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बेचैनी पर शेर

दुनिया बेचैनियों के

ज़ह्र से बनी है शायद ही कोई शख़्स ऐसा मिले जिस ने इसका कड़वा ज़ह्र न चखा हो। लेकिन इस बेचैनी या तड़प के पीछे किसी महबूब का तसव्वुर हो तो बेचैनी से भी मोहब्बत हो जाना लाज़िमी है। अगर ये बेचैनी शायर के हिस्से में आ जाए तो क्या कहने। दिल की गहराइयों में उतरने वाले ऐसे ऐसे आशआर आने लगते हैं जिनकी कसक हमेशा याद रहती है, ऐसी होती है बेचैनी शायरीः

हमें भी नींद जाएगी हम भी सो ही जाएँगे

अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ

क़तील शिफ़ाई

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में

किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में

मेरा मन इस उजड़े हुए देश-घर में टिकता ही नहीं।

इस अस्थायी दुनिया में भला किसकी इच्छा पूरी होती है?

कवि कहता है कि उजड़ चुके अपने घर-देश में उसे अपनापन नहीं मिलता, इसलिए मन बेचैन रहता है। “उजड़ा दयार” केवल जगह नहीं, बल्कि खोई हुई खुशियों और टूटे सहारों का संकेत है। दूसरी पंक्ति में वह बात को सामान्य सत्य बना देता है कि दुनिया टिकाऊ नहीं है और किसी का भी काम हमेशा नहीं बनता। इस तरह दुख, अकेलापन और जीवन की अनित्यता एक साथ सामने आती है।

बहादुर शाह ज़फ़र

बेचैन इस क़दर था कि सोया रात भर

पलकों से लिख रहा था तिरा नाम चाँद पर

अज्ञात

कि तुझ बिन इस तरह दोस्त घबराता हूँ मैं

जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं

जिगर मुरादाबादी

हम को मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल

ज़िंदगी वगर्ना ज़माने में क्या था

आज़ाद अंसारी

बिछड़ गए तो ये दिल उम्र भर लगेगा नहीं

लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं

उमैर नजमी

कर 'सौदा' तू शिकवा हम से दिल की बे-क़रारी का

मोहब्बत किस को देती है मियाँ आराम दुनिया में

मोहम्मद रफ़ी सौदा

तुझ को पा कर भी कम हो सकी बे-ताबी-ए-दिल

इतना आसान तिरे इश्क़ का ग़म था ही नहीं

तुम्हें पा लेने पर भी मेरे दिल की बेचैनी कम नहीं हुई।

तुमसे प्रेम का दुःख इतना आसान नहीं था कि जल्दी मिट जाता।

यह शेर बताता है कि मिलन से भी प्रेम की बेचैनी खत्म नहीं होती। दिल की बेचैनी यहाँ उस चाह की निशानी है जो पाने के बाद भी शांत नहीं पड़ती। भाव यह है कि प्रेम का दुःख गहरा और टिकाऊ होता है, उसे आसानी से हल नहीं किया जा सकता।

फ़िराक़ गोरखपुरी

भोले बन कर हाल पूछ बहते हैं अश्क तो बहने दो

जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो

आरज़ू लखनवी

रोए बग़ैर चारा रोने की ताब है

क्या चीज़ उफ़ ये कैफ़ियत-ए-इज़्तिराब है

अख़्तर अंसारी

दिल को ख़ुदा की याद तले भी दबा चुका

कम-बख़्त फिर भी चैन पाए तो क्या करूँ

हफ़ीज़ जालंधरी

कुछ मोहब्बत को था चैन से रखना मंज़ूर

और कुछ उन की इनायात ने जीने दिया

कैफ़ भोपाली

इश्क़ में बे-ताबियाँ होती हैं लेकिन 'हसन'

जिस क़दर बेचैन तुम हो उस क़दर कोई हो

हसन बरेलवी

किसी पहलू नहीं चैन आता है उश्शाक़ को तेरे

तड़पते हैं फ़ुग़ाँ करते हैं और करवट बदलते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आह क़ासिद तो अब तलक फिरा

दिल धड़कता है क्या हुआ होगा

मीर मोहम्मदी बेदार

मेरे दिल ने देखा है यूँ भी उन को उलझन में

बार बार कमरे में बार बार आँगन में

कैफ़ भोपाली

बताएँ क्या कि बेचैनी बढ़ाते हैं वही कर

बहुत बेचैन हम जिन के लिए मालूम होते हैं

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी

उन्हें ख़त में लिक्खा था दिल मुज़्तरिब है जवाब उन का आया मोहब्बत करते

तुम्हें दिल लगाने को किस ने कहा था बहल जाएगा दिल बहलते बहलते

क़मर जलालवी

तुर्बत में भी सोने दिया चैन से मुझे

साया मिरी ज़मीन पे किस आसमाँ का था

नूर अहमद शैख़

बर्क़ सीमाब का 'आग़ा' रहे नाम-ओ-निशाँ

दिल की बेताबी से इक बार जो मुज़्तर मैं हूँ

आग़ा अकबराबादी
बोलिए