत पर शेर
दिल के खज़ाने में नाकाम
ख़्वाहिशों की कभी कमी नहीं रहती। ये हसरतें यादों की शक्ल में उदास करने के बहाने ढूंढती रहती हैं। उर्दू की क्लासिकी शायरी इन हसरतों के बयान से भरी पड़ी है। ज़िन्दगी के किसी न किसी लम्हे में शायर उस दौर को लफ़्ज़ देना नहीं भूलता जब हसरतें ही उसकी ज़िन्दगी का वाहिद सहारा रह गई हों। हसरत शायरी का यह इन्तिख़ाब पेश हैः
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर मनुष्य की न खत्म होने वाली चाहत और अतृप्ति को दिखाता है। “दम निकलना” एक रूपक है, जो बताता है कि इच्छा की तीव्रता इंसान को भीतर तक थका देती है। फिर भी, जब कई अरमान पूरे हो जाते हैं, तब भी संतोष नहीं मिलता, क्योंकि दिल की माँगें लगातार बढ़ती रहती हैं।
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ कवि अपनी “हसरतों” को जैसे व्यक्ति मानकर उनसे बात करता है, मानो वे दिल में रहने आ गई हों। दिल पहले से दुख और घावों के निशानों से भरा है, इसलिए नई इच्छाओं को रखने की गुंजाइश नहीं बची। भाव यह है कि पीड़ा ने मन को इतना भर दिया है कि अब चाहत भी बोझ लगने लगी है।
मैं तो ग़ज़ल सुना के अकेला खड़ा रहा
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गए
इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद
आरज़ू है कि तू यहाँ आए
और फिर उम्र भर न जाए कहीं
अब दिल की तमन्ना है तो ऐ काश यही हो
आँसू की जगह आँख से हसरत निकल आए
कुछ नज़र आता नहीं उस के तसव्वुर के सिवा
हसरत-ए-दीदार ने आँखों को अंधा कर दिया
सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते
आरज़ू हसरत और उम्मीद शिकायत आँसू
इक तिरा ज़िक्र था और बीच में क्या क्या निकला
ख़्वाब, उम्मीद, तमन्नाएँ, तअल्लुक़, रिश्ते
जान ले लेते हैं आख़िर ये सहारे सारे
किस किस तरह की दिल में गुज़रती हैं हसरतें
है वस्ल से ज़ियादा मज़ा इंतिज़ार का
कटती है आरज़ू के सहारे पे ज़िंदगी
कैसे कहूँ किसी की तमन्ना न चाहिए
आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या
क्या बताऊँ कि मेरे दिल में है अरमाँ क्या क्या
दिल में वो भीड़ है कि ज़रा भी नहीं जगह
आप आइए मगर कोई अरमाँ निकाल के
अरमान वस्ल का मिरी नज़रों से ताड़ के
पहले ही से वो बैठ गए मुँह बिगाड़ के
बाद मरने के भी छोड़ी न रिफ़ाक़त मेरी
मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी
हसरतों का हो गया है इस क़दर दिल में हुजूम
साँस रस्ता ढूँढती है आने जाने के लिए
ख़्वाहिशों ने डुबो दिया दिल को
वर्ना ये बहर-ए-बे-कराँ होता
यार पहलू में है तन्हाई है कह दो निकले
आज क्यूँ दिल में छुपी बैठी है हसरत मेरी
एक भी ख़्वाहिश के हाथों में न मेहंदी लग सकी
मेरे जज़्बों में न दूल्हा बन सका अब तक कोई
जीने वालों से कहो कोई तमन्ना ढूँडें
हम तो आसूदा-ए-मंज़िल हैं हमारा क्या है
मय-कदे को जा के देख आऊँ ये हसरत दिल में है
ज़ाहिद उस मिट्टी की उल्फ़त मेरी आब-ओ-गिल में है
फ़क़त आँखें चराग़ों की तरह से जल रही हैं
किसी की दस्तरस में है कहाँ कोई सितारा
अजीब वक़्त है अब दोस्तों के चाक़ू को
मिरे क़लम की नहीं उँगलियों की हसरत है
डूबता हूँ तो मुझे हाथ कई मिलते हैं
कितनी हसरत से किनारों की तरफ़ देखता हूँ
कब अलम और हसरतें अपनी कहें ऐ दोस्ताँ
रात को बुलबुल हैं हम और दिन को परवाने हैं हम
चीटियाँ चलने लगी हैं पीठ में
अब तुम्हारा तीर चलना चाहिए
अपने आँगन में परिंदे देख कर
जिस्म की टहनी से उड़ जाते हैं हम
ख़ुदा रक्खे ये पास-ए-वज़्अ' में तुम से भी बढ़ कर है
तुम्हीं आ कर निकालोगे तो अरमाँ दिल से निकलेगा
हुस्न-ए-दिलकश इसे कहते हैं कि हम सारी उम्र
उन को देखा किए दीदार की हसरत न गई
नींद वैसे भी नहीं आती मगर
आँख में अब बस ख़ुमारी चाहिए
महज़ ख़्वाबों ख़यालों में तिरा दीदार हो कब तक
हक़ीक़त में भी तुझ से आश्नाई चाहते हैं हम
क्यूँ न देखूँ चमन को हसरत से
आशियाँ था मिरा भी याँ पर-साल
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ बाग़ जीवन की रंगीन दुनिया का संकेत है, जिसे देखकर वक्त के बदल जाने का एहसास होता है। ‘घोंसला’ घर, सुरक्षा और अपनापन बताता है, जो अब नहीं रहा। इसलिए उसी जगह को देखना कसक और हसरत जगा देता है। भाव यह है कि जो कल अपना था, आज बस याद बन गया।