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शम्अ पर शेर

शमा रात भर रौशनी लुटाने

के लिए जलती रहती है, सब उस के फ़ैज़ उठाते हैं लेकिन उस के अपने दुख और कर्ब को कोई नहीं समझता। किस तरह से सियाह काली रात उस के ऊपर गुज़रती है उसे कोई नहीं जानता। तख़्लीक़ कारों ने रौशनी के पीछे की उन तमाम अन-कही बातों को ज़बान दी है। ख़याल रहे कि शायरी में शमा और पर्वाना अपने लफ़्ज़ी मानी और माद्दी शक्लों से बहुत आगे निकल जिंदगी की मुतनव्वे सूरतों की अलामत के तौर मुस्तामल हैं।

सब इक चराग़ के परवाने होना चाहते हैं

अजीब लोग हैं दीवाने होना चाहते हैं

असअ'द बदायुनी

शम्अ तेरी उम्र-ए-तबीई है एक रात

हँस कर गुज़ार या इसे रो कर गुज़ार दे

Interpretation: Rekhta AI

शायर मोमबत्ती का उदाहरण देकर समझा रहे हैं कि जीवन बहुत छोटा है, जैसे शमा की उम्र बस एक रात की होती है। जब अंत निश्चित है और समय कम है, तो दुख मनाने से समय नहीं रुकेगा। यह शेर हमें सीख देता है कि जीवन की इस छोटी सी अवधि को रोने के बजाय खुशी और हिम्मत से बिताना चाहिए।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

होती कहाँ है दिल से जुदा दिल की आरज़ू

जाता कहाँ है शम्अ को परवाना छोड़ कर

जलील मानिकपूरी

तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा

शम्अ होगी जहाँ परवाना वहाँ पहुँचेगा

Interpretation: Rekhta AI

बहादुर शाह ज़फ़र ने प्रेम की खिंचाव को शमा और परवाने की मिसाल से बताया है। भाव यह है कि सच्ची चाहत अपने आप रास्ता ढूँढ़ लेती है, दूरी उसे नहीं रोकती। जैसे परवाना रोशनी की तरफ खिंचता है, वैसे ही प्रेम में डूबा दिल अपने प्रिय तक पहुँचने को मजबूर है। इसमें चाह, लगाव और अपने-आप को दाँव पर लगाने की भावना झलकती है।

बहादुर शाह ज़फ़र

शम्अ के मानिंद हम इस बज़्म में

चश्म-ए-तर आए थे दामन-तर चले

ख़्वाजा मीर दर्द

शम्अ जिस आग में जलती है नुमाइश के लिए

हम उसी आग में गुम-नाम से जल जाते हैं

क़तील शिफ़ाई

शम्अ माशूक़ों को सिखलाती है तर्ज़-ए-आशिक़ी

जल के परवाने से पहले बुझ के परवाने के बाद

जलील मानिकपूरी

परवानों का तो हश्र जो होना था हो चुका

गुज़री है रात शम्अ पे क्या देखते चलें

शाद अज़ीमाबादी

मैं ढूँढ रहा हूँ मिरी वो शम्अ कहाँ है

जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे

बहज़ाद लखनवी

यूँ तो जल बुझने में दोनों हैं बराबर लेकिन

वो कहाँ शम्अ में जो आग है परवाने में

जलील मानिकपूरी

मत करो शम्अ कूँ बदनाम जलाती वो नहीं

आप सीं शौक़ पतंगों को है जल जाने का

सिराज औरंगाबादी

ख़ुद ही परवाने जल गए वर्ना

शम्अ जलती है रौशनी के लिए

सनम प्रतापगढ़ी

परवाने ही जाएँगे खिंच कर ब-जब्र-ए-इश्क़

महफ़िल में सिर्फ़ शम्अ जलाने की देर है

माहिर-उल क़ादरी

शम्अ पर ख़ून का इल्ज़ाम हो साबित क्यूँ-कर

फूँक दी लाश भी कम्बख़्त ने परवाने की

जलील मानिकपूरी

शम्अ सुब्ह होती है रोती है किस लिए

थोड़ी सी रह गई है इसे भी गुज़ार दे

ऐश देहलवी

जाने क्या महफ़िल-ए-परवाना में देखा उस ने

फिर ज़बाँ खुल सकी शम्अ जो ख़ामोश हुई

अलीम मसरूर

शम्अ' बुझ कर रह गई परवाना जल कर रह गया

यादगार-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ इक दाग़ दिल पर रह गया

मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी

ख़ुद भी जलती है अगर उस को जलाती है ये

कम किसी तरह नहीं शम्अ भी परवाने से

अज्ञात

ख़याल तक किया अहल-ए-अंजुमन ने ज़रा

तमाम रात जली शम्अ अंजुमन के लिए

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

परवाने की तपिश ने ख़ुदा जाने कान में

क्या कह दिया कि शम्अ के सर से धुआँ उठा

इस्माइल मेरठी

रौशनी जब से मुझे छोड़ गई

शम्अ रोती है सिरहाने मेरे

असग़र वेलोरी

वो शम्अ' करे फ़ख़्र भला ख़ुद पे तो कैसे

दहलीज़ पे जिस की कोई परवाना नहीं है

ज़ोहेब आज़मी

नज़रों में तसादुम दिल में चुभन इक शम्अ' है इक परवाना है

दोनों ही में बातें होती हैं आवाज़ का लेकिन नाम नहीं

फ़ज़्ल लखनवी

ख़ाक कर देवे जला कर पहले फिर टिसवे बहाए

शम्अ मज्लिस में बड़ी दिल-सोज़ परवाने की है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

शम्अ का शाना-ए-इक़बाल है तौफ़ीक़-ए-करम

ग़ुंचा गुल होते ही ख़ुद साहब-ए-ज़र होता है

हबीब मूसवी

ये चराग़-ए-अंजुमन तो हैं बस एक शब के मेहमाँ

तू जला वो शम्अ' दिल जो बुझे कभी जल के

ख़ुमार बाराबंकवी

मैं एक शम-ए-सर-ए-रह-गुज़ार हूँ 'अजमल'

जाने किस लिए मुझ को बुझाना चाहता है

नसीम अजमल

सहर के साथ होगा चाक मेरा दामन-ए-हस्ती

ब-रंग-ए-शम्अ बज़्म-ए-दहर में मेहमाँ हूँ शब भर का

ताैफ़ीक़ हैदराबादी

रात उस की महफ़िल में सर से जल के पाँव तक

शम्अ की पिघल चर्बी उस्तुखाँ निकल आई

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
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