info iconअर्थ के लिए शब्द पर क्लिक कीजिए

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक


कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे


होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना


आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा हुआ


मैं अच्छा हुआ बुरा हुआ

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे


कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन


दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले


बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना


दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'


शर्म तुम को मगर नहीं आती

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़


पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को


ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का


उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

था कुछ तो ख़ुदा था कुछ होता तो ख़ुदा होता


डुबोया मुझ को होने ने होता मैं तो क्या होता

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ


रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज


मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल


जब आँख ही से टपका तो फिर लहू क्या है

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'


कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था

उन के देखे से जो जाती है मुँह पर रौनक़


वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

ये थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता


अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

comments powered by Disqus