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नअत1
दाग़ देहलवी के शेर
तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता
तुम्हारा दिल भावनाओं में मेरे दिल के बराबर नहीं हो सकता।
वह दिल काँच जैसा कोमल नहीं हो सकता और यह दिल पत्थर जैसा कठोर नहीं हो सकता।
दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।
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हज़ारों काम मोहब्बत में हैं मज़े के 'दाग़'
जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं
प्रेम में बहुत-से ऐसे काम होते हैं जो मन को अच्छे लगते हैं, दाग़।
पर जो लोग कुछ भी नहीं करते, वही सच में गजब कर जाते हैं।
यह शेर एक मज़ेदार विरोधाभास रखता है: प्रेम में कई तरह की मीठी व्यस्तताएँ हैं, फिर भी सबसे बड़ा कमाल “कुछ न करना” है। “कुछ न करना” का मतलब है बिना ज़ोर लगाए, धैर्य से, भीतर ही भीतर प्रेम में डूबे रहना। भाव यह है कि सच्ची लगन कई बार चुपचाप ठहरने में दिखती है।
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वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
तुम कहते थे कि हम वफ़ा करेंगे, रिश्ता निभाएंगे और तुम्हारी बात मानेंगे।
तुम्हें याद तो है कि ये शब्द किसके थे?
यह शेर पुराने वादों को सामने रखकर आज की बेरुख़ी पर सवाल करता है। पहली पंक्ति में साथ निभाने और बात मानने की कसमें हैं, और दूसरी में तंज भरा याद दिलाना। भाव यह है कि जो वचन दिए गए थे, वही अब टूटते दिख रहे हैं, इसलिए याद को गवाही बनाया गया है।
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मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है
तुम उसी इंसान को मिट्टी में मिला देते हो जो दिल से मिलते हुए आता है।
मुझसे सच्ची तरह प्यार करने वाला इंसान बहुत मुश्किल से मिलता है।
कवि का दर्द यह है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से नज़दीक आता है, उसी को अपमानित करके कुचल दिया जाता है। “मिट्टी में मिलाना” यहाँ बेइज़्ज़ती और बरबादी का संकेत है। दूसरी पंक्ति बताती है कि ऐसा सच्चा चाहने वाला वैसे ही बहुत कम मिलता है, इसलिए उसकी कदर न करना बड़ा नुकसान है। भाव में शिकायत और पछतावा दोनों हैं।
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नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो
कि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते
ऐ दाग़, दोस्तों से कह दो कि यह कोई खेल नहीं है।
उर्दू में सही ढंग से बोलना-लिखना धीरे-धीरे, बहुत मेहनत के बाद आता है।
शेर में दाग़ देहलवी समझाते हैं कि उर्दू की नज़ाकत और खूबसूरती हासिल करना आसान नहीं। “आते आते” से संकेत मिलता है कि भाषा पर पकड़ समय, अभ्यास और धैर्य से बनती है। इसमें दोस्तों को सावधान करने के साथ अपने हुनर की क़द्र का भाव भी है कि असली निपुणता देर से आती है।
उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'
हिन्दोस्ताँ में धूम हमारी ज़बाँ की है
दाग़ कहते हैं: जिस भाषा को उर्दू कहते हैं, उसे हम ठीक से जानते हैं।
हिंदुस्तान में हमारी भाषा की बहुत चर्चा और प्रसिद्धि है।
यह शेर उर्दू पर गर्व और अपनी पहचान का एलान है। कवि अपने को उर्दू का सच्चा जानकार बताता है और कहता है कि इस भाषा की गूंज हर जगह है। “धूम” यहाँ लोगों में फैली लोकप्रियता और सराहना का संकेत है। भाव आत्मविश्वास और भाषा के उत्सव का है।
सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नज़र देख रहे हैं
सब लोग उसी ओर देख रहे हैं जहाँ वो खड़े/मौजूद हैं।
मैं उन्हें नहीं, देखने वालों की नज़र को देख रहा हूँ।
यह शेर बताता है कि वक्ता की दिलचस्पी सिर्फ़ महबूब में नहीं, बल्कि लोगों की निगाहों में भी है। भीड़ तो महबूब को देख रही है, पर वक्ता उन नज़रों में छुपी चाह, जलन और खिंचाव को पकड़ता है। इससे महबूब की कशिश के साथ-साथ मुकाबले का एहसास भी उभरता है। भाव में सतर्कता और हल्की-सी ईर्ष्या झलकती है।
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हमें है शौक़ कि बे-पर्दा तुम को देखेंगे
तुम्हें है शर्म तो आँखों पे हाथ धर लेना
मुझे चाह है कि मैं तुम्हें बिना घूंघट/परदे के साफ़-साफ़ देखूँ।
अगर तुम्हें लज्जा आती है, तो अपनी आँखों पर हाथ रख लेना।
यह दोहा-सा शेर छेड़छाड़ और नज़ाकत से भरा है: प्रेमी खुले रूप में दर्शन चाहता है और लज्जा को मज़ाकिया ढंग से पलट देता है। वह कहता है कि अगर शर्म है तो चेहरा नहीं, अपनी नजर ढक लो। भाव में चाह, नटखटपन और निकटता की चाहत एक साथ दिखती है।
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दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे
अगर दिल देना है तो ऐसा स्वभाव वाला दिल देना।
जो दुख के समय को भी खुशी और हिम्मत से बिता दे।
दाग़ देहलवी ईश्वर से बाहरी सुख नहीं, बल्कि मन की बनावट की दुआ करते हैं। यहाँ “दिल” मन की हालत का प्रतीक है और “स्वभाव” उस शक्ति का, जो मुश्किल समय को भी सकारात्मक ढंग से सह ले। भाव यह है कि असली खुशी परिस्थितियों में नहीं, भीतर के संतोष और धैर्य में है। दुख की घड़ी में भी मुस्कराने की क्षमता ही सबसे बड़ी कृपा है।
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आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले
आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले
आईना देखकर सजने-सँवरने वाले यह बात कहते हैं।
आज जो लोग मेरी मौत चाहते हैं, वे खुद ही बेवक्त टूटकर मरेंगे।
यह शेर अपनी ख़ूबसूरती/रुतबे पर तंज़ भरे घमंड का इज़हार है। बोलने वाला कहता है कि जो लोग उसे नुकसान पहुँचाना या मरता देखना चाहते हैं, वे ईर्ष्या और जलन में खुद ही भीतर से खत्म हो जाएँगे। “बे-मौत मरना” यहाँ असली मौत नहीं, बल्कि जलन से घुटने और हार मान लेने का रूपक है। भाव में चुनौती और कटाक्ष है।
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ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं
कितना अच्छा पर्दा है कि वे परदे से सटकर बैठे हैं।
वे न पूरी तरह छिपते हैं, न खुलकर सामने आते हैं।
दाग़ देहलवी यहाँ प्रिय के नख़रे और संकोच को ‘परदे’ के रूपक से दिखाते हैं। परदे के पास बैठना बताता है कि वह बहुत पास होकर भी दूरी बनाए हुए है—इतना कि झलक मिलती रहे, पर मिलन न हो। इसी आधी-सी मौजूदगी से चाहत बढ़ती है और मन बेचैन रहता है।
शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का
यह मिलन की रात है, इन दीयों को बुझा दो।
ख़ुशी की महफ़िल में तड़पते-जलते लोगों का क्या काम है?
कवि कहता है कि मिलन की रात में दीपक बुझा दो, क्योंकि उस घड़ी में उजाले से ज़्यादा निकटता और एकांत चाहिए। “जलने वाले” उन प्रेमियों का रूपक हैं जो विरह की आग में तड़पते हैं। आनंद की सभा में उनका दर्द बेमेल लगता है, इसलिए शेर में व्यंग्य के साथ अलग-थलग पड़ने का भाव भी है।
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इस नहीं का कोई इलाज नहीं
रोज़ कहते हैं आप आज नहीं
इस बार-बार के ‘नहीं’ का कोई उपाय नहीं है।
आप रोज़ कहते हैं कि ‘आज नहीं’।
दाग़ देहलवी ने प्रेमी की बेबसी दिखायी है, जहाँ मिलने की बात हर दिन टाल दी जाती है। ‘आज नहीं’ सुनने में नरम लगता है, पर रोज़-रोज़ वही बात असल में साफ़ इनकार बन जाती है। इस लगातार टालने से चाह बढ़ती है और मन में लाचारी रह जाती है।
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
ऐ ज़ाहिद, जो चीज़ तुम ढूँढते हो वह प्रेम से मिलेगी।
केवल भक्ति और बाहरी पूजा से ईश्वर नहीं मिलता।
यह शेर प्रेम और रूखी धार्मिकता के बीच फर्क दिखाता है। कवि ज़ाहिद से कहता है कि सिर्फ नियमों वाली पूजा-पाठ पर्याप्त नहीं, अगर दिल में सच्ची लगन न हो। ईश्वर तक पहुँचने का असल रास्ता भीतर की गर्माहट, प्रेम और समर्पण है।
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ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
मैंने बड़ी भूल की कि तुम्हारे वादे पर भरोसा कर लिया।
मैं पूरी रात ऐसे इंतज़ार करता रहा जैसे क़यामत आने वाली हो।
यह शेर अपने ही भरोसे पर पछतावा और आत्म-तिरस्कार दिखाता है। वादा पूरा न होने से इंतज़ार इतना भारी और लंबा लगता है कि उसे “क़यामत” जैसा कहा गया है। यहाँ क़यामत अंत-काल नहीं, बल्कि मन की घबराहट, टूटन और निराशा का रूपक है।
ख़बर सुन कर मिरे मरने की वो बोले रक़ीबों से
ख़ुदा बख़्शे बहुत सी ख़ूबियाँ थीं मरने वाले में
मेरे मरने की खबर सुनकर वह मेरे प्रतिद्वंद्वियों से बात करने लगी।
उसने कहा: भगवान माफ़ करे, मरने वाले में बहुत-सी अच्छी बातें थीं।
यह दोहा-सा शेर देर से मिली कद्र की कटुता दिखाता है: प्रेमिका जीवन में महत्व नहीं देती, पर मृत्यु के बाद औपचारिक ढंग से तारीफ़ कर देती है, वह भी प्रतिद्वंद्वियों के सामने। यह बात संवेदना जैसी लगती है, पर इसमें व्यंग्य और चुभन है क्योंकि अब प्रशंसा का कोई अर्थ नहीं। भाव का केंद्र पछतावा और बेबस प्रेम है।
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लिपट जाते हैं वो बिजली के डर से
इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे
वे बिजली के डर से मुझसे चिपट जाते हैं।
हे भगवान, यह काली घटा दो दिन और बरसती रहे।
कवि बारिश-तूफान को पास आने का अवसर बना देता है: बिजली से घबराकर प्रिय चिपक जाता है और प्रेमी को नज़दीकी मिलती है। इसलिए वह प्रार्थना करता है कि बादल कुछ दिन और बरसें, ताकि यह बहाना बना रहे। घटा और बिजली प्रकृति के सहारे प्रेम, डर और मिलन की चाह को दिखाते हैं।
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न जाना कि दुनिया से जाता है कोई
बहुत देर की मेहरबाँ आते आते
मुझे पता नहीं था कि कोई इस दुनिया से यूँ चला भी जाता है।
हे प्रिय, तुम आते-आते बहुत देर कर गए, तब तक समय निकल चुका था।
यह दोहा-सा भाव जीवन की अनिश्चितता और देर से पहुँची ममता का दुख दिखाता है। कहने वाला मानकर बैठा था कि सब ठीक रहेगा, पर किसी का चला जाना अचानक हो गया। प्रिय का आना बहुत देर से हुआ, इसलिए सहारा देने वाली बात भी अब केवल पछतावा बन जाती है।
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जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई
मान लो ऐसे स्वर्ग में अनगिनत युगों की हूरें हों,
तो ऐसे स्वर्ग का कोई क्या करेगा?
दाग़ देहलवी स्वर्ग की आम कल्पना—हूरें और अनंत सुख—को तुच्छ बताते हैं। दूसरा मिसरा सवाल के रूप में इनकार है: जब दिल की असली चाह (महबूब/सच्चा सुकून) न मिले, तो स्वर्ग भी बेकार है। शेर प्रेम की तीव्रता और बाहरी लालच से उदासीनता दिखाता है।
कल तक तो आश्ना थे मगर आज ग़ैर हो
दो दिन में ये मिज़ाज है आगे की ख़ैर हो
कल तक तुम अपने-से और क़रीबी थे, पर आज तुम पराये हो गए हो।
दो ही दिन में तुम्हारा रवैया बदल गया, आगे पता नहीं क्या होगा।
दाग़ देहलवी इस शेर में अचानक बदलते रिश्ते की टीस दिखाते हैं। जो व्यक्ति कल तक अपना था, वह आज अजनबी-सा हो जाता है—यह बदलता “मिज़ाज” भरोसे के टूटने का रूपक है। दूसरे मिसरे में चिंता और हल्का-सा तंज है कि जब इतनी जल्दी बदलाव आ गया, तो आगे की राह और भी अनिश्चित है। भाव का केंद्र चोट, असुरक्षा और आशंका है।
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आप का ए'तिबार कौन करे
रोज़ का इंतिज़ार कौन करे
अब आपकी बात पर भला कौन विश्वास करे?
हर रोज़ आपकी राह कौन देखे?
वक्ता प्रिय की बार-बार की बात टालने या वादा न निभाने से टूट चुका है, इसलिए भरोसे पर सवाल करता है। दूसरे मिसरे में रोज़ का इंतज़ार एक थकाने वाली आदत बनकर उभरता है। यहाँ ‘विश्वास’ रिश्ते की नींव है और ‘इंतज़ार’ उम्मीद—दोनों धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। भाव शंका और निराशा का है।
रुख़-ए-रौशन के आगे शम्अ रख कर वो ये कहते हैं
उधर जाता है देखें या इधर परवाना आता है
वह अपने चमकते चेहरे के सामने दीपक रखकर यह कहते हैं।
देखें, तुम उस रोशनी की ओर जाते हो या पतंगे की तरह इधर आ जाते हो।
प्रिय अपने चेहरे की चमक के सामने दीपक रखकर प्रेमी की परीक्षा करता है। दीपक दूसरी आकर्षक रोशनी का प्रतीक है और पतंगा उस प्रेमी का, जो रोशनी और आग की ओर खिंचता चला आता है। इस छेड़छाड़ में नाज़ के साथ हल्की-सी ईर्ष्या भी है—दिल आखिर किसे चुनेगा। शेर आकर्षण, दुविधा और बेबस प्रेम को दिखाता है।
हाथ रख कर जो वो पूछे दिल-ए-बेताब का हाल
हो भी आराम तो कह दूँ मुझे आराम नहीं
अगर वह हाथ रखकर मेरे बेचैन दिल का हाल पूछे,
भले ही थोड़ा सुकून हो, मैं कह दूँगा कि मुझे आराम नहीं।
प्रिय का स्पर्श और चिंता पल भर के लिए राहत दे सकती है, फिर भी प्रेमी उसे स्वीकार नहीं करता। उसके लिए बेचैनी ही प्रेम की गहराई का प्रमाण बन जाती है, इसलिए वह सुकून होते हुए भी ‘आराम नहीं’ कहकर अपनी तड़प बनाए रखता है। यह शिकायत भी है और अपने प्रेम को तीखा रखने की चाह भी।
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बड़ा मज़ा हो जो महशर में हम करें शिकवा
वो मिन्नतों से कहें चुप रहो ख़ुदा के लिए
अगर क़यामत के दिन हम अपनी शिकायत करें, तो बड़ा मज़ा आए।
और वह प्रिय मिन्नत करके कहे कि भगवान के लिए चुप रहो।
यहाँ कवि हिसाब के दिन को भी प्रेम की बहस का मंच बना देता है। मज़ा इस विडंबना में है कि जहाँ शिकायत करना सबसे उचित है, वहीं प्रिय मिन्नत करके बोलने से रोकता है। “भगवान के लिए” में विनती भी है और रोकने का दबाव भी, जिससे बात में नज़ाकत और छेड़छाड़ आ जाती है। शेर प्रेम, शिकायत और व्यंग्य को एक साथ पकड़ता है।
दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात
हाए कम-बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया
पिछली रात मिलन की रात थी और मोअज़्ज़िन ने अज़ान दे दी।
हाय, उस बदकिस्मत को उसी वक़्त भगवान याद आ गए।
यहाँ दाग़ देहलवी ने व्यंग्य और तड़प के साथ बताया है कि मिलन के पल में अज़ान एक बाधा बन जाती है। प्रेमी मोअज़्ज़िन की भक्ति का विरोध नहीं करता, पर उसे दुख है कि यह आवाज़ ठीक उसी समय आ गई। चाहत के उफान में धार्मिक पुकार भी बदकिस्मती जैसी लगती है। शेर प्रेम और नियम/धर्म के टकराव को उभारता है।
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ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा
ऐसे आने से तो बेहतर था न आना तेरा
तुम नाराज़ होकर गए, तो मेरी जान ही निकल गई।
ऐसे आना, न आने से भी ज़्यादा बुरा था।
कवि कहता है कि प्रिय का रूठकर चले जाना ऐसा लगा जैसे उसने उसकी ज़िंदगी छीन ली हो। दर्द केवल अलग होने का नहीं, बल्कि उस कड़वाहट का है जो मिलकर भी रह गई। इसलिए वह तुलना करता है कि ऐसी मुलाकात, जो बस चोट दे, न मिलने से भी ज़्यादा दुख देती है। भावनात्मक केंद्र शिकायत, टूटन और पछतावे का है।
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बात तक करनी न आती थी तुम्हें
ये हमारे सामने की बात है
तुम्हें तो ढंग से बात करना भी नहीं आता था।
यह बात मेरे सामने साफ़ दिखाई देती है।
इस शेर में दाग़ देहलवी ताने के साथ याद दिलाते हैं कि सामने वाला पहले ठीक से बोल भी नहीं पाता था। अब अगर वह खुद को बड़ा समझकर बातें बना रहा है, तो शायर कहता है कि सच्चाई तो मेरी आँखों के सामने है। भाव में व्यंग्य, उलाहना और दिखावे को तोड़ने वाली सख़्ती है।
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दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया
वे मेरा दिल बिना कीमत लिए भी कहते हैं कि यह किसी काम का नहीं।
धन्यवाद करने की जगह उलटी शिकायतें करने लगे, तो उपकार की कदर ही खत्म हो गई।
यह शेर प्रेम में मिली कृतघ्नता का दर्द दिखाता है: दिल जैसी बड़ी भेंट भी सामने वाला बेकार बता देता है। “उलटी शिकायतें” बताती हैं कि जिसने दिया वही दोषी ठहरा दिया गया। भाव में तीखा व्यंग्य, अपमान और भरोसे के टूटने की पीड़ा है।
लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
हाए कम-बख़्त तू ने पी ही नहीं
ए ज़ाहिद, मैं तुम्हें शराब का मज़ा क्या बताऊँ?
हाय, तुम बदक़िस्मत हो—तुमने तो उसे कभी पिया ही नहीं।
शायर एक उपदेश देने वाले ज़ाहिद से कहता है कि शराब की लज़्ज़त उसे कैसे समझाई जाए जिसने उसे कभी चखा ही नहीं। यहाँ शराब जीवन के रस, मस्ती और खुली अनुभूति का संकेत बन जाती है। व्यंग्य यह है कि बिना अनुभव किए फैसले सुनाना खाली बात है, और इसी बे-रसी को बदक़िस्मती कहा गया है।
हज़रत-ए-दाग़ जहाँ बैठ गए बैठ गए
और होंगे तिरी महफ़िल से उभरने वाले
जहाँ दाग़ साहब बैठे, वहाँ ऐसे बैठे कि उनकी जगह पक्की हो गई।
फिर भी तुम्हारी महफ़िल से और लोग उभरकर नाम कमाएँगे।
इस शेर में शायर अपने रुतबे का भरोसा दिखाता है कि उसके बैठने से मानो बात तय हो जाती है। साथ ही वह यह भी मानता है कि महबूब की महफ़िल इतनी चमकदार है कि वहाँ से नए लोग भी आगे आकर प्रसिद्ध हो सकते हैं। भाव में आत्मविश्वास, हल्की प्रतिस्पर्धा और महफ़िल की ताक़त का स्वीकार साथ-साथ है।
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हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल
दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है
अगर तुम हज़ार बार भी माँगो, तो उससे आखिर क्या फायदा?
सच्ची प्रार्थना वही है जो अपने-आप दिल से निकल पड़े।
यह शेर बताता है कि बार-बार माँगना ही काफी नहीं होता। प्रार्थना की ताकत गिनती में नहीं, सच्चे भाव में है; जो बात दिल की गहराई से उठे वही असर करती है। यहाँ दिल को सच्चाई की कसौटी बनाया गया है। भाव यह है कि बिना दिखावे के, भीतर से निकली पुकार ही असली दुआ है।
चुप-चाप सुनती रहती है पहरों शब-ए-फ़िराक़
तस्वीर-ए-यार को है मिरी गुफ़्तुगू पसंद
विरह की रात में कई-कई घंटों तक वह चुपचाप मेरी बातें सुनती रहती है।
मुझे लगता है कि प्रिय की तस्वीर को मेरी बात करना अच्छा लगता है।
कवि जुदाई की रात में अकेला है और एक तस्वीर से बातें कर रहा है, मानो वह सजीव हो। “रात” को चुप श्रोता और “तस्वीर” को साथी बनाकर वह अपनी तड़प और खालीपन दिखाता है। प्रिय के न होने पर याद और कल्पना ही उसके संवाद का सहारा बन जाती है।
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जिन को अपनी ख़बर नहीं अब तक
वो मिरे दिल का राज़ क्या जानें
जिन लोगों को अभी तक अपने बारे में ही समझ नहीं है,
वे मेरे मन का छुपा राज़ क्या समझ पाएँगे?
कवि कहता है कि जो व्यक्ति खुद को नहीं समझता, वह दूसरे के भीतर की बात कैसे समझेगा। “दिल का राज़” गहरे भाव और छुपी पीड़ा का संकेत है। भाव में शिकायत और उदासी है, जैसे सामने वाला समझने में असमर्थ हो और दूरी बन जाए।
ये तो नहीं कि तुम सा जहाँ में हसीं नहीं
इस दिल को क्या करूँ ये बहलता कहीं नहीं
यह नहीं है कि दुनिया में तुम्हारे जैसी सुंदरता कहीं और नहीं है।
पर मैं क्या करूँ, मेरा मन कहीं भी सुकून नहीं पाता।
कवि मानता है कि सुंदर लोग और भी हैं, पर दिल की तसल्ली केवल उसी प्रिय से जुड़ी है। यहाँ ‘सुंदरता’ आम है, लेकिन ‘सुकून’ खास और एक ही जगह मिलता है। भाव का केंद्र लगाव और बेचैनी है: प्रिय के बिना मन किसी भी चीज़ से बहल नहीं पाता।
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रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा
मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था
मेरे दिल में वह निर्दयी प्रिय नहीं रहा, बस दर्द रह गया।
कौन यहाँ हमेशा टिकता है, यह जगह भला किसकी थी?
इस शेर में प्रिय के चले जाने और दर्द के रह जाने की बात है: इंसान चला जाता है, पर पीड़ा मन में बनी रहती है। दूसरी पंक्ति उस निजी दुख को एक बड़े सच में बदल देती है कि न दिल किसी का स्थायी ठिकाना है, न दुनिया—सब कुछ अस्थायी है। “मक़ाम” यहाँ दिल और जीवन, दोनों का रूपक बन जाता है।
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ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा
मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं
बताइए, इस गलती की सज़ा क्या होगी?
अगर मैं कह दूँ कि मैं आपसे बेइंतहा प्यार करता हूँ।
कवि प्यार के इकरार को ‘गलती’ कहकर मज़ाकिया ढंग से उसकी सज़ा पूछता है। इसमें स्वीकार करने की चाह भी है और ठुकराए जाने का डर भी। ‘मैं आप पर मरता हूँ’ प्यार की तीव्रता का बढ़ा-चढ़ाकर कहा गया रूप है, जो दिल की बेबसी और लगाव दोनों दिखाता है।
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ज़िद हर इक बात पर नहीं अच्छी
दोस्त की दोस्त मान लेते हैं
हर बात पर अड़ जाना और ज़िद करना ठीक नहीं है।
दोस्त की बात हो तो हम दोस्ती निभाने के लिए मान लेते हैं।
यह शेर बताता है कि हर छोटी बात पर ज़िद करना रिश्तों में कड़वाहट लाता है। सच्ची दोस्ती में इंसान अपने अहं को पीछे रखकर सामने वाले की बात स्वीकार कर लेता है। यहाँ भाव यह है कि सही होना नहीं, साथ निभाना ज़्यादा बड़ा है।
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साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं
ज़हर दे दे अगर शराब नहीं
साक़ी, यह प्यास अब मुझसे सहन नहीं होती।
अगर शराब नहीं है, तो फिर ज़हर ही दे दो।
यहाँ प्यास का मतलब सिर्फ पानी की प्यास नहीं, बल्कि तीव्र चाह और मन की जलन है। शराब राहत, प्रेम या मदहोशी का संकेत है जो इस बेचैनी को शांत कर सकती है। जब वह नहीं मिलती, तो बोलने वाला कहता है कि ऐसे तड़पते रहने से अच्छा है ज़हर मिल जाए। यह शेर मजबूरी और हद से बढ़ी हुई बेकरारी को दिखाता है।
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यूँ भी हज़ारों लाखों में तुम इंतिख़ाब हो
पूरा करो सवाल तो फिर ला-जवाब हो
हज़ारों-लाखों में भी तुम ही मेरी पसंद हो।
मेरी बात पूरी कर दो, तो फिर तुम बेमिसाल हो जाओगे।
इस शेर में दाग़ देहलवी प्रिय की खासियत बताते हैं कि भीड़ में भी वही चुना हुआ है। फिर प्रेमी हल्की-सी शरारत के साथ कहता है कि अगर मेरी बात मान लो तो तुम सचमुच बेमिसाल ठहरोगे। यह प्रशंसा और मनुहार का मिला-जुला अंदाज़ है। भावनात्मक केंद्र चाहत है, जो तारीफ़ बनकर सामने आती है।
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अर्ज़-ए-अहवाल को गिला समझे
क्या कहा मैं ने आप क्या समझे
मैंने तो बस अपना हाल बताया, आपने उसे शिकायत समझ लिया।
मैंने जो कहा, आपने उसका कुछ और ही मतलब निकाल लिया।
कवि अपने मन की स्थिति बताना चाहता है, पर सुनने वाला उसे उलाहना मान लेता है। यहाँ बात और समझ के बीच की दूरी दिखती है, जहाँ सच्ची बात भी गलत अर्थ में ली जाती है। भाव का केंद्र है गलतफ़हमी से पैदा हुआ दुख और संवाद की असफलता।
कहने देती नहीं कुछ मुँह से मोहब्बत मेरी
लब पे रह जाती है आ आ के शिकायत मेरी
मेरा प्रेम मुझे मुँह से कुछ भी कहने नहीं देता।
शिकायत बार-बार होंठों तक आती है, पर वहीं रुक जाती है।
इस दोहे में प्रेम को ऐसा बंधन माना गया है जो बोलने से रोक देता है। मन की शिकायत बार-बार बाहर आने को होती है, लेकिन शब्द बनकर निकल नहीं पाती। होंठों पर अटक जाना भीतर की तड़प और संकोच, दोनों को दिखाता है। भाव गहरा है, पर व्यक्त करने की हिम्मत नहीं।
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दी मुअज़्ज़िन ने शब-ए-वस्ल अज़ाँ पिछले पहर
हाए कम्बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया
मिलन की रात में, रात के आख़िरी पहर मुअज़्ज़िन ने अज़ान दे दी।
हाय, उस बदक़िस्मत को उसी समय ख़ुदा क्यों याद आया!
इस शेर में प्रेमी का गुस्सा और व्यंग्य है कि मिलन के नाज़ुक पल में नमाज़ की पुकार बाधा बन गई। अज़ान यहाँ पवित्र आवाज़ होते हुए भी उस व्यवधान का रूप ले लेती है जो साथ के आनंद को तोड़ देता है। कवि धर्म का अपमान नहीं करता, बस समय की बेदर्दी पर शिकवा करता है। मूल भाव: कसक, बेबसी और तंज़।
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आओ मिल जाओ कि ये वक़्त न पाओगे कभी
मैं भी हम-राह ज़माने के बदल जाऊँगा
आओ अभी मिल लो, क्योंकि ऐसा समय फिर कभी नहीं मिलेगा।
मैं भी समय के साथ बदल जाऊँगा और पहले जैसा नहीं रहूँगा।
दाग़ देहलवी इस दोहे में मिलन के लिए तुरंत बुलाते हैं और कहते हैं कि बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता। दूसरी पंक्ति में वक्त का असर खुद वक्ता पर भी दिखाया गया है कि वह भी बदल जाएगा। इसलिए देर करने से संबंध और भावनाएँ दोनों बदल सकती हैं। भाव के केंद्र में वर्तमान को पकड़ने की बेचैनी और बाद के पछतावे का डर है।
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अभी कम-सिन हो रहने दो कहीं खो दोगे दिल मेरा
तुम्हारे ही लिए रक्खा है ले लेना जवाँ हो कर
तुम अभी बहुत छोटे हो, अभी रहने दो, कहीं तुम मेरा दिल खो न दो।
मैंने यह दिल तुम्हारे लिए ही संभाल कर रखा है, बड़े होकर ले लेना।
कवि प्यार से समझाता है कि कम उम्र में किसी के दिल की जिम्मेदारी निभाना मुश्किल होता है। “दिल खो देना” यहाँ लापरवाही और नासमझी का संकेत है। भाव यह है कि प्रेम तो तुम्हारे नाम है, पर उसे अपनाने के लिए परिपक्वता चाहिए। इसलिए दिल को एक सुरक्षित धरोहर की तरह “बाद में लेने” की बात कही गई है।
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तुम को चाहा तो ख़ता क्या है बता दो मुझ को
दूसरा कोई तो अपना सा दिखा दो मुझ को
अगर मैंने तुमसे प्यार किया, तो इसमें मेरी गलती क्या है, मुझे बता दो।
अगर तुम्हारे जैसा कोई और अपना-सा है, तो मुझे उसे दिखा दो।
कवि कहता है कि प्रेम करने में अपराध क्या है—यह आरोप लगाने वालों से जवाब माँगता है। “अपना-सा” उस खास अपनापन और निकटता का संकेत है जो किसी एक से ही मिलती है। दूसरी पंक्ति में वह चुनौती देता है कि अगर प्यार बदला जा सकता है तो वैसा दूसरा व्यक्ति सामने लाओ। भाव में शिकायत, तड़प और अपने प्रेम पर अडिग विश्वास है।
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फ़लक देता है जिन को 'ऐश उन को ग़म भी होते हैं
जहाँ बजते हैं नक़्क़ारे वहाँ मातम भी होते है
जिन्हें किस्मत सुख देती है, उन्हें दुख भी मिलता है।
जहाँ खुशी के बाजे बजते हैं, वहाँ शोक भी होता है।
दाग़ देहलवी इस दोहे में बताते हैं कि जीवन में सुख और दुख साथ-साथ चलते हैं। “फ़लक” यानी किस्मत—वह आनंद देती है तो पीड़ा भी देती है। “नक़्क़ारे” (जश्न के बाजे) और “मातम” (शोक) का विरोध दिखाकर कहा गया है कि उत्सव के बीच भी दुख मौजूद रहता है। भाव यह है कि खुशियों में विनम्र रहो और दुख में धैर्य रखो।
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ना-उमीदी बढ़ गई है इस क़दर
आरज़ू की आरज़ू होने लगी
मेरी निराशा इतनी बढ़ गई है कि अब हद हो गई है।
अब तो चाहत की भी चाहत होने लगी है।
यह शेर निराशा की चरम अवस्था दिखाता है, जहाँ उम्मीद ही नहीं, चाहने की शक्ति भी कमज़ोर पड़ जाती है। “चाहत की चाहत” एक विरोधाभास है: इंसान किसी चीज़ की नहीं, अपने भीतर की खोई हुई चाह को वापस पाने की इच्छा कर रहा है। भावनात्मक थकान और बेबसी इसका मूल भाव है।
उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से
कभी गोया किसी में थी ही नहीं
दुनिया से वफ़ादारी ऐसे गायब हो गई है, जैसे उड़कर चली गई हो।
ऐसा लगता है कि वफ़ा कभी किसी के भीतर थी ही नहीं।
यह शेर समय और लोगों की बेवफ़ाई पर गहरा दुख जताता है। “उड़ गई” की छवि बताती है कि वफ़ा कोई नाज़ुक चीज़ थी जो हाथ से निकल गई। कहने वाला इतना टूट चुका है कि उसे लगता है वफ़ा का होना ही कभी सच नहीं था। भावनात्मक केंद्र कड़वा मोहभंग और निराशा है।
कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस 'दाग़' है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं
अगर कोई मेरी पहचान और पता पूछे, तो ऐ संदेशवाहक, उसे बता देना।
कह देना कि मेरा उपनाम दाग़ है, और मैं प्रेमियों के दिलों में रहता हूँ।
कवि संदेशवाहक से कहता है कि लोग नाम-पता पूछें तो जवाब किसी जगह का नहीं, दिल का दिया जाए। “दिल में रहना” यहाँ सच्चे प्रेम और याद में बसे रहने का संकेत है। ‘दाग़’ उपनाम लेकर वह बताता है कि उसकी असली पहचान प्रेमियों के भीतर उसकी मौजूदगी है—यही उसकी सच्ची कीर्ति है।
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ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती
न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता
इस दिल-लगी का आनंद यह था कि लगन की आग बराबर जलती रहती थी।
न तुम्हें चैन मिलता था, न मुझे चैन मिलता था।
दाग़ देहलवी ने प्रेम को आग की तरह दिखाया है: दिल-लगी की मिठास इसी में है कि दोनों तरफ़ एक-सी जलन और खिंचाव बना रहे। आग यहाँ चाह, लगन और छेड़छाड़ की तीव्रता का रूपक है जो बार-बार भड़कती है। भाव यह है कि यह प्यार दोनों को समान रूप से बेचैन करता है—और वही बेचैनी इसका सुख भी है और कसक भी।
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