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शेर पर शेर

शे’र या शायरी पर की

जाने वाली शायरी की काफ़ी अहमियत है। शायरी की बारीकीयाँ बताने और इसका मक़सद बताने और शे’र-गोई के गुर सिखाने के लिए आज भी शायर अक्सर शे’र-गोई का ही सहारा लेते हैं। शे’र शायरी के इस अन्दाज़ से आपका तआरुफ़ चंद मिसालों के बग़ैर लुत्फ़ नहीं देगाः

दुनिया ने तजरबात हवादिस की शक्ल में

जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूँ मैं

साहिर लुधियानवी

खुलता किसी पे क्यूँ मिरे दिल का मोआमला

शेरों के इंतिख़ाब ने रुस्वा किया मुझे

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि उसके दिल की बात हमेशा राज़ ही रहती और किसी को पता चलती। लेकिन जब उसने महफ़िल में अपनी पसंद के शेर सुनाए, तो उन शेरों ने उसके दिल के दर्द को बयां कर दिया। सुनने वालों ने समझ लिया कि ये शेर उसकी अपनी कहानी हैं, और इस तरह वह सबके सामने रुस्वा हो गया।

मिर्ज़ा ग़ालिब

मुझ को शायर कहो 'मीर' कि साहब मैं ने

दर्द ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में मीर कविता को प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सहा हुआ दुख मानते हैं। ‘दीवान’ यहाँ रचनाओं की किताब से अधिक, दर्द-ग़म का जमा हुआ खजाना है। भाव यह है कि उनकी शायरी जीवन के आघातों से निकली है, इसलिए वे खुद को बस दुख का संग्रहकर्ता कहते हैं। निजी पीड़ा कला में बदल जाती है।

मीर तक़ी मीर

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं

कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं

जाँ निसार अख़्तर

अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ

इक ज़रा शेर कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ

परवीन शाकिर

शेर दर-अस्ल हैं वही 'हसरत'

सुनते ही दिल में जो उतर जाएँ

हसरत मोहानी

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या

चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए

जाँ निसार अख़्तर

ग़ज़ल का शेर तो होता है बस किसी के लिए

मगर सितम है कि सब को सुनाना पड़ता है

अज़हर इनायती

बंदिश-ए-अल्फ़ाज़ जड़ने से नगों के कम नहीं

शाइ'री भी काम है 'आतिश' मुरस्सा-साज़ का

हैदर अली आतिश

शाएर को मस्त करती है तारीफ़-ए-शेर 'अमीर'

सौ बोतलों का नश्शा है इस वाह वाह में

अमीर मीनाई

है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी

इक तुर्फ़ा तमाशा है 'हसरत' की तबीअत भी

हसरत मोहानी

रहता सुख़न से नाम क़यामत तलक है 'ज़ौक़'

औलाद से रहे यही दो पुश्त चार पुश्त

Interpretation: Rekhta AI

कवि का कहना है कि शरीर और वंश नश्वर हैं, लेकिन कला और साहित्य अमर हैं। जहाँ संतान से प्राप्त नाम कुछ पीढ़ियों के बाद भुला दिया जाता है, वहीं कवि के शब्द उसे दुनिया के अंत तक जीवित रखते हैं। यह शेर रचना की शक्ति को वंश की शक्ति से श्रेष्ठ बताता है।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

छुपी है अन-गिनत चिंगारियाँ लफ़्ज़ों के दामन में

ज़रा पढ़ना ग़ज़ल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता

प्रेम भण्डारी

हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में

अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता

बशीर बद्र

अपने लहजे की हिफ़ाज़त कीजिए

शेर हो जाते हैं ना-मालूम भी

निदा फ़ाज़ली

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए

एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया

ऐतबार साजिद

लोग कहते हैं कि फ़न्न-ए-शाइरी मनहूस है

शेर कहते कहते मैं डिप्टी कलेक्टर हो गया

कल्ब-ए-हुसैन नादिर

वही रह जाते हैं ज़बानों पर

शेर जो इंतिख़ाब होते हैं

अमीर मीनाई

कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर

इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं

इफ़्तिख़ार आरिफ़

ये शाइ'री ये किताबें ये आयतें दिल की

निशानियाँ ये सभी तुझ पे वारना होंगी

मोहसिन नक़वी

सौ शेर एक जलसे में कहते थे हम 'अमीर'

जब तक शेर कहने का हम को शुऊर था

अमीर मीनाई

सादा समझो इन्हें रहने दो दीवाँ में 'अमीर'

यही अशआर ज़बानों पे हैं रहने वाले

अमीर मीनाई

ज़िंदगी भर की कमाई यही मिसरे दो-चार

इस कमाई पे तो इज़्ज़त नहीं मिलने वाली

इफ़्तिख़ार आरिफ़

हमारे शेर हैं अब सिर्फ़ दिल-लगी के 'असद'

खुला कि फ़ाएदा अर्ज़-ए-हुनर में ख़ाक नहीं

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर अपने अनुभव से उपजी निराशा का बयान है: कवि को लगा कि कला का प्रदर्शन करके भी सम्मान मिलता है, कोई लाभ। इसलिए वह अपनी शायरी को ‘दिल बहलाने’ तक सीमित मान लेता है, ताकि उम्मीदों का बोझ रहे। “ख़ाक नहीं” कहकर वह इस व्यर्थता को बहुत तीखे ढंग से जताता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

शाइ'री ताज़ा ज़मानों की है मे'मार 'फ़राज़'

ये भी इक सिलसिला-ए-कुन-फ़यकूँ है यूँ है

अहमद फ़राज़

सुख़न में सहल नहीं जाँ निकाल कर रखना

ये ज़िंदगी है हमारी सँभाल कर रखना

उबैदुल्लाह अलीम

ख़ुश्क सेरों तन-ए-शाएर का लहू होता है

तब नज़र आती है इक मिस्रा-ए-तर की सूरत

अमीर मीनाई

मेरा हर शेर है इक राज़-ए-हक़ीक़त 'बेख़ुद'

मैं हूँ उर्दू का 'नज़ीरी' मुझे तू क्या समझा

बेख़ुद देहलवी

शेर से शाइरी से डरते हैं

कम-नज़र रौशनी से डरते हैं

हबीब जालिब

राह-ए-मज़मून-ए-ताज़ा बंद नहीं

ता क़यामत खुला है बाब-ए-सुख़न

वली दकनी

ये तिरे अशआर तेरी मानवी औलाद हैं

अपने बच्चे बेचना 'इक़बाल-साजिद' छोड़ दे

इक़बाल साजिद

'असग़र' ग़ज़ल में चाहिए वो मौज-ए-ज़िंदगी

जो हुस्न है बुतों में जो मस्ती शराब में

असग़र गोंडवी

इस को समझो ख़त्त-ए-नफ़्स 'हफ़ीज़'

और ही कुछ है शाएरी से ग़रज़

हफ़ीज़ जौनपुरी

भूक तख़्लीक़ का टैलेंट बढ़ा देती है

पेट ख़ाली हो तो हम शेर नया कहते हैं

खालिद इरफ़ान

शाइरी में अन्फ़ुस-ओ-आफ़ाक़ मुबहम हैं अभी

इस्तिआरा ही हक़ीक़त में ख़ुदा सा ख़्वाब है

काविश बद्री

उस का तो एक लफ़्ज़ भी हम को नहीं है याद

कल रात एक शेर कहा था जो ख़्वाब में

कमाल अहमद सिद्दीक़ी

मिरे अंग अंग में बस गई

ये जो शाइ'री है ये कौन है

फ़रहत अब्बास शाह

औने-पौने ग़ज़लें बेचीं नज़्मों का व्यापार किया

देखो हम ने पेट की ख़ातिर क्या क्या कारोबार किया

महमूद शाम

'कैफ़' यूँ आग़ोश-ए-फ़न में ज़ेहन को नींद गई

जैसे माँ की गोद में बच्चा सिसक कर सो गया

कैफ़ अहमद सिद्दीकी

हर्फ़ को बर्ग-ए-नवा देता हूँ

यूँ मिरे पास हुनर कुछ भी नहीं

ख़लील तनवीर

मुझ को मरने दिया शे'र उतारे मुझ पर

इश्क़ ने बस ये मिरे साथ रिआ'यत की थी

अम्मार यासिर मिगसी

हमारे शेर को सुन कर सुकूत ख़ूब नहीं

बयान कीजिए इस में जो कुछ तअम्मुल हो

जोशिश अज़ीमाबादी

कब वो पैग़ाम-रसा हो कि मुझे सब्र नहीं

काकुल-ए-ख़म के लिए शे'र रक़म करता हूँ

ओसामा अमीर

ख़ास अंदाज़ जब सुख़न का हो

शाएरी शाएरी नहीं होती

वेद राही
बोलिए