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अल्लामा इक़बाल

1877 - 1938 | लाहौर, पाकिस्तान

महान उर्दू शायर, पाकिस्तान के राष्ट्र-कवि जिन्होंने 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' और 'लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी' जैसे गीतों की रचना की

महान उर्दू शायर, पाकिस्तान के राष्ट्र-कवि जिन्होंने 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' और 'लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी' जैसे गीतों की रचना की

अल्लामा इक़बाल के शेर

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माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

मैं मानता हूँ कि मैं तुम्हें देखने के योग्य नहीं हूँ।

लेकिन मेरा लगाव देखो और मेरा इंतज़ार देखो।

वक्ता अपनी अयोग्यता स्वीकार करके विनम्रता दिखाता है, पर अपनी सच्ची चाह और लगातार प्रतीक्षा को अपने पक्ष में रखता है। वह कहता है कि मिलने की पात्रता सही, मेरी लगन तो देखी जाए। यहाँ “दीद” केवल देखना नहीं, बल्कि निकटता और कृपा का संकेत है। भाव का केंद्र तड़प, भक्ति-सा समर्पण और आशा है।

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

अपने भीतर के स्वत्व को इतना ऊँचा बनाओ कि भाग्य से पहले भी तुम कमजोर पड़ो।

ऐसी ऊँचाई हो कि ईश्वर स्वयं पूछें: बताओ, तुम्हारी इच्छा क्या है?

यह शेर आत्म-शक्ति और आत्म-निर्माण का संदेश देता है। “स्वत्व/ख़ुदी” यहाँ जागरूक, अनुशासित और साहसी व्यक्तित्व का रूपक है जो हालात के आगे हार नहीं मानता। ईश्वर का बंदे से पूछना यह दिखाता है कि सही दिशा में बढ़ा हुआ इंसान केवल भाग्य पर नहीं टिकता, वह चुनता और गढ़ता है। भावनात्मक रूप से यह विश्वास, प्रयास और जिम्मेदारी की पुकार है।

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

नरगिस का फूल हजारों साल अपनी रोशनी होने, यानी देख पाने पर रोता रहता है।

बाग़ यानी दुनिया में सचमुच दूरदर्शी इंसान बहुत मुश्किल से पैदा होता है।

यहाँ नरगिस को आँख का रूपक माना गया है और “बे-नूरी” से आशय भीतर की रोशनी/समझ की कमी है। “चमन” समाज या दुनिया है, जहाँ सही दृष्टि रखने वाला व्यक्ति बहुत कम मिलता है। भाव यह है कि अज्ञान और अंधापन लंबे समय तक रहता है, और सच्ची दूरदृष्टि का जन्म दुर्लभ होता है।

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा

तिरे सामने आसमाँ और भी हैं

तू बाज़ जैसा पक्षी है; तेरा काम ऊँची उड़ान भरना है।

तेरे सामने जो आकाश है, उससे आगे भी और आकाश हैं।

बाज़ यहाँ ऊँचे हौसले और स्वतंत्र स्वभाव का प्रतीक है, जो रुककर नहीं जीता बल्कि ऊपर उठता रहता है। कवि कहता है कि संतोष करके ठहरना नहीं, आगे बढ़ते रहना चाहिए। “और भी आकाश” नए अवसरों और बड़ी मंज़िलों का रूपक है। भाव-केन्द्र में उम्मीद और निरंतर प्रयास की पुकार है।

नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर

तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में

तेरा बसेरा बादशाहों के महल के गुंबद पर नहीं होना चाहिए।

तू बाज़ है, इसलिए पहाड़ों की कठोर चट्टानों में रह।

यहाँ “शाहीं/बाज़” ऊँची सोच, स्वाभिमान और स्वतंत्र जीवन का प्रतीक है। महल का गुंबद आराम, पराधीनता और सत्ता के सहारे जीने की ओर इशारा करता है, जबकि पहाड़ों की चट्टानें संघर्ष, ऊँचाई और आज़ादी दिखाती हैं। शेर कहता है कि आसान सुविधाओं के लिए अपना आत्मसम्मान छोड़ो। भाव यह है कि कठिन रास्ता चुनकर भी गरिमा के साथ जियो।

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

सितारों के पार भी और दुनिया और मंज़िलें हैं।

प्रेम की परीक्षाएँ अभी खत्म नहीं हुईं; आगे भी और इम्तिहान हैं।

यह शे’र बताता है कि जो सीमा हमें आख़िरी लगती है, उसके आगे भी नई मंज़िलें होती हैं। “सितारे” यहाँ ऊँचाई और पहुँच की सीमा का संकेत हैं, और उनसे आगे बढ़ने की प्रेरणा है। दूसरी पंक्ति में प्रेम को निरंतर परीक्षा माना गया है, जिसमें हर कदम पर नया साहस और धैर्य चाहिए। भाव है—आशा के साथ आगे बढ़ते रहो, मंज़िल अभी बाकी है।

मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने

मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन सका

ईमान की गर्मी वाले लोगों ने एक ही रात में मस्जिद बना दी।

पर मेरा मन पुराना पापी है, सालों में भी नमाज़ पढ़ने वाला नहीं बन पाया।

इस दोहे में बाहर के काम और भीतर के बदलाव का फर्क दिखाया गया है। मस्जिद बनना धर्म का दिखाई देने वाला काम है, लेकिन वक्ता मानता है कि उसका मन नहीं सुधरा। भाव यह है कि इमारत खड़ी करना आसान है, अपने अंदर की बुराइयों को बदलना कठिन। इसलिए यह आत्म-आलोचना और अंदरूनी संघर्ष का शेर है।

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी

तू अगर मेरा नहीं बनता बन अपना तो बन

अपने भीतर गहराई में उतरकर जीवन का सच्चा संकेत ढूँढो।

अगर तुम मेरे नहीं बनते तो मत बनो, पर कम से कम अपने तो बनो।

यह शेर कहता है कि जीवन का अर्थ बाहर नहीं, अपने भीतर झाँकने से मिलता है। “डूबना” अपने मन की गहराई में उतरने का रूपक है, जहाँ असली पहचान और दिशा मिलती है। दूसरे मिसरे में संदेश है कि किसी के पीछे चलने से बेहतर है खुद का होना—स्वतंत्र और जागरूक। भाव आत्मजागरण और स्वत्व का है।

दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब

क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो

हे प्रभु, मैं दुनिया की महफ़िलों से ऊब गया हूँ।

जब दिल की लौ ही बुझ गई हो, तो सभा का आनंद कैसा?

कवि दुनिया की रंगीन महफ़िलों से निराश होकर ईश्वर से बात करता है। “महफ़िल/सभा” बाहरी चमक-दमक का रूपक है और “दिल का बुझना” भीतर के उत्साह, लगन और अर्थ के खत्म हो जाने का संकेत है। जब अंदर ही उजाला रहे, तो बाहर का शोर भी खाली लगता है। भाव यह है कि सच्ची तृप्ति के लिए भीतर की आग और उद्देश्य का जागना ज़रूरी है।

नहीं है ना-उमीद 'इक़बाल' अपनी किश्त-ए-वीराँ से

ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी

इक़बाल अपनी उजड़ी हुई खेती से निराश नहीं हैं।

साक़ी, बस थोड़ी सी नमी मिल जाए तो यह मिट्टी बहुत उपजाऊ हो जाती है।

यह शेर कहता है कि बंजरपन अंतिम सच नहीं, बस हालात का असर है। “उजड़ी खेती” ठहरे हुए जीवन/समाज का संकेत है और “नमी” सही सहारा, मेहनत, मार्गदर्शन या नई प्रेरणा का रूपक। साक़ी से संबोधन उसी जीवन देने वाली शक्ति को बुलाने जैसा है। भाव यह है कि भीतर क्षमता है, थोड़ा संबल मिले तो नई शुरुआत संभव है।

ताइर-ए-लाहूती उस रिज़्क़ से मौत अच्छी

जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही

हे ऊँचे लोक के पक्षी, ऐसे भोजन से तो मौत बेहतर है।

वह रोज़ी बुरी है जिससे तुम्हारी उड़ान कमजोर और छोटी हो जाए।

यहाँ “लाहूती पक्षी” ऊँची आत्मा और ऊँचे लक्ष्य का प्रतीक है। कवि कहता है कि जो रोज़ी इंसान की हिम्मत, सोच की उड़ान और आज़ादी घटा दे, वह जीवन से भी खराब है। भाव यह है कि कठिनाई चलेगी, पर ऐसी सुविधा नहीं जो आत्मसम्मान और ऊँची उड़ान छीन ले।

अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी

ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में नूरी है नारी है

इंसान के कर्म ही उसकी ज़िंदगी को जन्नत या जहन्नम बना देते हैं।

यह मिट्टी का इंसान स्वभाव से तो पूरी तरह उजला है, पूरी तरह बुरा।

अल्लामा इक़बाल कहते हैं कि जन्नत और जहन्नम जीवन में हमारे कर्मों के परिणाम की तरह बनते हैं। इंसान ‘ख़ाकी’ है, यानी धरती से बना हुआ—उसकी फितरत पहले से पूरी तरह रोशनी जैसी पवित्र है, आग जैसी विनाशकारी। इसलिए असली बात यह है कि आदमी अपने चुनाव और कर्म से अपना रास्ता बनाता है।

समझोगे तो मिट जाओगे हिन्दोस्ताँ वालो

तुम्हारी दास्ताँ तक भी होगी दास्तानों में

हिन्दुस्तान वालों, अगर तुम बात को नहीं समझोगे तो तुम मिट जाओगे।

तुम्हारी कहानी इतनी भी नहीं बचेगी कि दुनिया की कहानियों में उसका ज़िक्र हो।

अल्लामा इक़बाल इस शेर में कड़ी चेतावनी देते हैं कि जब कोई समाज अपनी हालत और अपने कर्तव्य को नहीं समझता, तो उसका पतन हो जाता है। “मिट जाना” का अर्थ केवल नाश नहीं, बल्कि पहचान और असर का खत्म हो जाना भी है। दूसरी पंक्ति बताती है कि तब इतिहास और यादों में भी जगह नहीं मिलती। भावनात्मक केंद्र है—जागने और आत्मबोध की तीखी पुकार।

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ

मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ

मैं तुम्हारे प्रेम की आख़िरी सीमा तक पहुँचना चाहता हूँ।

मेरा भोलेपन तो देखो, मैं क्या माँग रहा हूँ।

यहाँ बोलने वाला प्रेम का थोड़ा-सा नहीं, उसका चरम चाहता है। दूसरी पंक्ति में वह अपनी ही चाह की बड़ी माँग को ‘भोलेपन’ कहकर मान लेता है। “अंत” या “सीमा” पूर्णता और पूरी तरह समर्पित होने का संकेत है, और “भोलेपन” में हल्की-सी आत्म-विडंबना भी है। भाव-केन्द्र ललक, भक्ति और विनम्रता है।

वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-काएनात में रंग

इसी के साज़ से है ज़िंदगी का सोज़-ए-दरूँ

स्त्री के अस्तित्व से सृष्टि की तस्वीर में रंग और सुंदरता जाती है।

उसी के सुरों से जीवन के भीतर की गर्मी और तीव्र भाव पैदा होते हैं।

अल्लामा इक़बाल इस शेर में नारी को सृष्टि की शोभा और जीवन की अंदरूनी ऊर्जा का स्रोत बताते हैं। “सृष्टि की तस्वीर” में “रंग” का अर्थ है कि दुनिया में निखार और आकर्षण उसके होने से आता है। “साज़” को उन्होंने रूपक की तरह लिया है, यानी स्त्री का कोमल, रचनात्मक असर जो संगीत की तरह काम करता है। उसी से “अंतर्मन की ज्वाला” पैदा होती है, जो जीवन को गहराई और सजीवता देती है।

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है

पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है

जो बात दिल से निकलती है, वह लोगों पर असर करती है।

भले उसके पास पंख हों, फिर भी उसमें ऊँचा उड़ने की ताकत होती है।

अल्लामा इक़बाल बताते हैं कि सच्चे मन से कही गई बात अपने आप प्रभाव पैदा करती है। “बिना पंख की उड़ान” एक रूपक है: बाहरी साधन, पद या दिखावा भी हो, तब भी सच्चाई ऊँचाई तक पहुँच जाती है। भाव यह है कि अंदर की सच्ची शक्ति शब्दों को दूर तक ले जाती है।

नशा पिला के गिराना तो सब को आता है

मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी

नशा पिलाकर किसी को गिरा देना तो हर कोई कर लेता है।

असली मज़ा तब है जब साक़ी गिरते हुए को थाम ले।

यह शेर आसान नुकसान पहुँचाने और मुश्किल मदद करने का फर्क दिखाता है। ‘नशा’ यहाँ किसी भी ऐसे लालच या असर का रूपक है जो इंसान को कमज़ोर कर दे, और ‘साक़ी’ उस व्यक्ति का प्रतीक है जिसके हाथ में देना या रोकना है। कवि कहता है गिराना तो आम है, असली महानता गिरते को सहारा देकर बचाने में है।

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा

धर्म हमें यह नहीं सिखाता कि हम एक-दूसरे से दुश्मनी रखें।

हम सब भारतीय हैं, और हमारा वतन हिंदुस्तान है।

अल्लामा इक़बाल इस शेर में कहते हैं कि धर्म का संदेश आपसी नफरत नहीं है। वे याद दिलाते हैं कि हमारी सबसे बड़ी पहचान साझा देश है, इसलिए मिलकर सम्मान से रहना चाहिए। भाव-केन्द्र एकता, भाईचारे और सहिष्णुता की पुकार है।

फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का

हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है

दिल का फैसला बस नज़र देखकर ही हो जाता है।

अगर नज़र में चंचलता हो, तो दिल जीतने वाला आकर्षण क्या रह जाता है?

इस शेर में कहा गया है कि प्रेम का असली निर्णय शब्दों से नहीं, नज़र के संकेत से होता है। नज़र की “शोखी” यानी चंचल, हल्की-सी नटखट चमक दिल में खिंचाव और चाह पैदा करती है। यही आकर्षण को जीवंत बनाती है; इसके बिना सुंदरता भी फीकी और असरहीन लगती है।

यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो

तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो

तुम वंश या नाम के हिसाब से सय्यद भी हो, मिर्ज़ा भी हो, अफ़ग़ान भी हो।

लेकिन यह बताओ कि इन सबके साथ तुम सच में मुसलमान भी हो या नहीं?

अल्लामा इक़बाल इस शेर में बाहरी पहचान और ऊँचे ख़िताबों पर गर्व को चुनौती देते हैं। पहली पंक्ति में वंश/समुदाय के लेबल गिनाए गए हैं, दूसरी में असली धर्म-भाव और आचरण का तीखा सवाल है। भाव यह है कि नाम, जाति या समूह की पहचान पर्याप्त नहीं—मुसलमान होना अपने कर्म और निष्ठा से साबित होता है। यह आत्म-जाँच और सुधार का आह्वान है।

उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में

नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में

जब युवाओं के भीतर बाज़ जैसी ऊँची उड़ान वाली आत्मा जागती है,

तब उन्हें अपना लक्ष्य और ठिकाना आसमान की ऊँचाइयों में दिखने लगता है।

अल्लामा इक़बाल ने “बाज़/उक़ाब” को ऊँचे हौसले, आज़ादी और आत्मबल का प्रतीक बनाया है। जब युवक-युवतियों की भीतर की चेतना जागती है, तो वे छोटे-छोटे लक्ष्य छोड़कर ऊँचा सोचने लगते हैं। तब उन्हें अपनी असली मंज़िल ऊँचाइयों में नज़र आती है और वे बड़े काम करने का इरादा करते हैं। यह शे’र आत्मजागरण और ऊँची महत्वाकांक्षा का संदेश देता है।

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल

लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

अच्छा है कि हृदय के साथ बुद्धि पहरेदार बनकर रहे।

पर कभी-कभी हृदय को अकेला भी छोड़ देना चाहिए।

यह शे’र मन और भावना के बीच संतुलन की बात करता है। बुद्धि को पहरेदार मानकर कहा गया है कि वह हृदय को गलतियों से बचा सकती है, लेकिन हर समय का ज्यादा सोच-विचार भावनाओं और हिम्मत को दबा देता है। इसलिए कभी-कभी अपने भीतर की सच्ची अनुभूति पर भरोसा करके हृदय को स्वतंत्र छोड़ना भी जरूरी है।

बे-ख़तर कूद पड़ा आतिश-ए-नमरूद में इश्क़

अक़्ल है महव-ए-तमाशा-ए-लब-ए-बाम अभी

इश्क़ बिना डर के नमरूद की आग में कूद पड़ा।

बुद्धि अभी छत के किनारे पर खड़ी बस तमाशा देख रही है।

यहाँ इश्क़ और बुद्धि का विरोध दिखाया गया है: इश्क़ साहस करके कदम उठाता है, जबकि बुद्धि हिसाब लगाकर रुक जाती है। “नमरूद की आग” बहुत बड़ी परीक्षा और खतरे का रूपक है। इश्क़ सुरक्षा की शर्तें नहीं रखता, सीधे उतर जाता है; बुद्धि दहलीज़ पर खड़ी रहकर देखती रहती है। भाव यह है कि बड़े काम निर्णायक हिम्मत से होते हैं, केवल सोचने से नहीं।

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी

उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो

अगर किसी खेत से किसान को मेहनत का बदला और पेट भरने का साधन नहीं मिलता,

तो उस खेत की गेहूँ की हर बाल जला देने की बात है।

यह दोहा/शेर उस व्यवस्था के खिलाफ है जिसमें मेहनत किसान करता है, पर रोटी उसे नहीं मिलती। “खेत” यहाँ एक ऐसे ढाँचे का संकेत है जो लाभ तो देता है, पर न्याय नहीं। “गेहूँ की बाल जलाना” प्रतीक है कि अन्यायपूर्ण लाभ को ठुकराकर ऐसी व्यवस्था को तोड़ देना चाहिए। भाव में तीखा विरोध और इंसानी गरिमा की माँग है।

ग़ुलामी में काम आती हैं शमशीरें तदबीरें

जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

ग़ुलामी में तलवारें और चालाक योजनाएँ भी काम नहीं आतीं।

जब मन में पक्का विश्वास जागे, तो बेड़ियाँ कट जाती हैं।

अल्लामा इक़बाल यहाँ बाहरी साधनों और भीतर की शक्ति का फर्क बताते हैं। ग़ुलामी को वे ऐसी अवस्था मानते हैं जहाँ केवल हथियार या तरकीबें काफी नहीं होतीं। “बेड़ियाँ” दबाव और डर के बंधन हैं, और “यक़ीन” आत्म-विश्वास दृढ़ निश्चय का रूपक है। जैसे ही यह भीतर पैदा होता है, मुक्ति का रास्ता खुल जाता है।

यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम

जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें

अटल आस्था, लगातार कर्म और प्रेम—यही दुनिया को जीतने की ताकत हैं।

जीवन के संघर्ष में साहसी लोगों की असली तलवारें यही हैं।

अल्लामा इक़बाल कहते हैं कि जीत बाहरी हथियारों से नहीं, भीतर की शक्तियों से मिलती है—मजबूत भरोसा, निरंतर काम और व्यापक प्रेम। “जीवन का जिहाद” यहाँ रोज़ का संघर्ष है, जिसमें इंसान अपने लक्ष्य और नैतिकता के लिए लड़ता है। इन गुणों को “तलवारें” कहकर कवि बताता है कि असली वीरता चरित्र में होती है। यह शेर हिम्मत और लगातार प्रयास की प्रेरणा देता है।

हरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एक

कुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एक

पाक हरम भी एक है, अल्लाह भी एक है और क़ुरआन भी एक ही है।

अगर मुसलमान भी एक होकर रहते, तो यह बहुत बड़ी बात होती।

इक़बाल इस शेर में आस्था के मूल केंद्र की एकता दिखाकर मुसलमानों की आपसी बँटवारे पर दुख जताते हैं। हरम, अल्लाह और क़ुरआन एक ही दिशा और आधार के प्रतीक हैं। लेकिन मानने वाले अलग-अलग समूहों में बँट जाते हैं, इसलिए सामूहिक ताक़त घटती है। शेर का संदेश है कि समुदाय की एकता, धर्म की एकता के बराबर होनी चाहिए।

बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नौमीदी

मुझे बता तो सही और काफ़िरी क्या है

तुम मूर्तियों से उम्मीदें रखते हो, और भगवान से निराश हो जाते हो।

तो फिर मुझे साफ बताओ—इसके अलावा नास्तिकता और क्या है?

यह दोहा उलटी सोच पर चोट करता है: जो चीज़ कुछ कर नहीं सकती, उससे आशा; और जो सब कुछ कर सकता है, उससे निराशा। आशा और निराशा का यह विरोध मन के भ्रम और आत्म-छल को दिखाता है। कवि प्रश्न के रूप में कहता है कि ऐसी गलत उम्मीद ही असली अविश्वास है।

वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है

तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में

नादान! अपने देश की चिंता कर, मुसीबत आने ही वाली है।

ऊपर की दुनिया में तुम्हारे पतन की योजनाएँ बन रही हैं।

अल्लामा इक़बाल इस शेर में लापरवाह व्यक्ति/कौम को चेताते हैं कि देश के बारे में जागरूक हुए तो बड़ा संकट पास है। “आसमानों में मशवरे” का अर्थ है कि बड़े हालात, ताक़तें या किस्मत की चाल पहले से खिलाफ़ दिशा ले चुकी है। भाव का केंद्र तात्कालिक चेतावनी और जिम्मेदारी का अहसास है।

जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में

बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते

लोकतंत्र सरकार चलाने का एक ऐसा तरीका है जिसमें फैसले एक खास ढंग से किए जाते हैं।

इसमें लोगों की क़ीमत परखने के बजाय बस उनकी गिनती की जाती है।

अल्लामा इक़बाल उस लोकतंत्र की आलोचना करते हैं जो इंसान को सिर्फ संख्या मान लेता है। “गिनना” बहुमत और वोटों की गिनती का संकेत है, जबकि “तौलना” योग्यता, चरित्र और असली मूल्य को परखने का रूपक है। भाव यह है कि केवल बहुमत के भरोसे न्याय और गुणवत्ता दब सकती है। शेर एक चेतावनी है कि शासन सिर्फ हिसाब-किताब बन जाए।

जो मैं सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा

तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

जब भी मैं कभी सजदे में झुका, तो लगा कि धरती से एक आवाज़ रही है।

वह कहती है: तेरा दिल तो मूर्तियों का आदी है, फिर नमाज़ में तुझे क्या मिलेगा?

यह शेर बाहरी इबादत और अंदर की सच्ची लगन के फर्क को दिखाता है। धरती की आवाज़ दरअसल अंतरात्मा की डांट है कि दिल अभी दूसरी चाहतों में फँसा है। इक़बाल कहते हैं कि बिना सच्चाई के नमाज़ सिर्फ़ रस्म बन जाती है, उससे असली नज़दीकी और सुधार नहीं मिलता।

तमन्ना दर्द-ए-दिल की हो तो कर ख़िदमत फ़क़ीरों की

नहीं मिलता ये गौहर बादशाहों के ख़ज़ीनों में

अगर तुम्हें हृदय-पीड़ा को सच में समझने की चाह है, तो गरीबों की सेवा करो।

यह अनमोल रत्न राजाओं के खजानों में भी नहीं मिलता।

यहाँ इक़बाल कहते हैं कि असली संपदा बाहर नहीं, भीतर बनती है। “हृदय-पीड़ा” का अर्थ केवल दुख नहीं, बल्कि वह गहरी संवेदना है जो दूसरों की तकलीफ़ से जुड़कर जन्म लेती है। गरीबों की सेवा से यह संवेदना एक “रत्न” की तरह मिलती है, जबकि राजसी धन इसे खरीद नहीं सकता।

निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़

यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए

अपनी नजर ऊँची रखो, बात मीठी और दिल को छूने वाली करो, और मन में सच्चा जोश रखो।

कारवाँ के नेता के लिए सफर का असली सामान यही है।

इक़बाल बताते हैं कि सही नेतृत्व का आधार ऊँचा लक्ष्य, लोगों को जोड़ने वाली वाणी, और भीतर का सच्चा जुनून है। इन्हें “सफर का सामान” कहकर समझाया गया है कि आगे बढ़ने की राह में यही ताकत काम आती है। कारवाँ का रूपक समाज/समूह की यात्रा का संकेत है, जहाँ नेता का चरित्र सबको दिशा देता है। भाव यह है कि उद्देश्य और जोश के बिना रहनुमाई खोखली रह जाती है।

तिरे आज़ाद बंदों की ये दुनिया वो दुनिया

यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी

तेरे सचमुच स्वतंत्र सेवकों का इस दुनिया से बंधा होना है, उस दुनिया से।

यहाँ उनके लिए मरना तय है और वहाँ उनके लिए जीना तय है।

अल्लामा इक़बाल इस शे’र में कहते हैं कि ईश्वर के स्वतंत्र सेवक दुनिया और परलोक की सीमाओं में पूरी तरह नहीं बँधते। इस संसार में मृत्यु अनिवार्य नियम है, और उस संसार में जीवन का नियम। असली स्वतंत्रता का भाव यह है कि मनुष्य इन दोनों मजबूरियों से ऊपर उठकर बड़े अर्थ और ऊँचे लक्ष्य को देखता है।

हया नहीं है ज़माने की आँख में बाक़ी

ख़ुदा करे कि जवानी तिरी रहे बे-दाग़

दुनिया की नज़र में अब लज्जा लगभग बची ही नहीं है।

ईश्वर करे तुम्हारा यौवन बे-दाग और पवित्र बना रहे।

इस शे’र में कवि समाज की गिरती नैतिकता पर चिंता जताता है कि दुनिया की आँख में अब लज्जा नहीं रही। ऐसे माहौल के बीच वह संबोधित व्यक्ति के लिए दुआ करता है कि उसका यौवन कलंक से दूर और साफ़ रहे। “आँख” समाज की समझ का रूपक है और “दाग” चरित्र पर लगने वाले धब्बे का। भाव में स्नेह, सावधानी और नैतिक उम्मीद है।

इल्म में भी सुरूर है लेकिन

ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं

ज्ञान में भी एक तरह का आनंद और नशा होता है।

लेकिन यह ऐसा स्वर्ग है जिसमें मन को खींचने वाली मिठास और आकर्षण नहीं है।

यह शेर कहता है कि पढ़ाई-लिखाई और समझ से खुशी मिलती है, फिर भी वह पूरी तृप्ति नहीं देती। “स्वर्ग” और “हूर” के प्रतीक से बात साफ होती है कि सिर्फ बौद्धिक सुख ठंडा और अधूरा रह सकता है। भाव यह है कि जीवन की पूर्णता के लिए प्रेम, सौंदर्य या आत्मिक रस भी चाहिए।

ढूँडता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने आप को

आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं

मैं, इक़बाल, अपनी असली पहचान को ढूँढ़ता हुआ भटकता रहता हूँ।

मानो यात्री भी मैं हूँ और मंज़िल भी मैं ही हूँ।

यह दोहा-सा भाव अपने भीतर की खोज को बताता है। ‘सफ़र’ का रूपक दिखाता है कि जीवन में इंसान अपने ही सच को पाने के लिए चलता रहता है। लेकिन बात यह निकलती है कि जिसे हम बाहर ढूँढ़ते हैं, वह हमारे अंदर ही है: खोजने वाला और पाने की जगह एक ही हैं। इसमें आत्मचिंतन और आत्म-समझ की तड़प है।

अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है

शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात

मेरे कहने का तरीका बहुत चमकदार या तीखा नहीं है।

फिर भी हो सकता है कि मेरी बात तुम्हारे दिल में उतर जाए।

कवि अपने बोलने की सादगी स्वीकार करता है और दिखावे वाले शब्दों का दावा नहीं करता। फिर भी उसे उम्मीद है कि बात की सच्चाई और अपनापन सामने वाले के मन पर असर करेंगे। “दिल में उतर जाना” का मतलब है बात का भीतर तक पहुँचकर मान ली जाना। भाव यह है कि असर शैली से नहीं, अर्थ से पैदा होता है।

बातिल से दबने वाले आसमाँ नहीं हम

सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा

आसमान, हम झूठ और अन्याय के आगे दबने वाले नहीं हैं।

तू हमारी परीक्षा सौ बार ले चुका है।

यहाँ “आसमान” किस्मत या बड़ी ताकतों का संकेत है, जिनसे इंसान डर जाता है। कवि कहता है कि हम झूठ और अन्याय के दबाव में नहीं झुकेंगे, क्योंकि बार-बार की कठिनाइयों ने हमें तोड़ा नहीं, बल्कि मजबूत किया है। भावना चुनौती देने की है—डर के बजाय हौसला। संदेश यह है कि सत्य के साथ डटे रहना ही असली जीत है।

तू क़ादिर आदिल है मगर तेरे जहाँ में

हैं तल्ख़ बहुत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ात

तू सर्वशक्तिमान और न्याय करने वाला है, फिर भी तेरी ही दुनिया में कुछ खटकता है।

मज़दूर इंसान का समय बहुत कड़वा और कठिन बीतता है।

अल्लामा इक़बाल ईश्वर की शक्ति और न्याय को मानते हुए भी यह सवाल रखते हैं कि मज़दूर की ज़िंदगी इतनी कठिन क्यों है। “कड़वा समय” लगातार मेहनत, कमी और अन्याय का संकेत है। भाव यह है कि आस्था के साथ-साथ दुनिया की व्यवस्था पर एक नैतिक आपत्ति भी मौजूद है।

बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ

कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर

मुझे जन्नत के बाग़ से निकलकर सफ़र पर जाने का हुक्म क्यों मिला था?

दुनिया का काम बहुत लंबा है, अब तुम मेरा इंतज़ार करना।

कवि जन्नत जैसी सुख-शांति से दूर भेजे जाने का कारण पूछता है और इसे जीवन-यात्रा का रूपक बनाता है। यहाँ सफ़र का अर्थ है धरती पर मनुष्य की जिम्मेदारी और संघर्ष। दूसरे चरण में वह अपने प्रिय/अपने असली ठिकाने से कहता है कि काम लंबा है, इसलिए धैर्य रखो। भाव में बिछोह की कसक के साथ अपना कर्तव्य पूरा करने का संकल्प है।

आँख जो कुछ देखती है लब पे सकता नहीं

महव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी

आँखें जो कुछ देखती हैं, उसे मैं शब्दों में नहीं कह पाता।

मैं हैरान हूँ कि यह दुनिया आगे चलकर कितनी बदल जाएगी।

यह शेर ऐसे अनुभव की बात करता है जो इतना बड़ा है कि भाषा उसे बाँध नहीं पाती। “आँख” सीधे अनुभव का संकेत है और “होठ” बोलने की सीमाओं का। कवि बदलाव की आहट महसूस करता है और विस्मय में डूबकर सोचता है कि दुनिया अपने आज के रूप से बिल्कुल अलग रूप ले लेगी।

सौ सौ उमीदें बंधती है इक इक निगाह पर

मुझ को ऐसे प्यार से देखा करे कोई

तुम्हारी हर एक नजर पर मेरे मन में सौ-सौ आशाएँ जाग उठती हैं।

इसलिए कोई मुझे ऐसे प्रेम से भरी नजर से देखा करे।

कवि बताता है कि उसका दिल बहुत जल्दी उम्मीद बाँध लेता है; एक छोटी-सी नजर भी कई उम्मीदें पैदा कर देती है। प्रेम भरी नजर यहाँ एक संकेत की तरह है, जो मन में वादा-सा एहसास जगाती है। इसलिए वह विनती करता है कि ऐसा देखकर मुझे और कमजोर बनाओ, वरना यही आशाएँ बाद में दुख दे सकती हैं।

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं

कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल बन जाए

जब मिट्टी का बना इंसान ऊँचा उठता है, तो तारे भी डर जाते हैं।

उन्हें लगता है कि कहीं यह टूटा तारा पूरा चाँद बन जाए।

इस शेर में इंसान को “टूटा तारा” कहा गया है, यानी ऐसा जो गिरा हुआ या छोटा समझा जाता है, मगर उसके उत्थान से आकाश के तारे भी घबराते हैं। “पूरा चाँद” पूर्णता, चमक और मुकम्मल बन जाने का प्रतीक है। भाव यह है कि इंसान की क्षमता इतनी बड़ी है कि वह अपनी कोशिश से ऊँचाइयों तक पहुँचकर पुरानी सीमाओं और ऊँच-नीच को बदल सकता है।

फ़िर्क़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं

क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं

कहीं लोग फिरकों में बँटे हैं और कहीं जातियों में बाँट दिए गए हैं।

क्या दुनिया में आगे बढ़ने का मतलब यही तरह-तरह की बाँट है?

इक़बाल इस शेर में समाज की टूट-फूट पर सवाल उठाते हैं। फिरका और जाति यहाँ संकीर्ण पहचान के प्रतीक हैं, जो लोगों को एक-दूसरे से दूर कर देती हैं। कवि पूछता है कि अगर विकास का रास्ता यही विभाजन है, तो यह प्रगति नहीं बल्कि गिरावट है।

इश्क़ भी हो हिजाब में हुस्न भी हो हिजाब में

या तो ख़ुद आश्कार हो या मुझे आश्कार कर

प्रेम भी परदे में छिपा है और सौंदर्य भी परदे में छिपा है।

या तो तुम स्वयं प्रकट हो जाओ, या मुझे मेरे ही बारे में स्पष्ट कर दो।

अल्लामा इक़बाल ‘परदा’ को उस रुकावट का रूपक बनाते हैं जो प्रेम करने वाले और सत्य/प्रिय के बीच जाती है। जब प्रेम की सच्चाई भी ढकी रहे और सौंदर्य भी छिपा रहे, तो वास्तविक अनुभव नहीं हो पाता। इसलिए कवि की विनती है: या तो सत्य अपने आप सामने जाए, या मेरे भीतर की धुंध हटाकर मुझे आत्म-समझ दे। भाव में तड़प, खोज और आत्म-ज्ञान की तीव्र चाह है।

है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़

अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद

राम के अस्तित्व और महिमा पर पूरे हिंदुस्तान को गर्व है।

जो समझदार लोग हैं, वे उन्हें हिंद का मार्गदर्शक नेता मानते हैं।

यह दोहा/शेर राम को पूरे देश के लिए गर्व और आदर का प्रतीक बताता है। “वजूद” का अर्थ है उनकी स्थायी मौजूदगी, जो संस्कृति और नैतिकता में दिखाई देती है। “अहल-ए-नज़र” यानी दूरदर्शी लोग, संकीर्ण भेदभाव से ऊपर उठकर उन्हें ‘इमाम-ए-हिंद’—देश का आध्यात्मिक मार्गदर्शक—समझते हैं। भाव श्रद्धा और एकता का है।

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा

हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

हमारा हिंदुस्तान सारी दुनिया से अच्छा है।

हम इसके गाने वाले पंछी हैं और यही हमारा बाग है।

यह दोहा देश के प्रति प्रेम और गर्व की बात करता है और हिंदुस्तान को सबसे श्रेष्ठ बताता है। ‘बुलबुल’ और ‘गुलिस्तान’ के रूपक से देश को बाग और लोगों को उसकी मधुर आवाज़ वाले पंछी कहा गया है—देश उन्हें सहारा देता है और वे उसे रौनक देते हैं। भाव अपनापन, एकता और सामूहिक पहचान का है।

आईन-ए-जवाँ-मर्दां हक़-गोई बे-बाकी

अल्लाह के शेरों को आती नहीं रूबाही

सच्चे जवानों का नियम है कि वे सच बोलें और निडर रहें।

ईश्वर के शेरों में लोमड़ी जैसी कायर चालाकी नहीं आती।

इक़बाल इस शेर में जवान मर्दानगी का सार ‘सत्य’ और ‘निर्भीकता’ बताते हैं। ‘शेर’ आत्मसम्मान और नैतिक हिम्मत का प्रतीक है, जबकि ‘लोमड़ी’ डरपोक और छल-कपट की निशानी। भाव यह है कि जो ईश्वर-मार्ग पर हैं, वे फायदे की चालें नहीं चलते; वे सच और साहस को चुनते हैं।

मोती समझ के शान-ए-करीमी ने चुन लिए

क़तरे जो थे मिरे अरक़-ए-इंफ़िआ'ल के

परम दयालु की उदारता ने मेरे साधारण बूंदों को मोती समझकर चुन लिया।

वे बूंदें असल में मेरे तीव्र भाव के पसीने की थीं।

यह शेर बताता है कि इंसान की तरफ़ से जो बहुत छोटा-सा भाव भी निकलता है, वह अपने आप में बड़ी चीज़ नहीं होता। लेकिन ईश्वर की कृपा और उदारता उसे “मोती” बना देती है, यानी उसे अनमोल मानकर स्वीकार कर लेती है। भावनात्मक केंद्र विनम्रता, कृतज्ञता और ईश्वर-स्वीकृति की तड़प है।

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