दीदार पर शेर
इश्क़ बहुत सारी ख़्वाहिशों
का ख़ूबसूरत गुलदस्ता है। दीदार, तमन्ना का ऐसा ही एक हसीन फूल है जिसकी ख़ुश्बू आशिक़ को बेचैन किए रखती है। महबूब को देख लेने भर का असर आशिक़ के दिल पर क्या होता है यह शायर से बेहतर भला कौन जान सकता है। आँखें खिड़की, दरवाज़े और रास्ते से हटने का नाम न लें ऐसी शदीद ख़्वाहिश होती है दीदार की। तो आइये इसी दीदार शायरी से कुछ चुनिंदा अशआर की झलक देखते हैः
देखने के लिए सारा आलम भी कम
चाहने के लिए एक चेहरा बहुत
कुछ नज़र आता नहीं उस के तसव्वुर के सिवा
हसरत-ए-दीदार ने आँखों को अंधा कर दिया
मेरी आँखें और दीदार आप का
या क़यामत आ गई या ख़्वाब है
अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात
जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए
तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं
ज़ाहिर की आँख से न तमाशा करे कोई
हो देखना तो दीदा-ए-दिल वा करे कोई
सिर्फ बाहरी आँख से इस दुनिया का तमाशा मत देखो।
अगर सच में देखना है तो दिल की आँख खोलो।
अल्लामा इक़बाल बाहरी देखने और भीतर की समझ का अंतर दिखाते हैं। बाहरी आँख केवल दृश्य और दिखावा पकड़ती है, जबकि “दिल की आँख” गहरी सच्चाई और अर्थ तक पहुँचाती है। शेर मनुष्य को भीतर जागने और संवेदनशील दृष्टि विकसित करने की सीख देता है। भाव-केन्द्र यह है कि असली दर्शन अंतर्दृष्टि से मिलता है।
कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती
हम को अगर मयस्सर जानाँ की दीद होती
देखा नहीं वो चाँद सा चेहरा कई दिन से
तारीक नज़र आती है दुनिया कई दिन से
तुम अपने चाँद तारे कहकशाँ चाहे जिसे देना
मिरी आँखों पे अपनी दीद की इक शाम लिख देना
दीदार की तलब के तरीक़ों से बे-ख़बर
दीदार की तलब है तो पहले निगाह माँग
सुना है हश्र में हर आँख उसे बे-पर्दा देखेगी
मुझे डर है न तौहीन-ए-जमाल-ए-यार हो जाए
हटाओ आइना उम्मीद-वार हम भी हैं
तुम्हारे देखने वालों में यार हम भी हैं
क्यूँ जल गया न ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
जलता हूँ अपनी ताक़त-ए-दीदार देख कर
मैं प्रियतम के चेहरे की चमक और तेज़ को देखकर उसी वक़्त जलकर राख क्यों नहीं हो गया?
अब मैं अपनी ही देखने की शक्ति और सहनशीलता को देखकर अंदर ही अंदर जल रहा हूँ।
शायर को अफ़सोस है कि महबूब की सुंदरता इतनी प्रचंड थी कि उसे देखते ही मुझे मिट जाना चाहिए था, मगर मैं बच गया। अब मुझे अपनी इस 'ताक़त' पर गुस्सा और जलन हो रही है कि मैंने उस तेज़ को कैसे सहन कर लिया; सच्चे प्रेम में तो मुझे फ़ना हो जाना चाहिए था।
-
टैग्ज़ : सूरत शायरीऔर 1 अन्य
न वो सूरत दिखाते हैं न मिलते हैं गले आ कर
न आँखें शाद होतीं हैं न दिल मसरूर होता है
वो दुश्मनी से देखते हैं देखते तो हैं
मैं शाद हूँ कि हूँ तो किसी की निगाह में
अब और देर न कर हश्र बरपा करने में
मिरी नज़र तिरे दीदार को तरसती है
जो और कुछ हो तिरी दीद के सिवा मंज़ूर
तो मुझ पे ख़्वाहिश-ए-जन्नत हराम हो जाए
तिरा दीदार हो हसरत बहुत है
चलो कि नींद भी आने लगी है
मिरा जी तो आँखों में आया ये सुनते
कि दीदार भी एक दिन आम होगा
यह सुनकर मेरा मन भर आया और आँखें नम हो गईं।
कि एक दिन प्रिय का दर्शन भी सबके लिए सहज और आम हो जाएगा।
यह दोहा-सा भाव बताता है कि लंबे इंतज़ार के बाद आशा की खबर सुनकर मन रो पड़ता है। “मन का आँखों में आना” का अर्थ है भावनाएँ आँसुओं बनकर आँखों तक आ जाना। यहाँ दुर्लभ दर्शन के आम हो जाने की बात, बिछोह के दुख के सामने मिलन की उम्मीद को उजागर करती है।
कासा-ए-चश्म ले के जूँ नर्गिस
हम ने दीदार की गदाई की
नरगिस की तरह हमने अपनी आँखों को कटोरा बनाकर आगे कर दिया।
और प्रिय के दर्शन की भीख माँगी, सिर्फ एक झलक के लिए।
मीर तक़ी मीर ने आँखों को भिक्षा-पात्र की तरह दिखाया है, और नरगिस का कटोरे जैसा रूप इस बिंब को मजबूत करता है। यहाँ दर्शन कोई अधिकार नहीं, बल्कि दान की तरह माँगा गया है। भाव में विनम्रता, बेबसी और तीव्र चाह एक साथ बहती है।
हासिल उस मह-लक़ा की दीद नहीं
ईद है और हम को ईद नहीं
इस क़मर को कभी तो देखेंगे
तीस दिन होते हैं महीने के
उठ ऐ नक़ाब-ए-यार कि बैठे हैं देर से
कितने ग़रीब दीदा-ए-पुर-नम लिए हुए
आँख उठा कर उसे देखूँ हूँ तो नज़रों में मुझे
यूँ जताता है कि क्या तुझ को नहीं डर मेरा
आफ़रीं तुझ को हसरत-ए-दीदार
चश्म-ए-तर से ज़बाँ का काम लिया
'दर्द' के मिलने से ऐ यार बुरा क्यूँ माना
उस को कुछ और सिवा दीद के मंज़ूर न था
जैसे जैसे दर-ए-दिलदार क़रीब आता है
दिल ये कहता है कि पहुँचूँ मैं नज़र से पहले
आईना कभी क़ाबिल-ए-दीदार न होवे
गर ख़ाक के साथ उस को सरोकार न होवे
मैं कामयाब-ए-दीद भी महरूम-ए-दीद भी
जल्वों के इज़दिहाम ने हैराँ बना दिया
इलाही क्या खुले दीदार की राह
उधर दरवाज़े बंद आँखें इधर बंद
तिरी पहली दीद के साथ ही वो फ़ुसूँ भी था
तुझे देख कर तुझे देखना मुझे आ गया
टूटें वो सर जिस में तेरी ज़ुल्फ़ का सौदा नहीं
फूटें वो आँखें कि जिन को दीद का लपका नहीं
रुख़्सार उस के हाए रे जब देखते हैं हम
आता है जी में आँखों को उन में गड़ोइए
जब हम उसके गाल देखते हैं, तो मन बेबस होकर ‘हाय रे’ कह उठता है।
मन करता है कि अपनी आँखें उसी में गड़ा दें और हटाएँ ही नहीं।
मीर तक़ी मीर ने प्रिय के गालों की सुंदरता को इतना असरदार दिखाया है कि देखने वाला हैरानी और बेबसी से भर जाता है। “आँखें गड़ाना” यहाँ लगातार, तल्लीन होकर देखते रहने का रूपक है। यह चाहत इतनी तीव्र है कि निगाह जैसे वहीं ठहर जाना चाहती है। भाव का केंद्र आकर्षण, तड़प और डूब जाने की इच्छा है।
किया कलीम को अरमान-ए-दीद ने रुस्वा
दिखा के जल्वा-ए-परवरदिगार थोड़ा सा
बहुत मिलने से ऐब दिखते हैं कम-कम
बहुत देखते हैं जो कम देखते हैं
मुझे उन से है जो मोहब्बत ऐ 'बासिर'
उन्हें देख पाने को जी चाहता है
दिल से निकल कर देखो तो
क्या आलम है बाहर का