इंसान पर शेर
इंसान को सृष्टि की रचना
का केंद्र बिंदु कहा गया है । साहित्य और शाइरी में भी इंसान को अहमियत हासिल है । अब उस का तौर-तरीक़ा हो, व्यवहार हो, उस की कमज़ोरियाँ हों, अच्छाई हो बुराई हो उर्दू शाइरी में इंसान का पूरा अस्तित्व विषय के तौर पर मौजूद है । यहाँ प्रस्तुत शाइरी में इंसान और उस के अस्तित्व के कई हवाले पेश किए गए हैं । आप इस संकलन को पढ़िए और उर्दू शाइरी के रंग-ओ-रूप में इंसान की कहानी से लुत्फ़ हासिल कीजिए ।
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
'ज़फ़र' आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का
जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा न रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में इंसान की कसौटी बुद्धि नहीं, बल्कि आचरण और ईश्वर-चेतना है। सुख में ईश्वर की याद कृतज्ञता और विनम्रता दिखाती है, और गुस्से में ईश्वर का डर संयम और न्याय बनाए रखता है। जो दोनों हालात में यह भूल जाए, उसकी समझ व्यर्थ और उसका चरित्र कमज़ोर हो जाता है।
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
EXPLANATION #1
हर काम का आसानी से हो जाना कितना मुश्किल है।
यहाँ तक कि एक 'आदमी' के लिए भी सच्चा 'इंसान' बनना आसान नहीं है।
ग़ालिब कहते हैं कि दुनिया में सरलता मिलना कठिन है। उन्होंने 'आदमी' (शारीरिक अस्तित्व) और 'इंसान' (नैतिक और मानवीय गुणों से पूर्ण) में अंतर किया है। जिस तरह हर काम आसान नहीं होता, वैसे ही जन्म से आदमी होने के बावजूद, उसमें मानवता के गुण पैदा करना एक अत्यंत कठिन साधना है।
मोहम्मद आज़म
फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना
मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा
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इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
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सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिस को देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
साया है कम खजूर के ऊँचे दरख़्त का
उम्मीद बाँधिए न बड़े आदमी के साथ
आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है
मेरी रुस्वाई के अस्बाब हैं मेरे अंदर
आदमी हूँ सो बहुत ख़्वाब हैं मेरे अंदर
मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
मैं आदमी हूँ मिरा ए'तिबार मत करना
ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया
आदमिय्यत और शय है इल्म है कुछ और शय
कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा
Interpretation:
Rekhta AI
शायर यहाँ ज्ञान और इंसानियत (अच्छे व्यवहार) के बीच का अंतर समझा रहे हैं। उनका कहना है कि सिर्फ़ ज्ञान पा लेने से कोई अच्छा इंसान नहीं बन जाता, जैसे तोते को रटाने के बाद भी वह जानवर ही रहता है। असली महत्त्व अच्छे स्वभाव और मनुष्यता का है, केवल रटने या पढ़ने का नहीं।
जानवर आदमी फ़रिश्ता ख़ुदा
आदमी की हैं सैकड़ों क़िस्में
सब से पुर-अम्न वाक़िआ ये है
आदमी आदमी को भूल गया
भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब
ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया
इस दौर में इंसान का चेहरा नहीं मिलता
कब से मैं नक़ाबों की तहें खोल रहा हूँ
देवताओं का ख़ुदा से होगा काम
आदमी को आदमी दरकार है
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि बड़े-बड़े दिव्य सहारे अपनी जगह हैं, लेकिन इंसान की असली जरूरत इंसान ही पूरा करता है। दुख, कमी और अकेलेपन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ किसी अपने की मदद और साथ है। भाव यह है कि जीवन में मानवीय करुणा और एकजुटता ही सच्चा सहारा बनती है।
फ़रिश्ता है तो तक़द्दुस तुझे मुबारक हो
हम आदमी हैं तो ऐब-ओ-हुनर भी रखते हैं
फूल कर ले निबाह काँटों से
आदमी ही न आदमी से मिले
जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज़
मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँडते हैं हम
आदमी का आदमी हर हाल में हमदर्द हो
इक तवज्जोह चाहिए इंसाँ को इंसाँ की तरफ़
आदमी के पास सब कुछ है मगर
एक तन्हा आदमिय्यत ही नहीं
इंसान की बुलंदी ओ पस्ती को देख कर
इंसाँ कहाँ खड़ा है हमें सोचना पड़ा
ज़मीं ने ख़ून उगला आसमाँ ने आग बरसाई
जब इंसानों के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुज़री
वो जंगलों में दरख़्तों पे कूदते फिरना
बुरा बहुत था मगर आज से तो बेहतर था
देवता बनने की हसरत में मुअल्लक़ हो गए
अब ज़रा नीचे उतरिए आदमी बन जाइए
आदमी क्या वो न समझे जो सुख़न की क़द्र को
नुत्क़ ने हैवाँ से मुश्त-ए-ख़ाक को इंसाँ किया
बना रहा हूँ मैं फ़ेहरिस्त छोटे लोगों की
मलाल ये कि बड़े नाम इस में आते हैं
कुफ़्र ओ इस्लाम की कुछ क़ैद नहीं ऐ 'आतिश'
शैख़ हो या कि बरहमन हो पर इंसाँ होवे
बनाया ऐ 'ज़फ़र' ख़ालिक़ ने कब इंसान से बेहतर
मलक को देव को जिन को परी को हूर ओ ग़िल्माँ को
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में इंसान की मर्यादा और मूल्य को सबसे ऊँचा बताया गया है। कवि कई अलौकिक और स्वर्गीय प्राणियों के नाम लेकर यह विचार तोड़ता है कि वे इंसान से स्वभावतः श्रेष्ठ हैं। भाव यह है कि इंसान अपनी कीमत पहचाने, पर उसे ईश्वर की देन मानकर नम्र रहे।
न तो मैं हूर का मफ़्तूँ न परी का आशिक़
ख़ाक के पुतले का है ख़ाक का पुतला आशिक़
रूप रंग मिलता है ख़द्द-ओ-ख़ाल मिलते हैं
आदमी नहीं मिलता आदमी के पैकर में
क्या तिरे शहर के इंसान हैं पत्थर की तरह
कोई नग़्मा कोई पायल कोई झंकार नहीं
आख़िर इंसान हूँ पत्थर का तो रखता नहीं दिल
ऐ बुतो इतना सताओ न ख़ुदा-रा मुझ को
बहुत हैं सज्दा-गाहें पर दर-ए-जानाँ नहीं मिलता
हज़ारों देवता हैं हर तरफ़ इंसाँ नहीं मिलता
यूँ सरापा इल्तिजा बन कर मिला था पहले रोज़
इतनी जल्दी वो ख़ुदा हो जाएगा सोचा न था
इधर तेरी मशिय्यत है उधर हिकमत रसूलों की
इलाही आदमी के बाब में क्या हुक्म होता है
आदमी से आदमी की जब न हाजत हो रवा
क्यूँ ख़ुदा ही की करे इतनी न फिर याद आदमी
अहल-ए-म'अनी जुज़ न बूझेगा कोई इस रम्ज़ को
हम ने पाया है ख़ुदा को सूरत-ए-इंसाँ के बीच
ऐ शैख़ आदमी के भी दर्जे हैं मुख़्तलिफ़
इंसान हैं ज़रूर मगर वाजिबी से आप
ग़ैब का ऐसा परिंदा है ज़मीं पर इंसाँ
आसमानों को जो शह-पर पे उठाए हुए है
रू-ए-ज़मीं पे चार अरब मेरे अक्स हैं
इन में से मैं भी एक हूँ चाहे कहीं हूँ मैं