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दिल पर शेर

दिल शायरी के इस इन्तिख़ाब

को पढ़ते हुए आप अपने दिल की हालतों, कैफ़ियतों और सूरतों से गुज़़रेंगे और हैरान होंगे कि किस तरह किसी दूसरे, तीसरे आदमी का ये बयान दर-अस्ल आप के अपने दिल की हालत का बयान है। इस बयान में दिल की आरज़ुएँ हैं, उमंगें हैं, हौसले हैं, दिल की गहराइयों में जम जाने वाली उदासियाँ हैं, महरूमियाँ हैं, दिल की तबाह-हाली है, वस्ल की आस है, हिज्र का दुख है।

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

और क्या देखने को बाक़ी है

आप से दिल लगा के देख लिया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ज़िंदगी किस तरह बसर होगी

दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में

जौन एलिया

कौन इस घर की देख-भाल करे

रोज़ इक चीज़ टूट जाती है

जौन एलिया

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास

दिल को कई कहानियाँ याद सी के रह गईं

शाम का माहौल धुएँ-सा धुंधला था, और सुंदरता भी उदास-सी लग रही थी।

दिल में कई बातें कहानियों की तरह याद-सी आकर वहीं ठहर गईं।

इस शेर में बाहर की धुंधली शाम और भीतर की उदासी एक-दूसरे से जुड़ जाती है। धुआँ-धुआँ वातावरण मन की उलझन और भारीपन का रूपक है, और “हुस्न” का उदास होना बताता है कि खुशी देने वाली चीज़ें भी फीकी पड़ गई हैं। ऐसे समय कई पुरानी, अधूरी बातें याद की तरह उभरती हैं और मन से जाती नहीं—बस चुप-सी टीस बनकर रह जाती हैं।

फ़िराक़ गोरखपुरी

दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब

क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो

हे प्रभु, मैं दुनिया की महफ़िलों से ऊब गया हूँ।

जब दिल की लौ ही बुझ गई हो, तो सभा का आनंद कैसा?

कवि दुनिया की रंगीन महफ़िलों से निराश होकर ईश्वर से बात करता है। “महफ़िल/सभा” बाहरी चमक-दमक का रूपक है और “दिल का बुझना” भीतर के उत्साह, लगन और अर्थ के खत्म हो जाने का संकेत है। जब अंदर ही उजाला रहे, तो बाहर का शोर भी खाली लगता है। भाव यह है कि सच्ची तृप्ति के लिए भीतर की आग और उद्देश्य का जागना ज़रूरी है।

अल्लामा इक़बाल

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

वो शीशा हो नहीं सकता ये पत्थर हो नहीं सकता

तुम्हारा दिल भावनाओं में मेरे दिल के बराबर नहीं हो सकता।

वह दिल काँच जैसा कोमल नहीं हो सकता और यह दिल पत्थर जैसा कठोर नहीं हो सकता।

दाग़ देहलवी ने दो दिलों के स्वभाव को “काँच” और “पत्थर” से तुलना करके दिखाया है। कहने वाला मानता है कि दोनों के भीतर की संवेदना एक जैसी नहीं, इसलिए बराबरी संभव नहीं। एक दिल बहुत कोमल है और जल्दी आहत होता है, दूसरा कठोर और ठंडा है। इसमें प्रेम में असंगति और शिकायत का दर्द है।

दाग़ देहलवी

दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से

कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से

जलील ’आली’

दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से

इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से

महताब राय ताबां

इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें

इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में

इन अधूरी चाहतों से कह दो कि वे कहीं और जाकर बस जाएँ।

मेरे घायल और दाग़दार दिल में अब इतनी जगह नहीं है।

यहाँ कवि अपनी “हसरतों” को जैसे व्यक्ति मानकर उनसे बात करता है, मानो वे दिल में रहने गई हों। दिल पहले से दुख और घावों के निशानों से भरा है, इसलिए नई इच्छाओं को रखने की गुंजाइश नहीं बची। भाव यह है कि पीड़ा ने मन को इतना भर दिया है कि अब चाहत भी बोझ लगने लगी है।

बहादुर शाह ज़फ़र

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं

उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में

बशीर बद्र

फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का

हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है

दिल का फैसला बस नज़र देखकर ही हो जाता है।

अगर नज़र में चंचलता हो, तो दिल जीतने वाला आकर्षण क्या रह जाता है?

इस शेर में कहा गया है कि प्रेम का असली निर्णय शब्दों से नहीं, नज़र के संकेत से होता है। नज़र की “शोखी” यानी चंचल, हल्की-सी नटखट चमक दिल में खिंचाव और चाह पैदा करती है। यही आकर्षण को जीवंत बनाती है; इसके बिना सुंदरता भी फीकी और असरहीन लगती है।

अल्लामा इक़बाल

तुम ज़माने की राह से आए

वर्ना सीधा था रास्ता दिल का

बाक़ी सिद्दीक़ी

शीशा टूटे ग़ुल मच जाए

दिल टूटे आवाज़ आए

हफ़ीज़ मेरठी

दिल की तकलीफ़ कम नहीं करते

अब कोई शिकवा हम नहीं करते

जौन एलिया

आप पहलू में जो बैठें तो सँभल कर बैठें

दिल-ए-बेताब को आदत है मचल जाने की

जलील मानिकपूरी

हम ने सीने से लगाया दिल अपना बन सका

मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया

जिगर मुरादाबादी

मैं हूँ दिल है तन्हाई है

तुम भी होते अच्छा होता

यहाँ बस मैं हूँ, मेरा दिल है और अकेलापन है।

तुम भी यहाँ होते तो अच्छा लगता।

यह दो पंक्तियाँ अकेलेपन की पूरी तस्वीर बना देती हैं—मनुष्य, उसका दिल और सूनी-सी खाली जगह। “दिल” यहाँ बेचैनी और भावनाओं का संकेत है, जो अकेले में और तेज़ हो जाती हैं। दूसरी पंक्ति में शिकायत नहीं, बस एक सीधी-सी चाह है कि तुम्हारी मौजूदगी से यह खालीपन कम हो जाता। भावनात्मक असर इसकी सादगी से पैदा होता है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

दिल दे तो इस मिज़ाज का परवरदिगार दे

जो रंज की घड़ी भी ख़ुशी से गुज़ार दे

अगर दिल देना है तो ऐसा स्वभाव वाला दिल देना।

जो दुख के समय को भी खुशी और हिम्मत से बिता दे।

दाग़ देहलवी ईश्वर से बाहरी सुख नहीं, बल्कि मन की बनावट की दुआ करते हैं। यहाँ “दिल” मन की हालत का प्रतीक है और “स्वभाव” उस शक्ति का, जो मुश्किल समय को भी सकारात्मक ढंग से सह ले। भाव यह है कि असली खुशी परिस्थितियों में नहीं, भीतर के संतोष और धैर्य में है। दुख की घड़ी में भी मुस्कराने की क्षमता ही सबसे बड़ी कृपा है।

दाग़ देहलवी

मुद्दत के ब'अद आज उसे देख कर 'मुनीर'

इक बार दिल तो धड़का मगर फिर सँभल गया

मुनीर नियाज़ी

कब ठहरेगा दर्द दिल कब रात बसर होगी

सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम तो कुछ देर हँस भी लेते हैं

दिल हमेशा उदास रहता है

बशीर बद्र

दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है

जो किसी और का होने दे अपना रक्खे

अहमद फ़राज़

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी

दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी

परवीन शाकिर

दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं

दोस्तों की मेहरबानी चाहिए

अब्दुल हमीद अदम

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था

दिल भी या-रब कई दिए होते

अगर मेरी तकदीर में इतना ज़्यादा दुख और गम लिखा था,

तो हे ईश्वर! तुझे चाहिए था कि मुझे एक के बजाय कई दिल दिए होते।

शायर ईश्वर से शिकायत कर रहा है कि अगर उसके भाग्य में दुखों का अंबार ही लिखना था, तो उन्हें सहने के लिए सिर्फ एक दिल क्यों दिया? एक अकेला और नाज़ुक दिल इतने सारे गम नहीं झेल सकता। इसलिए दुख की मात्रा के हिसाब से उसे कई दिल मिलने चाहिए थे ताकि वह यह सारा बोझ उठा पाता।

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल पागल है रोज़ नई नादानी करता है

आग में आग मिलाता है फिर पानी करता है

इफ़्तिख़ार आरिफ़

दिया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है

चले आओ जहाँ तक रौशनी मा'लूम होती है

नुशूर वाहिदी

मोहब्बत रंग दे जाती है जब दिल दिल से मिलता है

मगर मुश्किल तो ये है दिल बड़ी मुश्किल से मिलता है

जलील मानिकपूरी

''आप की याद आती रही रात भर''

चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का

जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ निकला

हैदर अली आतिश

जानता है कि वो आएँगे

फिर भी मसरूफ़-ए-इंतिज़ार है दिल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जाने वाले से मुलाक़ात होने पाई

दिल की दिल में ही रही बात होने पाई

शकील बदायूनी

बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए

दिल को तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है

हैदर अली आतिश

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें

हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं

साहिर लुधियानवी

अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आएगा कोई जाएगा

तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

बशीर बद्र

इश्क़ की चोट का कुछ दिल पे असर हो तो सही

दर्द कम हो या ज़ियादा हो मगर हो तो सही

जलाल लखनवी

उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो

हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो

अमीर मीनाई

दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है

ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया

दिल के उजड़ने की बात अब क्यों की जाए?

यह नगर तो सौ बार पहले ही लुट चुका है।

यहाँ दिल को एक नगर मानकर कहा गया है कि दुख और चोटें बार-बार उसे लूटती रही हैं। इतने नुकसान के बाद उजाड़पन का ज़िक्र भी बेकार लगता है, क्योंकि टूटना जैसे रोज़ की बात बन गया है। “सौ बार” का अतिशयोक्ति वाला प्रयोग लगातार दुख और मन की थकान को दिखाता है।

मीर तक़ी मीर

आग़ाज़-ए-मोहब्बत का अंजाम बस इतना है

जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है

जिगर मुरादाबादी

होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है

रंज कम सहता है एलान बहुत करता है

इरफ़ान सिद्दीक़ी

अदा से देख लो जाता रहे गिला दिल का

बस इक निगाह पे ठहरा है फ़ैसला दिल का

असद अली ख़ान क़लक़

भूल शायद बहुत बड़ी कर ली

दिल ने दुनिया से दोस्ती कर ली

बशीर बद्र

दिल के आईने में है तस्वीर-ए-यार

जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली

लाला मौजी राम मौजी

दिल मोहब्बत से भर गया 'बेख़ुद'

अब किसी पर फ़िदा नहीं होता

बेख़ुद देहलवी

दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं

लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं

क़तील शिफ़ाई

आरज़ू तेरी बरक़रार रहे

दिल का क्या है रहा रहा रहा

हसरत मोहानी

दिल तो मेरा उदास है 'नासिर'

शहर क्यूँ साएँ साएँ करता है

नासिर काज़मी

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हे मेरे नासमझ दिल, तुझे अचानक यह क्या हो गया है?

आखिरकार, इस दर्द और पीड़ा का इलाज क्या है?

शायर अपने दिल को नादान कहते हुए उससे पूछता है कि वह किस मुसीबत में फंस गया है। यहाँ एक तरह की बेबसी है, क्योंकि शायर को महसूस हो रहा है कि इश्क का यह दर्द ऐसा है जिसकी दुनिया में कोई दवा या इलाज मौजूद नहीं है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

दिल भी तोड़ा तो सलीक़े से तोड़ा तुम ने

बेवफ़ाई के भी आदाब हुआ करते हैं

महताब आलम
बोलिए