स्वागत शायरी

दुनिया हो या ज़िन्दगी दोनों आने वालों से आबाद है। हम उनका इस्तक़बाल, उनका स्वागत करने के लिए लफ़्ज़ ढूंढते रहते हैं लेकिन शायरों ने ऐसे लम्हों और ऐसे लोगों का इस्तक़बाल पूरी गर्मजोशी और ख़ूबसूरती से किया है। इस्तक़बाल शायरी में ऐसी कई मिसालें मौजूद हैं जो आपको मेहमान लम्हों को लफ़्ज़ों में क़ैद करने का सलीक़ा सीखने में मददगार साबित हो सकती हैं।

आमद पे तेरी इत्र चराग़ सुबू हों

इतना भी बूद-ओ-बाश को सादा नहीं किया

परवीन शाकिर

आप आए हैं सो अब घर में उजाला है बहुत

कहिए जलती रहे या शम्अ बुझा दी जाए

सबा अकबराबादी

आप आए तो बहारों ने लुटाई ख़ुश्बू

फूल तो फूल थे काँटों से भी आई ख़ुश्बू

अज्ञात

आया ये कौन साया-ए-ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में

पेशानी-ए-सहर का उजाला लिए हुए

जमील मज़हरी

बजाए सीने के आँखों में दिल धड़कता है

ये इंतिज़ार के लम्हे अजीब होते हैं

अज्ञात

भरे हैं तुझ में वो लाखों हुनर मजमा-ए-ख़ूबी

मुलाक़ाती तिरा गोया भरी महफ़िल से मिलता है

दाग़ देहलवी

बुझते हुए चराग़ फ़रोज़ाँ करेंगे हम

तुम आओगे तो जश्न-ए-चराग़ाँ करेंगे हम

वासिफ़ देहलवी

चाँद भी हैरान दरिया भी परेशानी में है

अक्स किस का है कि इतनी रौशनी पानी में है

फ़रहत एहसास

देर लगी आने में तुम को शुक्र है फिर भी आए तो

आस ने दिल का साथ छोड़ा वैसे हम घबराए तो

Am grateful you came finally, though you were delayed

hope had not forsaken me, though must say was afraid

Am grateful you came finally, though you were delayed

hope had not forsaken me, though must say was afraid

अंदलीब शादानी

फ़रेब-ए-जल्वा कहाँ तक ब-रू-ए-कार रहे

नक़ाब उठाओ कि कुछ दिन ज़रा बहार रहे

अख़्तर अली अख़्तर

फ़ज़ा-ए-दिल पे कहीं छा जाए यास का रंग

कहाँ हो तुम कि बदलने लगा है घास का रंग

अहमद मुश्ताक़

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हमारी ज़िंदगी-ओ-मौत की हो तुम रौनक़

चराग़-ए-बज़्म भी हो और चराग़-ए-फ़न भी हो

रशीद लखनवी

हर गली अच्छी लगी हर एक घर अच्छा लगा

वो जो आया शहर में तो शहर भर अच्छा लगा

अज्ञात

हर तरह की बे-सर-ओ-सामानियों के बावजूद

आज वो आया तो मुझ को अपना घर अच्छा लगा

अहमद फ़राज़

हम ने ब-सद ख़ुलूस पुकारा है आप को

अब देखना है कितनी कशिश है ख़ुलूस में

अज्ञात

इतने दिन के बाद तू आया है आज

सोचता हूँ किस तरह तुझ से मिलूँ

अतहर नफ़ीस

जिस बज़्म में साग़र हो सहबा हो ख़ुम हो

रिंदों को तसल्ली है कि उस बज़्म में तुम हो

अज्ञात

कौन हो सकता है आने वाला

एक आवाज़ सी आई थी अभी

कर्रार नूरी

ख़ुश-आमदीद वो आया हमारी चौखट पर

बहार जिस के क़दम का तवाफ़ करती है

अज्ञात

महफ़िल में चार चाँद लगाने के बावजूद

जब तक आप आए उजाला हो सका

अज्ञात

मिल कर तपाक से हमें कीजिए उदास

ख़ातिर कीजिए कभी हम भी यहाँ के थे

जौन एलिया

मुद्दतों बा'द कभी नज़र आने वाले

ईद का चाँद देखा तिरी सूरत देखी

मंज़र लखनवी

मुंतज़िर चश्म भी है क़ल्ब भी है जान भी है

आप के आने की हसरत भी है अरमान भी है

अज्ञात

निगाह-ए-शौक़ की हैरानियों को क्या कहिए

उन्हें बुला भी लिया ए'तिबार भी किया

अज्ञात

फूल गुल शम्स क़मर सारे ही थे

पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत

मीर तक़ी मीर

रक़्स-ए-मय तेज़ करो साज़ की लय तेज़ करो

सू-ए-मय-ख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

रौनक़-ए-बज़्म नहीं था कोई तुझ से पहले

रौनक़-ए-बज़्म तिरे बा'द नहीं है कोई

सरफ़राज़ ख़ालिद

साक़ी शराब जाम-ओ-सुबू मुतरिब बहार

सब गए बस आप के आने की देर है

अज्ञात

सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी

तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी

जाँ निसार अख़्तर

सेहन-ए-चमन को अपनी बहारों पे नाज़ था

वो गए तो सारी बहारों पे छा गए

जिगर मुरादाबादी

शजर ने लहलहा कर और हवा ने चूम कर मुझ को

तिरी आमद के अफ़्साने सुनाए झूम कर मुझ को

शाहिद मीर

शुक्रिया तेरा तिरे आने से रौनक़ तो बढ़ी

वर्ना ये महफ़िल-ए-जज़्बात अधूरी रहती

अज्ञात

सुनता हूँ मैं कि आज वो तशरीफ़ लाएँगे

अल्लाह सच करे कहीं झूटी ख़बर हो

लाला माधव राम जौहर

तुम गए हो ख़ुदा का सुबूत है ये भी

क़सम ख़ुदा की अभी मैं ने तुम को सोचा था

क़ैसर-उल जाफ़री

तुम गए हो तो अब आईना भी देखेंगे

अभी अभी तो निगाहों में रौशनी हुई है

इरफ़ान सत्तार

तुम गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हों

ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है

how often does the moon condescend to come to earth

let us talk of love and joy now that you are here

how often does the moon condescend to come to earth

let us talk of love and joy now that you are here

वसीम बरेलवी

तुम गए तो चमकने लगी हैं दीवारें

अभी अभी तो यहाँ पर बड़ा अँधेरा था

अज्ञात

तुम जो आए हो तो शक्ल-ए-दर-ओ-दीवार है और

कितनी रंगीन मिरी शाम हुई जाती है

निहाल सेवहारवी

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है

तुम्हारे बा'द ये मौसम बहुत सताएगा

बशीर बद्र

उस ने वा'दा किया है आने का

रंग देखो ग़रीब ख़ाने का

जोश मलीहाबादी

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है

कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये इंतिज़ार की घड़ियाँ ये शब का सन्नाटा

इस एक शब में भरे हैं हज़ार साल के दिन

क़मर सिद्दीक़ी

ये किस ज़ोहरा-जबीं की अंजुमन में आमद आमद है

बिछाया है क़मर ने चाँदनी का फ़र्श महफ़िल में

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

ये ज़ुल्फ़-बर-दोश कौन आया ये किस की आहट से गुल खिले हैं

महक रही है फ़ज़ा-ए-हस्ती तमाम आलम बहार सा है

अज्ञात

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