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मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर जन्नत के अस्तित्व पर एक चुलबुला कटाक्ष कर रहे हैं। उनका मानना है कि भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी न किसी उम्मीद की ज़रूरत होती है। जन्नत का यह 'ख़याल' एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।
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इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में शायर यह कहना चाहता है कि इश्क़ के चक्कर में पड़कर वह अब किसी काम के नहीं रहे। वह एक दबी हुई आह के साथ याद करते हैं कि प्यार में पड़ने से पहले वो भी एक बहुत हुनरमंद और ज़रूरी इंसान थे, लेकिन अब सिर्फ़ नाम के रह गए हैं।
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उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
Interpretation:
Rekhta AI
प्रिय की मौजूदगी प्रेमी के चेहरे पर पल भर की रौनक ले आती है, जबकि भीतर की पीड़ा बनी रहती है। देखने वाले इस बाहरी चमक को सेहत का संकेत समझ लेते हैं और असली दुख नहीं देख पाते। शे’र प्रेम की ‘बीमारी’ और दिखने‑वाले हाल व असली हाल के अंतर को मार्मिक ढंग से कहता है।
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मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में प्रेम की चरम अवस्था दिखाई गई है, जहाँ जीवन और मृत्यु का भेद मिट जाता है। प्रेमी की जिंदगी का सहारा प्रिय का दर्शन है, लेकिन वही प्रिय इतना कठोर/उदासीन है कि उसी के कारण जान भी जा सकती है। एक ही चेहरा जीवन भी देता है और मृत्यु भी—यही तड़प और समर्पण का भाव है।
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पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में महबूब के नखरे और तीखेपन को दर्शाया गया है, जहाँ वह प्रेमी को पहचानने से साफ़ इनकार कर देते हैं। शायर हैरान है कि अपनी पहचान उस इंसान को कैसे बताए, जिसके प्यार की वजह से ही उसकी पहचान बनी है।
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इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
शायर अपने महबूब के इस अंदाज़ पर हैरान है कि वह बिना किसी हथियार के ही लड़ने चला आया है। यहाँ 'लड़ना' नज़रों के वार या अदाओं का प्रतीक है, जो तलवार से भी ज़्यादा घातक हैं। ग़ालिब कहते हैं कि इस 'सादगी' पर मर मिटना लाज़मी है, जहाँ कातिल यह नहीं जानता कि उसकी सुंदरता ही सबसे बड़ा हथियार है।
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रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब कहते हैं कि सिर्फ़ साँस लेना या ज़िंदा रहना काफ़ी नहीं है, जज़्बे में शिद्दत होनी चाहिए। जब तक इंसान का दर्द इतना गहरा न हो कि वह आँखों से लहू बनकर बहे, तब तक उस खून का कोई मतलब नहीं। यहाँ खून का मतलब गहरा इश्क़ और पीड़ा है जो दिखाई देनी चाहिए।
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की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब इस शेर में महबूब के पछतावे के गलत समय पर तंज (व्यंग्य) कर रहे हैं। आशिक के मर जाने के बाद महबूब का ज़ुल्म छोड़ना और शर्मिंदा होना अब बेमानी है, भले ही वह स्वभाव से कितनी ही जल्दी पछताने वाला क्यों न हो।
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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर मनुष्य की न खत्म होने वाली चाहत और अतृप्ति को दिखाता है। “दम निकलना” एक रूपक है, जो बताता है कि इच्छा की तीव्रता इंसान को भीतर तक थका देती है। फिर भी, जब कई अरमान पूरे हो जाते हैं, तब भी संतोष नहीं मिलता, क्योंकि दिल की माँगें लगातार बढ़ती रहती हैं।
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इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने
Interpretation:
Rekhta AI
इस शे’र में इश्क़ को ऐसी आग बताया गया है जो इंसान की मरज़ी से नहीं चलती। न आप इसे अपने हिसाब से जगा सकते हैं, न जगे हुए इश्क़ को आसानी से बुझा सकते हैं। भाव यह है कि प्यार भीतर से जलाता है और आदमी को बेबस कर देता है।
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हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक
Interpretation:
Rekhta AI
मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ कह रहे हैं कि उपेक्षा भले ही एक दिन खत्म हो जाए, पर वह खत्म होते-होते बहुत देर हो जाती है। “मिट्टी/धूल हो जाना” मृत्यु, समाप्त हो जाना या पूरी तरह टूट जाना का संकेत है। भाव यह है कि प्रेम में पहचान और ध्यान अगर देर से मिले, तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसी देर और बेबसी की टीस इस शेर का केंद्र है।
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रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं
Interpretation:
Rekhta AI
मिर्ज़ा ग़ालिब यहाँ दुख को मन की आदत से जोड़ते हैं: बार-बार कष्ट सहने से मन मजबूत हो जाता है। लगातार कठिनाइयाँ मिलने पर उनका डर और तीखापन कम हो जाता है, क्योंकि इंसान उन्हें झेलना सीख लेता है। भाव यह है कि तकलीफ़ भी समय के साथ सहने लायक बन जाती है।
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हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर 'ताल्ली' यानी ख़ुद की तारीफ़ का एक बेहतरीन उदाहरण है। शायर मानता है कि दुनिया में और भी अच्छे कवि हैं, लेकिन साथ ही यह दावा करता है कि उसकी शैली या अंदाज़-ए-बयाँ बाकियों से बिल्कुल हटकर है, जो उसे सबसे ख़ास बनाता है।
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जी ढूँडता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर उस इच्छा को दिखाता है जिसमें इंसान दुनिया की भागदौड़ से निकलकर बस समय पाना चाहता है। “दिन-रात” बताता है कि यह चाह लगातार है, थोड़ी देर की नहीं। “प्रियतम का कल्पना-चित्र” मन का सहारा है, जिसमें डूबकर बैठना भी सुकून बन जाता है। भाव का केंद्र एकांत में याद और तड़प के साथ जुड़ी मीठी डूबन है।
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वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर प्रिय के घर आ जाने को इतना अनोखा मानता है कि उसे ईश्वर की कृपा/चमत्कार कहा गया है। बोलने वाला बार-बार नज़र बदलकर कभी प्रिय को, कभी घर को देखता है, ताकि यक़ीन हो सके कि यह सच है। भाव में आश्चर्य, कृतज्ञता और अचानक मिली किस्मत की मिठास है।
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बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहता है कि उसकी स्व-विस्मृति या बेहोशी किसी असली वजह से है। “पर्दा-दारी” उस छुपे हुए सच, दर्द या प्रेम की ओर इशारा करती है जिसे वह खुलकर कह नहीं सकता। इसलिए बाहरी तौर पर जो उलझन दिखती है, वह भीतर की छिपी बात का असर है। यह शेर रहस्य और अंदरूनी बेचैनी का भाव देता है।
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तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता
ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में ग़ालिब उन दोस्तों से शिकायत करते हैं जो दर्द में मदद करने के बजाय उपदेश देने लगते हैं। “नासेह” यानी समझाने वाला दोस्त यहाँ अपनापन नहीं, बल्कि जज करने का भाव लाता है। कवि चाहता है कि दोस्त या तो समस्या का हल करें या कम से कम दुख बाँटें। भाव यह है कि बिना संवेदना की नसीहत दोस्ती को बेकार कर देती है।
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
Interpretation:
Rekhta AI
शायर अपनी ही नादानी पर व्यंग्य कर रहे हैं कि हम ऐसे इंसान से वफ़ा की उम्मीद लगाए बैठे हैं जो 'वफ़ा' शब्द के अर्थ से ही अनजान है। यह प्रेमी की लाचारी और प्रेम की विडंबना को दर्शाता है कि उनकी आशा एक ऐसे व्यक्ति से है जो उसे पूरा करने के योग्य ही नहीं।
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में ग़ालिब ने बहुत ही विनम्रता से महान शायर मीर तक़ी 'मीर' की बड़ाई की है। वे खुद को समझाते हुए कहते हैं कि भले ही आज मैं उस्ताद हूँ, लेकिन मुझसे पहले भी एक ऐसा शायर था जिसे ज़माना 'मीर' कहता था। यह शेर अपने से बड़ों का सम्मान करने और अपनी कला पर घमंड न करने की सीख देता है।
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'ग़ालिब' हमें न छेड़ कि फिर जोश-ए-अश्क से
बैठे हैं हम तहय्या-ए-तूफ़ाँ किए हुए
Interpretation:
Rekhta AI
शायर चेतावनी दे रहा है कि उसके जज़्बातों को उकसाया न जाए। वह रोने के लिए बिलकुल तैयार बैठा है और उसके भीतर आंसुओं का सैलाब उमड़ रहा है। ज़रा सी छेड़खानी से ग़म का ऐसा तूफ़ान आएगा जिसे संभालना मुश्किल होगा।
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क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब का कहना है कि ज़िंदगी और दुःख अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि दोनों का वजूद एक ही है। जब तक इंसान ज़िंदा है, वह दुःख की गिरफ़्त में रहेगा क्योंकि जीवन स्वयं एक जेल के समान है। दुःख से पूरी तरह आज़ादी केवल मृत्यु के बाद ही संभव है, जीते-जी सुख की उम्मीद करना व्यर्थ है।
ये मसाईल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता
Interpretation:
Rekhta AI
ग़ालिब यहाँ मज़ाक और व्यंग्य के साथ अपनी विद्वता की तारीफ कर रहे हैं। वे कहते हैं कि आध्यात्म पर उनका ज्ञान इतना गहरा है कि वे संत कहलाने लायक हैं, लेकिन उनकी शराब पीने की आदत इसमें बाधा बन जाती है। यह शेर उनकी होशियारी और उनकी मानवीय कमज़ोरियों के बीच के विरोधाभास को दर्शाता है।
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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
Interpretation:
Rekhta AI
शायर का कहना है कि प्रेमी से मिलन उनकी किस्मत में था ही नहीं। उन्हें अपनी मौत का या जीवन के छोटा होने का कोई अफ़सोस नहीं है, क्योंकि अगर ज़िंदगी लंबी होती तो भी मिलन नहीं होता, बस इंतज़ार का दुख और लंबा खिंच जाता। यह शेर नाकामी को स्वीकार करने की बात करता है।
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जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि जब पूरा शरीर ही जलकर खाक हो गया, तो उसमें धड़कने वाला दिल कैसे बच सकता है। अब इस राख में कुछ खोजने का कोई फायदा नहीं है। यह शेर यह बताता है कि सब कुछ खत्म हो जाने के बाद निशानियाँ ढूँढ़ना व्यर्थ है।
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हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में अपनी ही पहचान से दूर हो जाने की तीव्र अनुभूति है। “वहाँ” कोई जगह कम, मन की अवस्था अधिक है—उलझन, दुख या खालीपन की गहराई। कवि कहता है कि इंसान इतना खो सकता है कि उसे खुद अपने बारे में भी पता नहीं चलता। भाव है अकेलापन और असहायता।
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काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुम को मगर नहीं आती
Interpretation:
Rekhta AI
शायर खुद पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि सारा जीवन पापों और दुनियादारी में बिताने के बाद अब वह किस हक से ईश्वर के घर जाने की सोच रहा है। यह शेर इंसान की बेशर्मी को दर्शाता है कि अपनी गलतियों और कमियों को जानने के बाद भी उसमें लज्जा या पछतावे की भावना नहीं है।
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या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात
दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और
Interpretation:
Rekhta AI
कहने वाला दर्द के साथ मान चुका है कि सामने वाला उसकी बात कभी नहीं समझेगा। इसलिए वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उस व्यक्ति के भीतर समझने की क्षमता, यानी दिल की व्यापकता बढ़ जाए, क्योंकि असली समझ शब्दों से नहीं, भीतर से आती है। साथ ही वह अपने लिए और भाषा/बोलने की ताकत नहीं चाहता, क्योंकि बार-बार कहना भी बेकार है और पीड़ा बढ़ाता है। यह प्रेम, असहायता और भीतर की शिकायत का भाव दिखाता है।
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बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब'
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं
Interpretation:
Rekhta AI
शायर ने अपना रूप बदलकर एक फकीर का बना लिया है ताकि वह समाज के रईस और दानी लोगों की असलियत देख सके। वह व्यंग्य करते हुए कहता है कि हम देखना चाहते हैं कि ये 'कृपालु' लोग वास्तव में कैसा व्यवहार करते हैं और उनकी दया कितनी सच्ची है।
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न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
EXPLANATION #1
जब इस दुनिया में कुछ नहीं था तब भी ईश्वर था, अगर सृष्टि न होती तो भी ईश्वर ही होता।
मेरे अपने वजूद (अस्तित्व) ने मुझे डुबो दिया, अगर मैं एक अलग इंसान न होता तो मैं परमात्मा ही होता।
यह शेर सूफी दर्शन के उस विचार को दर्शाता है कि सब कुछ ईश्वर है। ग़ालिब अफसोस जताते हैं कि उनके अलग 'होने' या अस्तित्व ने उन्हें परमात्मा से जुदा कर दिया है। यदि उनका निर्माण न हुआ होता, तो वे उस परम सत्य का ही अटूट हिस्सा होते।
शफ़क़ सुपुरी
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हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता
वगरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि लोगों की नज़र में मान-सम्मान अक्सर अपनी काबिलियत से नहीं, सत्ता के पास होने से मिलता है। राजा की संगति मिलते ही आदमी शेख़ी दिखाने लगता है, क्योंकि समाज ताक़त के सहारे को बड़ा मानता है। ग़ालिब व्यंग्य के साथ यह भी दिखाते हैं कि ऐसी इज़्ज़त टिकाऊ नहीं, वह दूसरों की कृपा पर टिकी होती है।
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मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती
EXPLANATION #1
इस शे’र की गिनती ग़ालिब के मशहूर अशआर में होती है। इस शे’र में ग़ालिब ने ख़ूब सारे संदर्भों का इस्तेमाल किया है, जैसे दिन के अनुरूप रात, मौत के संदर्भ से नींद। इस शे’र में ग़ालिब ने मानव मनोविज्ञान के एक अहम पहलू से पर्दा उठाकर एक नाज़ुक विषय स्थापित किया है। शे’र के शाब्दिक अर्थ तो ये हैं कि जबकि अल्लाह ने हर प्राणी की मौत का एक दिन निर्धारित किया है और मैं भी इस तथ्य से अच्छी तरह वाक़िफ़ हूँ, फिर मुझे रात भर नींद क्यों नहीं आती। ध्यान देने की बात ये है कि नींद को मौत का ही एक रूप माना जाता है। शे’र में ये रियायत भी ख़ूब है। मगर शे’र में जो परतें हैं उसकी तरफ़ पाठक का ध्यान तुरंत नहीं जाता। दरअसल ग़ालिब कहना चाहते हैं कि हालांकि अल्लाह ने मौत का एक दिन निर्धारित कर रखा है और मैं इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हूँ कि एक न एक दिन मौत आही जाएगी फिर मौत के खटके से मुझे सारी रात नींद क्यों नहीं आती। अर्थात मौत का डर मुझे सोने क्यों नहीं देता।
शफ़क़ सुपुरी
कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
EXPLANATION #1
मेरे दिल से पूछो कि तुम्हारा अध-निकला तीर मुझे कैसे चोट दे रहा है।
अगर वह तीर जिगर के आर-पार चला जाता, तो यह लगातार चुभन न होती।
ग़ालिब यहाँ प्रेम-पीड़ा को ऐसे तीर से दिखाते हैं जो पूरा निकलता नहीं, इसलिए घाव बंद भी नहीं होता और दर्द बना रहता है। ‘आर-पार’ जाना एक साफ़, पूरा ज़ख्म है, पर ‘अध-निकला’ तीर अधूरी चोट का संकेत है। भाव यह है कि अनिश्चित, अधूरा दुख सबसे ज़्यादा तड़पाता है।
सैफ़ अज़हर
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इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
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Rekhta AI
ग़ालिब कहते हैं कि अपने अहंकार को मिटा देने में ही असली आनंद है, जैसे बूंद नदी में मिल जाती है। दूसरी पंक्ति का भाव यह है कि जब दुःख बहुत बढ़ जाता है, तो इंसान को उसका अहसास होना बंद हो जाता है, जिससे दर्द ही सुकून बन जाता है।
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इश्क़ से तबीअत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया
दर्द की दवा पाई दर्द-ए-बे-दवा पाया
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि इश्क़ ने ही जिंदगी को जीने लायक बनाया और उसे रंगीन कर दिया। प्रेम दुनिया के आम दुखों का इलाज तो है, मगर यह खुद एक ऐसी बीमारी है जो लाइलाज है। यानी इश्क़ जीवन की निरसता की दवा है, पर खुद एक मीठा और अनंत दर्द भी है।
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता
Interpretation:
Rekhta AI
इस शे’र में बिछड़ जाने के बाद भी याद के बने रहने का भाव है। कवि ग़ालिब को उनकी सोच की पहचान से याद करता है—हर बात में “अगर/काश” के सवाल उठाना। “यूँ होता तो क्या होता” पछतावे, बेचैनी और भीतर की टटोल का रूप बन जाता है। दुख यह है कि इंसान चला जाता है, पर उसकी खास बोलचाल और अंदाज़ रह जाता है।
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निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले
Interpretation:
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कवि आदम के स्वर्ग से निकाले जाने की कथा को अपने प्रेम-जीवन की हार से जोड़ता है। स्वर्ग यहाँ मान-सम्मान का प्रतीक है और प्रिय की गली प्रेमी के लिए अपना स्वर्ग बन जाती है। वहाँ से बेइज्जत होकर निकलना बताता है कि प्रेम में मिला तिरस्कार कितना गहरा है। भाव शोक, शिकायत और टूटी हुई आत्म-प्रतिष्ठा का है।
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तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हज़ार
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर दुआ और प्रेम का इज़हार है, जिसमें अतिशयोक्ति से समय को बहुत बड़ा कर दिया गया है। कहने वाला चाहता है कि प्रिय की उम्र सिर्फ़ लंबी न हो, बल्कि समय की कमी ही मिट जाए। इसलिए वह हर साल में “पचास हज़ार दिन” होने की कामना करता है, जो सच नहीं बल्कि चाहत की तीव्रता है। भावनात्मक केंद्र कोमलता, अपनापन और हमेशा साथ रहने की इच्छा है।
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आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में ग़ालिब उदासी की उस गहराई को बयान करते हैं जहाँ इंसान महसूस करना बंद कर देता है। पहले वह अपनी बेबसी पर हँस लेते थे, लेकिन अब हालात ने उन्हें इतना तोड़ दिया है कि वह पूरी तरह सुन्न हो गए हैं। यह स्थिति बताती है कि अब खुशी या गम किसी भी बात का उन पर असर नहीं होता।
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आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
Interpretation:
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शायर कहता है कि प्रेम की पुकार का असर होने में बहुत लंबा समय लगता है, जबकि इंसान की ज़िंदगी बहुत छोटी है। प्रेमिका की 'ज़ुल्फ़ों के सर होने' यानी प्रेम की जटिलताओं के सुलझने तक, इंतज़ार करने वाला प्रेमी जीवित ही नहीं बचता। यह शेर इंसान की मजबूरी और समय की कमी को दर्शाता है।
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देखिए पाते हैं उश्शाक़ बुतों से क्या फ़ैज़
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है
Interpretation:
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मिर्ज़ा ग़ालिब इस शेर में ज्योतिष की उम्मीद और प्यार की कठोर सच्चाई की तुलना कर रहे हैं। पंडित जी ने तो कह दिया है कि साल अच्छा है, मगर शायर सोच रहा है कि क्या उस 'अच्छे साल' का असर महबूब की बेरुखी पर भी पड़ेगा? प्रेमी के लिए साल तभी अच्छा माना जाता है जब उसका महबूब उस पर मेहरबान हो, चाहे सितारे कुछ भी कहें।
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मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है
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Rekhta AI
शायर अपने महबूब से शिकायत कर रहा है कि उसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। वह याद दिलाता है कि वह भी अपनी बात कहने का हुनर रखता है। उसकी ख़ामोशी को उसकी कमजोरी न समझा जाए; वह सिर्फ़ इस इंतज़ार में है कि महबूब उसे बोलने का मौका दे और उसकी चाहत के बारे में सवाल करे।
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क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर गरीबी के बीच भी उम्मीद और जिद का भाव दिखाता है। उधार की शराब मजबूरी भी है और बेफिक्री का ढोंग भी, और “फ़ाक़ा-मस्ती” भूख से उपजी अजीब-सी बेसुध हिम्मत का रूपक है। व्यंग्य यह है कि इंसान अपनी तंगी को भी किसी आने वाली कामयाबी का कारण मानकर खुद को संभाल लेता है।
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बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
EXPLANATION #1
हर काम का आसानी से हो जाना कितना मुश्किल है।
यहाँ तक कि एक 'आदमी' के लिए भी सच्चा 'इंसान' बनना आसान नहीं है।
ग़ालिब कहते हैं कि दुनिया में सरलता मिलना कठिन है। उन्होंने 'आदमी' (शारीरिक अस्तित्व) और 'इंसान' (नैतिक और मानवीय गुणों से पूर्ण) में अंतर किया है। जिस तरह हर काम आसान नहीं होता, वैसे ही जन्म से आदमी होने के बावजूद, उसमें मानवता के गुण पैदा करना एक अत्यंत कठिन साधना है।
मोहम्मद आज़म
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गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे
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शायर अपनी शारीरिक कमजोरी का वर्णन करते हुए कहता है कि भले ही उसके हाथ अब जाम उठाने के काबिल नहीं रहे, मगर उसकी आँखों की प्यास अभी बुझी नहीं है। वह केवल शराब और सुराही को देखकर ही अपनी आत्मा को तसल्ली देना चाहता है, जो यह दर्शाता है कि शरीर थक सकता है लेकिन मन की चाहत अंत तक बनी रहती है।
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
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मिर्ज़ा ग़ालिब दुनिया को बच्चों के खेल का मैदान कहकर उसकी गंभीरता पर सवाल उठाते हैं, मानो यह सब असल नहीं, बस खेल है। “रात-दिन” का चलना एक लगातार मंच-सा बन जाता है, जिसमें घटनाएँ आती-जाती रहती हैं। भाव-केन्द्र में जीवन से ऊब और दूरी है: कवि भाग नहीं लेता, केवल देखता है।
कहूँ किस से मैं कि क्या है शब-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
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मिर्ज़ा ग़ालिब के यहाँ “दुख की रात” लंबी और भारी पीड़ा का रूपक है, जिसे कहने-सुनने वाला कोई नहीं मिलता। दूसरी पंक्ति में वे कहते हैं कि मौत तो एक बार का अंत है, वह इतनी बुरी नहीं; असल पीड़ा वह दुख है जो बार-बार लौटता रहता है। भावनात्मक केंद्र थकान, अकेलापन और पीड़ा के न खत्म होने की कसक है।
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हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता
EXPLANATION #1
जब मरने के बाद हमारी इतनी बदनामी हुई, तो हम नदी में डूब क्यों न गए?
अगर ऐसा होता तो न हमारा जनाज़ा उठता और न ही कहीं हमारी क़ब्र होती।
शायर अफ़सोस जता रहा है कि मरने के बाद उसे ज़िल्लत उठानी पड़ी। वह कामना करता है कि काश वह डूब कर मर जाता, ताकि उसका शरीर ही न मिलता और उसका नामो-निशान मिट जाता। इस तरह न तो शव-यात्रा (जनाज़ा) निकलती और न ही कोई मज़ार बनता जो दुनिया वालों के लिए तमाशा बनता।
शफ़क़ सुपुरी
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जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब क़यामत का है गोया कोई दिन और
Interpretation:
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शायर अपने महबूब के इस वादे पर व्यंग्य कर रहा है कि वे प्रलय के दिन मिलेंगे। ग़ालिब का कहना है कि महबूब का बिछड़ना ही उनके लिए सबसे बड़ी क़यामत है। जब आज ही उन पर मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा है, तो फिर किसी और क़यामत के दिन का ज़िक्र करना अजीब है, क्योंकि उनके लिए तो आज ही प्रलय है।
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ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे
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ग़ालिब यहाँ इंसान के मन में चलने वाली उस कशमकश को बयां कर रहे हैं जब वह धर्म और इच्छाओं के बीच फँस जाता है। उनका ईमान उन्हें रोकता है, लेकिन दुनियावी आकर्षण (जिसे यहाँ 'कलीसा' कहा गया है) उन्हें अपनी ओर खींच रहा है, जिससे वो अपनी पुरानी मान्यताओं (काबा) से दूर और वर्जित चीज़ों के करीब जा रहे हैं।
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