बोसे पर 20 बेहतरीन शेर


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बदन का सारा लहू खिंच के गया रुख़ पर


वो एक बोसा हमें दे के सुर्ख़-रू है बहुत

बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के


आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को

बोसा देते नहीं और दिल पे है हर लहज़ा निगाह


जी में कहते हैं कि मुफ़्त आए तो माल अच्छा है

बोसा होंटों का मिल गया किस को


दिल में कुछ आज दर्द मीठा है

बोसा जो रुख़ का देते नहीं लब का दीजिए


ये है मसल कि फूल नहीं पंखुड़ी सही

बोसा जो तलब मैं ने किया हँस के वो बोले


ये हुस्न की दौलत है लुटाई नहीं जाती

बोसा तो उस लब-ए-शीरीं से कहाँ मिलता है


गालियाँ भी मिलीं हम को तो मिलीं थोड़ी सी

बोसा-ए-रुख़्सार पर तकरार रहने दीजिए


लीजिए या दीजिए इंकार रहने दीजिए

बोसे अपने आरिज़-ए-गुलफ़ाम के


ला मुझे दे दे तिरे किस काम के

बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई


मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा

दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हम को


दे जो बोसा तो मुँह से कहीं जवाब तो दे

एक बोसा होंट पर फैला तबस्सुम बन गया


जो हरारत थी मिरी उस के बदन में गई

एक बोसे के भी नसीब हों


होंठ इतने भी अब ग़रीब हों

एक बोसे के तलबगार हैं हम


और माँगें तो गुनहगार हैं हम

हम को गाली के लिए भी लब हिला सकते नहीं


ग़ैर को बोसा दिया तो मुँह से दिखला कर दिया

जिस लब के ग़ैर बोसे लें उस लब से 'शेफ़्ता'


कम्बख़्त गालियाँ भी नहीं मेरे वास्ते

क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए


हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का

लजा कर शर्म खा कर मुस्कुरा कर


दिया बोसा मगर मुँह को बना कर

ले लो बोसा अपना वापस किस लिए तकरार की


क्या कोई जागीर हम ने छीन ली सरकार की

मैं रहा हूँ अभी चूम कर बदन उस का


सुना था आग पे बोसा रक़म नहीं होता


बोसा यानी चुंबन को उर्दू शाइरी की हर परंपरा में ख़ास अहमियत हासिल है। इश्क़-ओ-आशिक़ी के मामलात में ही इस के कई रंग नज़र आते हैं। उर्दू शाइरी में बोसे की तलब की कैफ़ियतों से ले कर माशूक़ के इनकार की सूरतों तक का बयान काफ़ी दिलचस्प है। यहाँ शोख़ी है, हास्य है, हसरत है और ग़ुस्से की मिली-जुली कैफ़ियतें हैं। प्रसुतुत शाइरी से आप को उर्दू शाइरी के कुछ ख़ास रंगों का अंदाज़ा होगा।

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