दीदार पर 20 बेहतरीन शेर

इश्क़ बहुत सारी ख़्वाहिशों का ख़ूबसूरत गुलदस्ता है। दीदार, तमन्ना का ऐसा ही एक हसीन फूल है जिसकी ख़ुश्बू आशिक़ को बेचैन किए रखती है। महबूब को देख लेने भर का असर आशिक़ के दिल पर क्या होता है यह शायर से बेहतर भला कौन जान सकता है। आँखें खिड़की, दरवाज़े और रास्ते से हटने का नाम न लें ऐसी शदीद ख़्वाहिश होती है दीदार की। तो आइये इसी दीदार शायरी से कुछ चुनिंदा अशआर की झलक देखते हैः

आशिक़ को देखते हैं दुपट्टे को तान कर

देते हैं हम को शर्बत-ए-दीदार छान कर

मीर अनीस

अब और देर कर हश्र बरपा करने में

मिरी नज़र तिरे दीदार को तरसती है

ग़ुलाम मुर्तज़ा राही

अब वही करने लगे दीदार से आगे की बात

जो कभी कहते थे बस दीदार होना चाहिए

ज़फ़र इक़बाल

भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया

ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं

लाला माधव राम जौहर

देखा नहीं वो चाँद सा चेहरा कई दिन से

तारीक नज़र आती है दुनिया कई दिन से

जुनैद हज़ीं लारी

देखने के लिए सारा आलम भी कम

चाहने के लिए एक चेहरा बहुत

असअ'द बदायुनी

दीदार की तलब के तरीक़ों से बे-ख़बर

दीदार की तलब है तो पहले निगाह माँग

ignorant of mores when seeking visions bright

if you want the vision, you first need the sight

ignorant of mores when seeking visions bright

if you want the vision, you first need the sight

आज़ाद अंसारी

फ़रेब-ए-जल्वा कहाँ तक ब-रू-ए-कार रहे

नक़ाब उठाओ कि कुछ दिन ज़रा बहार रहे

अख़्तर अली अख़्तर

जनाब के रुख़-ए-रौशन की दीद हो जाती

तो हम सियाह-नसीबों की ईद हो जाती

अनवर शऊर

कासा-ए-चश्म ले के जूँ नर्गिस

हम ने दीदार की गदाई की

मीर तक़ी मीर

कैसी अजीब शर्त है दीदार के लिए

आँखें जो बंद हों तो वो जल्वा दिखाई दे

कृष्ण बिहारी नूर

मेरी आँखें और दीदार आप का

या क़यामत गई या ख़्वाब है

आसी ग़ाज़ीपुरी

मिरा जी तो आँखों में आया ये सुनते

कि दीदार भी एक दिन आम होगा

मीर तक़ी मीर

मुझे को महरूमी-ए-नज़ारा क़ुबूल

आप जल्वे अपने आम करें

ख़ुमार बाराबंकवी

फिर किसी के सामने चश्म-ए-तमन्ना झुक गई

शौक़ की शोख़ी में रंग-ए-एहतराम ही गया

असरार-उल-हक़ मजाज़

सुना है हश्र में हर आँख उसे बे-पर्दा देखेगी

मुझे डर है तौहीन-ए-जमाल-ए-यार हो जाए

जिगर मुरादाबादी

तिरा दीदार हो आँखें किसी भी सम्त देखें

सो हर चेहरे में अब तेरी शबाहत चाहिए है

फ़रहत नदीम हुमायूँ

तिरा दीदार हो हसरत बहुत है

चलो कि नींद भी आने लगी है

साजिद प्रेमी

तुम अपने चाँद तारे कहकशाँ चाहे जिसे देना

मिरी आँखों पे अपनी दीद की इक शाम लिख देना

ज़ुबैर रिज़वी

ज़ाहिर की आँख से तमाशा करे कोई

हो देखना तो दीदा-ए-दिल वा करे कोई

अल्लामा इक़बाल

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