शोहरत पर शेर
मशहूर हो जाने की ख़्वाहिश
हर किसी की होती है लेकिन इस ख़्वाहिश को ग़लत तरीक़ों से पूरा करने की कोशिश बहुत सी इन्सानी क़द्रों की पायमाली का बाइस बनती है। ये शेरी इन्तिख़ाब शोहरत की अच्छी बुरी सूरतों को सामने लाता है।
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
हम तालिब-ए-शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम
बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही
अगर तुम मेरे जज़्बातों को इश्क़ नहीं मानते, तो चलो इसे मेरा पागलपन ही मान लेते हैं।
लेकिन याद रखो, मेरा यही पागलपन दुनिया में तुम्हारी प्रसिद्धि और चर्चा का कारण बन रहा है।
शायर कहता है कि अगर दुनिया या महबूब उसके प्यार को इज़्ज़त देने के बजाय उसे 'वहशत' (पागलपन) कहते हैं, तो उसे यह भी मंज़ूर है। लेकिन साथ ही वह यह भी जताता है कि उसी के इस दीवानेपन के कारण महबूब का नाम हर जगह मशहूर हो रहा है। यह शेर इश्क़ में मिट जाने और महबूब को ऊँचा उठाने की भावना को दर्शाता है।
किसी को बे-सबब शोहरत नहीं मिलती है ऐ 'वाहिद'
उन्हीं के नाम हैं दुनिया में जिन के काम अच्छे हैं
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शोहरत की फ़ज़ाओं में इतना न उड़ो 'साग़र'
परवाज़ न खो जाए इन ऊँची उड़ानों में
अब तू दरवाज़े से अपने नाम की तख़्ती उतार
लफ़्ज़ नंगे हो गए शोहरत भी गाली हो गई
क्या पूछते हो कौन है ये किस की है शोहरत
क्या तुम ने कभी 'दाग़' का दीवाँ नहीं देखा
तुम क्यों पूछते हो कि यह कौन है और यह प्रसिद्धि किसकी है?
क्या तुमने कभी दाग़ का कविता-संग्रह नहीं देखा?
इस शेर में कवि अपने नाम और प्रसिद्धि पर आत्मविश्वास के साथ बात करता है। वह सवाल के जवाब में उलटा सवाल करके दिखाता है कि उसकी पहचान उसके काव्य से ही हो जाती है। “दीवाँ” यानी रचनाओं का संग्रह—उसे देख लेना ही प्रसिद्धि का प्रमाण है। भाव में हल्की-सी तंज और गर्व दोनों हैं।
उस घर की बदौलत मिरे शेरों को है शोहरत
वो घर कि जो इस शहर में बदनाम बहुत है
उलझ रहे हैं बहुत लोग मेरी शोहरत से
किसी को यूँ तो कोई मुझ से इख़्तिलाफ़ न था
बुलंदी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची 'इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है
खुली न मुझ पे भी दीवानगी मिरी बरसों
मिरे जुनून की शोहरत तिरे बयाँ से हुई
वो जुनूँ को बढ़ाए जाएँगे
उन की शोहरत है मेरी रुस्वाई
मेरी शोहरत के पीछे है
हाथ बहुत रुस्वाई का
अपने अफ़्साने की शोहरत उसे मंज़ूर न थी
उस ने किरदार बदल कर मिरा क़िस्सा लिख्खा
बिकता रहता सर-ए-बाज़ार कई क़िस्तों में
शुक्र है मेरे ख़ुदा ने मुझे शोहरत नहीं दी
मियाँ ये चादर-ए-शोहरत तुम अपने पास रखो
कि इस से पाँव जो ढाँपें तो सर निकलता है
घर से उस का भी निकलना हो गया आख़िर मुहाल
मेरी रुस्वाई से शोहरत कू-ब-कू उस की भी थी
मुझ से ये पूछ रहे हैं मिरे अहबाब 'अज़ीज़'
क्या मिला शहर-ए-सुख़न में तुम्हें शोहरत के सिवा
कौन मस्लूब हुआ हुस्न का किरदार कि हम
शोहरत-ए-इश्क़ में बदनाम हुआ यार कि हम
जो आसमाँ की बुलंदी को छूने वाला था
वही मिनारा ज़मीं पर धड़ाम से आया
'फ़रहत' तिरे नग़मों की वो शोहरत है जहाँ में
वल्लाह तिरा रंग-ए-सुख़न याद रहेगा
खो दिया शोहरत ने अपनी शेर-ख़्वानी का मज़ा
दाद मिल जाती है 'नातिक़' हर रतब याबिस के बा'द
तुझ से वाक़िफ़ है इक जहाँ 'नय्यर'
क्या ज़रूरत है ख़ुद-नुमाई की