धोखा पर 20 बेहतरीन शेर

माशूक़ की एक सिफ़त उस का

फ़रेबी होना भी है। वो हर मआमले में धोखे-बाज़ साबित होता है। वस्ल का वादा करता है लेकिन कभी वफ़ा नहीं करता है। यहाँ माशूक़ के फ़रेब की मुख़्तलिफ़ शक्लों को मौज़ू बनाने वाले कुछ शेरों का इन्तिख़ाब हम पेश कर रहे हैं इन्हें पढ़िये और माशूक़ की उन चालाकियों से लुत्फ़ उठाइये।

टॉप 20 सीरीज़

वो ज़हर देता तो सब की निगह में जाता

सो ये किया कि मुझे वक़्त पे दवाएँ दीं

अख़्तर नज़्मी

दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं

दोस्तों की मेहरबानी चाहिए

my heartbreak's not complete, it pends

I need some favours from my friends

my heartbreak's not complete, it pends

I need some favours from my friends

अब्दुल हमीद अदम

तू भी सादा है कभी चाल बदलता ही नहीं

हम भी सादा हैं इसी चाल में जाते हैं

अफ़ज़ल ख़ान

कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं

ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका

फ़िराक़ गोरखपुरी

जो उन मासूम आँखों ने दिए थे

वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ

फ़िराक़ गोरखपुरी

धोका था निगाहों का मगर ख़ूब था धोका

मुझ को तिरी नज़रों में मोहब्बत नज़र आई

शौकत थानवी

आदमी जान के खाता है मोहब्बत में फ़रेब

ख़ुद-फ़रेबी ही मोहब्बत का सिला हो जैसे

इक़बाल अज़ीम

ज़ख़्म लगा कर उस का भी कुछ हाथ खुला

मैं भी धोका खा कर कुछ चालाक हुआ

ज़ेब ग़ौरी

यार मैं इतना भूका हूँ

धोका भी खा लेता हूँ

अक्स समस्तीपुरी

मुद्दत हुई इक शख़्स ने दिल तोड़ दिया था

इस वास्ते अपनों से मोहब्बत नहीं करते

साक़ी फ़ारुक़ी

अहबाब को दे रहा हूँ धोका

चेहरे पे ख़ुशी सजा रहा हूँ

क़तील शिफ़ाई

मुझ को फ़रेब देने वाले

मैं तुझ पे यक़ीन कर चुका हूँ

अतहर नफ़ीस

हर-चंद ए'तिबार में धोके भी हैं मगर

ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया जाए

जाँ निसार अख़्तर

इक बरस भी अभी नहीं गुज़रा

कितनी जल्दी बदल गए चेहरे

कैफ़ अहमद सिद्दीकी

किस ने वफ़ा के नाम पे धोका दिया मुझे

किस से कहूँ कि मेरा गुनहगार कौन है

नजीब अहमद

ऐसे मिला है हम से शनासा कभी था

वो यूँ बदल ही जाएगा सोचा कभी था

ख़ुमार फ़ारूक़ी

उस को भी मेरी तरह अपनी वफ़ा पर था यक़ीं

वो भी शायद इसी धोके में मिला था मुझ को

भारत भूषण पन्त

जो बात दिल में थी उस से नहीं कही हम ने

वफ़ा के नाम से वो भी फ़रेब खा जाता

अज़ीज़ हामिद मदनी

ढूँढती है इज़्तिराब-ए-शौक़ की दुनिया मुझे

आप ने महफ़िल से उठवा कर कहाँ रक्खा मुझे

नातिक़ गुलावठी