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महफ़िल पर शेर

ये शायरी महफ़िल की रंगीनियों,

चहल पहल और साथ ही महफ़िल के अनदेखे दुखों का बयान है। इस शेरी इंतिख़ाब को पढ़ कर आप एक लम्हे के लिए ख़ुद को महफ़िल की उन्हें सूरतों में घिरा हुआ पाएँगे।

शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को

ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि मिलन की रात में दीपक बुझा दो, क्योंकि उस घड़ी में उजाले से ज़्यादा निकटता और एकांत चाहिए। “जलने वाले” उन प्रेमियों का रूपक हैं जो विरह की आग में तड़पते हैं। आनंद की सभा में उनका दर्द बेमेल लगता है, इसलिए शेर में व्यंग्य के साथ अलग-थलग पड़ने का भाव भी है।

दाग़ देहलवी

एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक

जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा

निदा फ़ाज़ली

है आदमी बजाए ख़ुद इक महशर-ए-ख़याल

हम अंजुमन समझते हैं ख़ल्वत ही क्यूँ हो

Interpretation: Rekhta AI

ग़ालिब का कहना है कि मनुष्य का मन शांत नहीं है, बल्कि उसमें विचारों की भीड़ कयामत की तरह मची रहती है। इसलिए, जब हम एकांत (ख़ल्वत) में होते हैं, तो भी हमें लगता है कि हम किसी सभा (अंजुमन) में बैठे हैं, क्योंकि हमारे अंदर के विचारों का शोर हमें कभी अकेला महसूस नहीं होने देता।

मिर्ज़ा ग़ालिब

सुना है तेरी महफ़िल में सुकून-ए-दिल भी मिलता है

मगर हम जब तिरी महफ़िल से आए बे-क़रार आए

अज्ञात

फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल पूछिए 'मजरूह'

शराब एक है बदले हुए हैं पैमाने

मजरूह सुल्तानपुरी

मुझ तक उस महफ़िल में फिर जाम-ए-शराब आने को है

उम्र-ए-रफ़्ता पलटी आती है शबाब आने को है

फ़ानी बदायुनी

तुम्हारी बज़्म से निकले तो हम ने ये सोचा

ज़मीं से चाँद तलक कितना फ़ासला होगा

कफ़ील आज़र अमरोहवी

कोई नालाँ कोई गिर्यां कोई बिस्मिल हो गया

उस के उठते ही दिगर-गूँ रंग-ए-महफ़िल हो गया

अबुल कलाम आज़ाद

जल्वा-गर बज़्म-ए-हसीनाँ में हैं वो इस शान से

चाँद जैसे 'क़मर' तारों भरी महफ़िल में है

क़मर जलालवी

जाने क्या महफ़िल-ए-परवाना में देखा उस ने

फिर ज़बाँ खुल सकी शम्अ जो ख़ामोश हुई

अलीम मसरूर

उठ के उस बज़्म से जाना कुछ आसान था

एक दीवार से निकला हूँ जो दर से निकला

अलीम मसरूर

याद-ए-अय्याम कि इक महफ़िल-ए-जाँ थी कि जहाँ

हाथ खींचे भी गए और मिलाए भी गए

जौन एलिया

बहुत रोएगी दुनिया उस बशर की बद-नसीबी पर

जो दाग़-ए-आरज़ू ले कर तिरी महफ़िल से निकलेगा

नसीम नूर महली

कुछ नज़र रहे हैं महफ़िल में

देख लो माहताब सच-मुच के

साजिद प्रेमी

वही अकेला है अंजुमन में

वही है तन्हा मकान में भी

लुत्फ़ुर्रहमान

ग़ज़ल लुत्फ़-ओ-असर पा कर ब-तर्ज़-ए-'मीर' रक़्साँ है

चलो बरपा करें महफ़िल चलो देखें शरर लुटता

ख़ुमार कुरैशी
बोलिए