Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

आँसू पर 20 बेहतरीन शेर

आँसू पानी के सहज़ चंद

क़तरे नहीं होते जिन्हें कहीं भी टपक पड़ने का शौक़ होता है बल्कि जज़्बात की शिद्दत का आईना होते हैं जिन्हें ग़म और ख़ुशी दोनों मौसमों में संवरने की आदत है। किस तरह इश्क आंसुओं को ज़ब्त करना सिखाता है और कब बेबसी सारे पुश्ते तोड़ कर उमड आती है आईए जानने की कोशिश करते हैं आँसू शायरी के हवाले से.

टॉप 20 सीरीज़

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल

जब आँख ही से टपका तो फिर लहू क्या है

Interpretation: Rekhta AI

ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।

Interpretation: Rekhta AI

ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।

मिर्ज़ा ग़ालिब

मिरी रूह की हक़ीक़त मिरे आँसुओं से पूछो

मिरा मज्लिसी तबस्सुम मिरा तर्जुमाँ नहीं है

मुस्तफ़ा ज़ैदी

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है

अजीब शख़्स है पानी के घर में रहता है

बिस्मिल साबरी

रोज़ अच्छे नहीं लगते आँसू

ख़ास मौक़ों पे मज़ा देते हैं

मोहम्मद अल्वी

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में

बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि महबूब की महफिल में मैं अपने जज़्बात काबू में रख सका और एक आँसू निकल पड़ा। उस एक बूँद ने मुझे 'डुबो' दिया, यानी मेरी सारी इज्ज़त पानी में मिल गई; यहाँ 'पानी होना' मुहावरे का प्रयोग इज्ज़त जाने और शर्मिंदा होने के लिए किया गया है।

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि महबूब की महफिल में मैं अपने जज़्बात काबू में रख सका और एक आँसू निकल पड़ा। उस एक बूँद ने मुझे 'डुबो' दिया, यानी मेरी सारी इज्ज़त पानी में मिल गई; यहाँ 'पानी होना' मुहावरे का प्रयोग इज्ज़त जाने और शर्मिंदा होने के लिए किया गया है।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

उन के रुख़्सार पे ढलके हुए आँसू तौबा

मैं ने शबनम को भी शोलों पे मचलते देखा

साहिर लुधियानवी

उस ने छू कर मुझे पत्थर से फिर इंसान किया

मुद्दतों बअ'द मिरी आँखों में आँसू आए

बशीर बद्र

क्या कहूँ किस तरह से जीता हूँ

ग़म को खाता हूँ आँसू पीता हूँ

सैय्यद मोहम्मद मीर असर

जो आग लगाई थी तुम ने उस को तो बुझाया अश्कों ने

जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे

मुईन अहसन जज़्बी

घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू

पाँव रखता हूँ तो हल्की सी नमी लगती है

सलीम अहमद

पहले नहाई ओस में फिर आँसुओं में रात

यूँ बूँद बूँद उतरी हमारे घरों में रात

शहरयार

ये आँसू बे-सबब जारी नहीं है

मुझे रोने की बीमारी नहीं है

कलीम आजिज़

अश्क-ए-ग़म दीदा-ए-पुर-नम से सँभाले गए

ये वो बच्चे हैं जो माँ बाप से पाले गए

मीर अनीस

क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है

संग कट जाते हैं बारिश की जहाँ धार गिरे

शकेब जलाली

इतने आँसू तो थे दीदा-ए-तर के आगे

अब तो पानी ही भरा रहता है घर के आगे

मीर हसन

होती है शाम आँख से आँसू रवाँ हुए

ये वक़्त क़ैदियों की रिहाई का वक़्त है

अहमद मुश्ताक़

थमे आँसू तो फिर तुम शौक़ से घर को चले जाना

कहाँ जाते हो इस तूफ़ान में पानी ज़रा ठहरे

लाला माधव राम जौहर

आँसू हमारे गिर गए उन की निगाह से

इन मोतियों की अब कोई क़ीमत नहीं रही

जलील मानिकपूरी

आँखों तक सकी कभी आँसुओं की लहर

ये क़ाफ़िला भी नक़्ल-ए-मकानी में खो गया

अब्बास ताबिश
बोलिए